ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 29 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 29/ मन्त्र 1
    ऋषि: - मनुर्वैवस्वतः कश्यपो वा मारीचः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - आर्चीगायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    (बभ्रुः) सर्वेन्द्रियधारक और पोषक (विषुणः) इतस्ततः गमनशील (सूनरः) इन्द्रियों का सुनेता तथा (युवा) सबमें योग देनेवाला (एकः) एक मनोरूप देव (हिरण्ययम्) सुवर्णमय (अञ्जि) भूषण (अङ्क्ते) दिखला रहा है ॥१॥

    भावार्थ -

    वस्तुतः मनोरूप इन्द्रिय इस शरीर में एक अद्भुत भूषण है। इसको जो जानता है और अच्छे काम में इसको लगाता है, वही मनुष्य जाति में भूषण बनता है ॥१॥

    पदार्थ -

    बभ्रुः=बिभर्ति=इतराणि सर्वाणि इन्द्रियाणि धारयति=पोषयति च यः सः। बभ्रुः। विषुणः=विष्वगञ्चनः। इतस्ततो गमनशीलाः। सूनरः=सुष्ठु इन्द्रियाणां नेता। युवा=सर्वैरिन्द्रियैः सहयोगकर्त्ता=मिश्रयिता अमिश्रयिता च। एकः=मनोदेवः। हिरण्ययम्=हिरण्यमयम्। अञ्जि=आभरणम्। अभिव्यज्यते प्रकाश्यतेऽनेनेत्यञ्जि आभरणम्। अङ्क्ते=अभिव्यञ्जयति ॥१॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top