ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 2/ मन्त्र 39
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - आर्षीगायत्री
स्वरः - षड्जः
य ऋ॒ते चि॒द्गास्प॒देभ्यो॒ दात्सखा॒ नृभ्य॒: शची॑वान् । ये अ॑स्मि॒न्काम॒मश्रि॑यन् ॥
स्वर सहित पद पाठयः । ऋ॒ते । चि॒त् । गाः । प॒देभ्यः॑ । दात् । सखा॑ । नृऽभ्यः॑ । शची॑ऽवान् । ये । अ॒स्मि॒न् । काम॑म् । अश्रि॑यन् ॥
स्वर रहित मन्त्र
य ऋते चिद्गास्पदेभ्यो दात्सखा नृभ्य: शचीवान् । ये अस्मिन्काममश्रियन् ॥
स्वर रहित पद पाठयः । ऋते । चित् । गाः । पदेभ्यः । दात् । सखा । नृऽभ्यः । शचीऽवान् । ये । अस्मिन् । कामम् । अश्रियन् ॥ ८.२.३९
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 2; मन्त्र » 39
अष्टक » 5; अध्याय » 7; वर्ग » 24; मन्त्र » 4
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अष्टक » 5; अध्याय » 7; वर्ग » 24; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
अथ कर्मयोगिनः शक्तिमत्त्वं परशक्त्युत्पादकत्वञ्च वर्ण्यते।
पदार्थः
(ये) ये जनाः (अस्मिन्) अस्मिन् कर्मयोगिनि (कामं) अभिलाषं (अश्रियन्) निदधते (नृभ्यः) तेभ्यो नरेभ्यः (शचीवान्) क्रियावान् (सखा) हितः (यः) यः कर्मयोगी (ऋते, चित्, पदेभ्यः) विनैव पदवीः (गाः) शक्तीः (दात्) ददाति ॥३९॥
विषयः
विश्वासिने परमात्मा सर्वं ददतीति शिक्षते ।
पदार्थः
य इन्द्रः । ऋते चित्=प्रत्युपकारकामनां विनैव । पदेभ्यः=पद्यन्ते गच्छन्ति ईश्वरीयतत्त्वं प्राप्नुवन्ति जानन्ति ये ते पदास्तत्त्वविदस्तेभ्यः । नृभ्यः=मनुष्येभ्यः । गाः=वाणीः पश्वादिविविधपदार्थांश्च । दात्=ददाति । ये धार्मिकाः । अस्मिन् इन्द्रे । कामम्=स्व-स्वमभिलाषम् । अश्रियन्= श्रयन्ति स्थापयन्ति । कीदृश इन्द्रः । सखा=सर्वेषां परममित्रम् । पुनः । शचीवान्=शक्तिमान् ॥३९ ॥
हिन्दी (4)
विषय
अब कर्मयोगी को शक्तिसम्पन्न तथा शक्तियों का प्रदाता कथन करते हैं।
पदार्थ
(ये) जो पुरुष (अस्मिन्) इस कर्मयोगी में (कामं) कामनाओं को (अश्रियन्) रखते हैं, वह (नृभ्यः) उन मनुष्यों के लिये (शचीवान्) प्रशस्तक्रियावान् (सखा) हितकारक (यः) जो कर्मयोगी (पदेभ्यः, ऋते, चित्) पदवियों के विना ही (गाः) शक्तियों को (दात्) देता है ॥३९॥
भावार्थ
प्रशस्तक्रियावान् कर्मयोगी, जो सबका हितकारक, विद्यादि शुभ गुणों का प्रचारक और जिसमें सब प्रकार की शक्तियें विद्यमान हैं, वह अशक्त को भी शक्तिसम्पन्न करता और कामना करनेवाले विद्वानों के लिये पूर्णकाम होता है, जिससे वह अपने मनोरथ को सुखपूर्वक सफल कर सकते हैं ॥३९॥
विषय
विश्वासी को ईश्वर सब कुछ देता है, यह शिक्षा इससे देते हैं ।
पदार्थ
(यः) जो परमात्मा (सखा) सबका परममित्र और (शचीवान्) सर्वशक्तिमान् है (अस्मिन्) उस इस इन्द्र में (ये) जो धर्मपरायण जन (कामम्) निज-२ इच्छा, विश्वास, प्रीति और आशा (अश्रियन्) रखते हैं (पदेभ्यः) उन ज्ञानी तत्त्वविद् (नृभ्यः) भक्तजनों को वह इन्द्र (ऋते+चित्) प्रत्युपकार की कामना के विना ही (गाः) गौ आदि पशु और हिरण्य आदि नाना पदार्थ (दात्) देता है ॥३९ ॥
भावार्थ
हे मेधाविजनो ! तुम ईश्वर में श्रद्धा, विश्वास, प्रीति और आशा स्थापित करो । वह सबका सखा सर्वप्रद और सर्वशक्तिमान् है, वह सर्वयोग्य वस्तु तुमको देगा ॥३९ ॥
विषय
स्तुत्य प्रभु । उससे प्रार्थनाएं ।
भावार्थ
( यः ) जो ( ऋते ) सत्य ज्ञानमय, परम प्राप्तव्य प्रभु में या सत्य ज्ञान के बल पर ( पदेभ्यः ) प्राप्त होने वाले ( नृभ्यः ) मनुष्यों का ( सखा शचीवान् ) शक्तिशाली मित्र होकर ( गाः दात् ) वाणियों को प्रदान करता है, और ( ये ) जो ( अस्मिन् ) इस में ( कामम् ) अपनी समस्त अभिलाषाओं को ( अश्रियन् ) धरते और प्राप्त कर लेते हैं उनका भी वह मित्र है ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मेध्यातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः । ४१, ४२ मेधातिथिर्ऋषिः ॥ देवता:—१—४० इन्द्रः। ४१, ४२ विभिन्दोर्दानस्तुतिः॥ छन्दः –१– ३, ५, ६, ९, ११, १२, १४, १६—१८, २२, २७, २९, ३१, ३३, ३५, ३७, ३८, ३९ आर्षीं गायत्री। ४, १३, १५, १९—२१, २३, २४, २५, २६, ३०, ३२, ३६, ४२ आर्षीं निचृद्गायत्री। ७, ८, १०, ३४, ४० आर्षीं विराड् गायत्री। ४१ पादनिचृद् गायत्री। २८ आर्ची स्वराडनुष्टुप्॥ चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
सखा शचीवान्
पदार्थ
[१] (यः) = जो प्रभु (ऋते चित्) = सत्य ज्ञान की प्राप्ति कराने के निमित्त ही (पदेभ्यः) = [पद् गतौ] गतिशील (नृभ्यः) = मनुष्यों के लिये (गाः) = ज्ञान की वाणियों को (दात्) = देते हैं। वे प्रभु ही हमारे (सखा) = सच्चे मित्र हैं। (शचीवान्) = वे प्रभु ही सब कर्मों व प्रज्ञानोंवाले हैं। [२] ये प्रभु उन मनुष्यों के लिये इन ज्ञान की वाणियों को प्राप्त कराते हैं (ये) = जो (अस्मिन्) = इस प्रभु में (कामं अश्रियन्) = अपनी सब इच्छाओं को आश्रित करते हैं । अर्थात् प्रभु के प्रति जो आत्मार्पण करनेवाले होते हैं, उनके लिये प्रभु इन ज्ञानों को अवश्य प्राप्त कराते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमारे सच्चे सखा हैं, वे शक्ति व प्रज्ञान के भण्डार हैं। ये अपने प्रति आत्मार्पण करनेवाले गतिशील पुरुषों के लिये ज्ञान की वाणियों को प्राप्त कराते हैं।
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra is a friend and mighty commander of forces and, without visible motion or lure of office, gives the gift of speech and powers of perception and intelligence to people who surrender their desires and ambitions to him and act selflessly, depending on him for success.
मराठी (1)
भावार्थ
प्रशस्त क्रियावान कर्मयोगी जो सर्वांचा हितकारक, विद्या इत्यादी शुभ गुणांचा प्रचारक व ज्याच्यामध्ये सर्व प्रकारच्या शक्ती विद्यमान आहेत. तो अशक्तालाही शक्तिसंपन्न करतो व कामना करणाऱ्या विद्वानांसाठी पूर्णकाम असतो. त्यामुळे ते आपल्या मनोरथांना सुखपूर्वक सफल करू शकतात. ॥३९॥
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