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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 82 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 82/ मन्त्र 4
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - इन्द्रावरुणौ छन्दः - आर्षीजगती स्वरः - निषादः

    यु॒वामिद्यु॒त्सु पृत॑नासु॒ वह्न॑यो यु॒वां क्षेम॑स्य प्रस॒वे मि॒तज्ञ॑वः । ई॒शा॒ना वस्व॑ उ॒भय॑स्य का॒रव॒ इन्द्रा॑वरुणा सु॒हवा॑ हवामहे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यु॒वाम् । इत् । यु॒त्ऽसु । पृत॑नासु । वह्न॑यः । यु॒वाम् । क्षेम॑स्य । प्र॒ऽस॒वे । मि॒तऽज्ञ॑वः । ई॒शा॒ना । वस्वः॑ । उ॒भय॑स्य । का॒रवः॑ । इन्द्रा॑वरुणा । सु॒ऽहवा॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    युवामिद्युत्सु पृतनासु वह्नयो युवां क्षेमस्य प्रसवे मितज्ञवः । ईशाना वस्व उभयस्य कारव इन्द्रावरुणा सुहवा हवामहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    युवाम् । इत् । युत्ऽसु । पृतनासु । वह्नयः । युवाम् । क्षेमस्य । प्रऽसवे । मितऽज्ञवः । ईशाना । वस्वः । उभयस्य । कारवः । इन्द्रावरुणा । सुऽहवा । हवामहे ॥ ७.८२.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 82; मन्त्र » 4
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 2; मन्त्र » 4
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    पदार्थ -
    (इन्द्रावरुणा) हे विद्वान् पुरुषो ! तुम्हें (सुहवा) प्रेमपूर्वक (हवामहे) बुलाकर उपदेश करता हूँ कि तुम लोग (कारवः) कर्मशील बनकर (उभयस्य) राजा तथा प्रजा दोनों के कल्याण में (वस्वः) प्रयत्न करो और (ईशाना) ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर (मितज्ञवः) व्यायामसाधित लघुशरीरवाले (क्षेमस्य, प्रसवे) सबके लिए सुख की वृद्धि करो, (युवां) आप लोगों को उचित है कि (पृतनासु) युद्धों में (वह्नयः) उत्साही होकर (युत्सु) राज्य के संगठन में (युवां) तुम्हारा (इत्) ज्ञान वृद्धि को प्राप्त हो ॥४॥

    भावार्थ - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे अध्यापक तथा उपदेशकों ! मैं तुम्हें बुलाकर अर्थात् ज्ञान द्वारा मेरे समीप स्थित हुए तुम्हें उपदेश करता हूँ कि तुम अनुष्ठानी बनकर राजा तथा प्रजा दोनों के हित में प्रयन्त करो, क्योंकि अनुष्ठानशील पुरुष ही उपदेशों द्वारा संसार का कल्याण कर सकता है, अन्य नहीं। हे विद्वानों ! तुम युद्धविद्या के ज्ञाता बनकर सदैव अपने ज्ञान को बढ़ाते रहो और युद्ध में उत्साहपूर्वक शत्रुओं का दमन करते हुए राज्य के संगठन में सदा प्रयत्न करते रहो ॥४॥


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    पदार्थः -
    (इन्द्रावरुणा) भो विद्वांसः ! वयं युष्मान् (सुहवा) सुखेन हातव्यान् (हवामहे) आहूय उपदिशामि, यत् यूयं (कारवः) कर्मशीलाः सन्तः (उभयस्य) राज्ञः प्रजानां च कल्याणाय (वस्वः) प्रयतध्वम् (ईशाना) ऐश्वर्यसम्पन्ना भूत्वा (मितज्ञवः) सङ्कुचितजानुकाः =व्यायामादिप्रयत्नसम्पादितलघुशरीराः सन्तः (क्षेमस्य, प्रसवे) क्षेमोत्पादने निमित्तं भवत (युवाम्) यूयं (पृतनासु) शत्रुसेनासु (वह्नयः) सोत्साहाः सन्तः (युत्सु) युद्धेषु (युवाम्) युष्माकं (इत्) ज्ञानं वर्धतामिति युष्माभिः कर्तव्यम् ॥४॥


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    Meaning -
    Indra and Varuna, ruler and preserver of both the citizen and the state for earthly as well as for higher values, men of fiery passion and action call upon you in their joint struggles for advancement and fresh acquisitions. Men of settled vision and judgement seated on firm ground call upon you in their efforts for peace, preservation and stability. Creators of the wealth of the nation thus, we all call upon you in our battles for both yoga and kshema, progress and preservation in balance, constant watchers and instantly responsive as you are.


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    भावार्थ - परमात्मा उपदेश करतो हे अध्यापक व उपदेशकांनो! मी तुम्हाला आमंत्रित करून अर्थात ज्ञानाद्वारे माझ्या समीप स्थित झालेल्या तुम्हाला उपदेश करतो, की तुम्ही अनुष्ठान बनून राजा व प्रजा दोन्हींच्या हितासाठी प्रयत्न करा. कारण अनुष्ठानशील पुरुषच उपदेशाद्वारे जगाचे कल्याण करू शकतो, अन्य नव्हे. हे विद्वानांनो! तुम्ही युद्धविद्या जाणून सदैव आपले ज्ञान वाढवा. युद्धात उत्साहपूर्वक शत्रूंचे दमन करून राज्याच्या संगठनासाठी प्रयत्न करा. ॥४॥


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