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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 102 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 102/ मन्त्र 14
    ऋषिः - प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    यस्य॑ त्रि॒धात्ववृ॑तं ब॒र्हिस्त॒स्थावसं॑दिनम् । आप॑श्चि॒न्नि द॑धा प॒दम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यस्य॑ । त्रि॒ऽधातु॑ । अवृ॑तम् । ब॒र्हिः । त॒स्थौ । अस॑म्ऽदिनम् । आपः॑ । चि॒त् । नि । द॒ध॒ । प॒दम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्य त्रिधात्ववृतं बर्हिस्तस्थावसंदिनम् । आपश्चिन्नि दधा पदम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यस्य । त्रिऽधातु । अवृतम् । बर्हिः । तस्थौ । असम्ऽदिनम् । आपः । चित् । नि । दध । पदम् ॥ ८.१०२.१४

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 102; मन्त्र » 14
    अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 11; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The three-quality mind of the celebrant with sattva, rajas and tamas, open and unfettered, is the seat of Agni where peace and potential for action both have their seat.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    वेदवाणीद्वारे प्रभूचे गुणगान करणाऱ्या उपासकाचे अंत:करण हळूहळू शांतीचे आवासस्थान बनते. ॥१४॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (यस्य) जिस ऐसे गुणगायक स्तोता का (त्रिधातु) सत्त्व, रज तथा तम--इन तीन गुणों का धारक, (अवृतम्) बिना ढंपा, (बर्हिः) अन्तःकरणरूप आसन, (असन्दिनम्) बन्धनरहित (तस्थौ) स्थित है; उस अन्तःकरण में (आपः) शान्ति (चित्) निश्चय ही (पदम्) अपना निवास (निदधा) बना लेती है॥१४॥

    भावार्थ

    वेदवाणी में परमात्मा का गुणगान करने वाले उपासक का अन्तःकरण शनैः-शनैः शान्ति का आवास स्थल हो जाता है॥१४॥

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    विषय

    सर्व प्रकाशक, परम सुखदायक प्रभु की स्तुति भक्ति और उपासना।

    भावार्थ

    जिस प्रकार अग्नि तत्व के लिये ( त्रिधातु बर्हिः ) तीनों प्रकार के लोक आश्रय है, उसी प्रकार (त्रिधातु) तीनों प्रकार के (अवृतं ) क्रिया रहित (बर्हिः) लोक ( असंदिनम् ) असम्बद्ध होकर (यस्य) जिसके आश्रय पर क्रियावान् और सम्बद्ध हैं और जिसमें ( आपः चित् ) समस्त प्रकृति आदि पदार्थ और जीवगण, प्रजावत् ( पदं नि दध ) स्थिति प्राप्त करते हैं उसको तू हृदय में स्थान दे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रयोगो भार्गवोऽग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः। अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ। तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३—५, ८, ९, १४, १५, २०—२२ निचृद् गायत्री। २, ६, १२, १३, १६ गायत्री। ७, ११, १७, १९ विराड् गायत्री। १०, १८ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    उपासना से हृदय की पवित्रता

    पदार्थ

    [१] (यस्य) = जिस प्रभु का (बर्हिः) = यह हृदयरूप आसन (त्रिधातु) = 'ज्ञान, कर्म, उपासना' तीनों का धारण करनेवाला होता हुआ (तस्थै) = स्थित होता है। जब हम हृदय को प्रभु का आसन बनाते हैं, तो यह ज्ञान, कर्म व उपासना तीनों का धारण करनेवाला होता है। (अवृतम्) = यह काम-क्रोध से संवृत नहीं होता, इस पर काम आदि का आवरण नहीं पड़ जाता। (असन्दिनम्) = यह विषय वासनाओं से बद्ध नहीं होता। [२] हृदय को प्रभु का आसन बनाने पर वासनाओं के विनाश के कारण (आपः चित्) = ये रेतःकणरूप जल भी (पदं निदधा) = शरीर में स्थिति को प्राप्त करते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- हृदय में प्रभु का ध्यान करने पर हृदय [क] ज्ञान, कर्म, उपासना का धारण करनेवाला बनता है, [ख] काम आदि से संवृत नहीं होता, [ग] विषयों से अबद्ध रहता है। उस समय शरीर में उत्पन्न रेतःकणों की शरीर में ही स्थिति होती है।

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