ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 102/ मन्त्र 10
ऋषिः - प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
देवता - अग्निः
छन्दः - पादनिचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
विश्वे॑षामि॒ह स्तु॑हि॒ होतॄ॑णां य॒शस्त॑मम् । अ॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम् ॥
स्वर सहित पद पाठविश्वे॑षाम् । इ॒ह । स्तु॒हि॒ । होतॄ॑णाम् । य॒शःऽत॑मम् । अ॒ग्निम् । य॒ज्ञेषु॑ । पू॒र्व्यम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वेषामिह स्तुहि होतॄणां यशस्तमम् । अग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम् ॥
स्वर रहित पद पाठविश्वेषाम् । इह । स्तुहि । होतॄणाम् । यशःऽतमम् । अग्निम् । यज्ञेषु । पूर्व्यम् ॥ ८.१०२.१०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 102; मन्त्र » 10
अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 10; मन्त्र » 5
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अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 10; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Of all the yajnic creative powers of the world here in the field of action, adore Agni, most gracious and glorious, and first, foremost and most ancient power in the eternal yajna of creation.
मराठी (1)
भावार्थ
प्रभूच्या सृष्टीत नाना प्रकारचे देव - दिव्य पदार्थ आहेत. त्यांच्याकडून आम्ही अनेक उपकार घेतो. त्यांची गुणवंदना करतो; परंतु यामध्ये सर्वात अधिक पूर्ववर्ती व सर्व प्रकारे यशस्वी परमेश्वरच आहे. मानवाने त्याच्या गुणांचे गान करावे. ॥१०॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(इह यज्ञेषु) यहाँ यज्ञों में, सत्कर्म करने के समग्र अवसरों पर (विश्वेषाम्) सभी (होतॄणाम्) दानादान गुणविभूषित (विश्वेषाम्) समस्त देवों में (यशस्तमम्) सर्वाधिक यशस्वी (पूर्व्यम्) सर्वाधिक पूर्वतः विद्यमान (अग्निम्) ज्ञानस्वरूप तथा कर्मठ नेता प्रभु का (स्तुहि) गुणगान कर॥१०॥
भावार्थ
परमात्मा की सृष्टि में भाँति-भाँति के दिव्य पदार्थ हैं; उनसे हम अनेक उपकार पाते हैं और उनकी गुणवन्दना करते हैं। परन्तु इनमें सर्वाधिक पूर्ववर्ती एवं सर्व प्रकार से यशस्वी तो प्रभु ही है; मानव उसके गुणगान करे॥१०॥
विषय
उसकी स्तुति, सर्वरक्षक, सर्वकर्त्ता शिल्पी के तुल्य प्रभु।
भावार्थ
( विश्वेषाम् होतॄणाम् ) सब दाताओं में से ( यशस्तमं ) सबसे अधिक यशस्वी, ( पूर्व्यम् ) सबसे पूर्व विद्यमान, सबसे पूर्ण, प्रभु की, ( इह यज्ञेषु ) यहां यज्ञों, सत्संगों में (स्तुहि ) स्तुति कर। इति दशमो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रयोगो भार्गवोऽग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः। अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ। तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३—५, ८, ९, १४, १५, २०—२२ निचृद् गायत्री। २, ६, १२, १३, १६ गायत्री। ७, ११, १७, १९ विराड् गायत्री। १०, १८ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
यशस्तम 'होता'
पदार्थ
[१] संसार में एक से एक बढ़कर दाता हैं, प्रभु सर्वमहान् दाता हैं। (विश्वेषाम्) = सब (होतॄणाम्) = दाताओं में (यशस्तमम्) = सर्वाधिक यशस्वी प्रभु को (इह) = इस जीवन यज्ञ में (स्तुहि) = स्तुत कर। [२] उस (अग्निम्) = अग्रेणी प्रभु को स्तुत कर जो (यज्ञेषु पूर्व्यम्) = सब यज्ञों में, श्रेष्ठतम कर्मों में पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु ही सर्वमहान् दाता हैं, प्रभु ही हमारे यज्ञों का पालन व पूरण करते हैं।
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