ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 19
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - विराड्गायत्री
स्वरः - षड्जः
वि षू च॑र स्व॒धा अनु॑ कृष्टी॒नामन्वा॒हुव॑: । इन्द्र॒ पिब॑ सु॒ताना॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठवि । सु । च॒र॒ । स्व॒धाः । अनु॑ । कृ॒ष्टी॒नाम् । अनु॑ । आ॒ऽहुवः॑ । इन्द्र॑ । पिब॑ । सु॒ताना॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
वि षू चर स्वधा अनु कृष्टीनामन्वाहुव: । इन्द्र पिब सुतानाम् ॥
स्वर रहित पद पाठवि । सु । चर । स्वधाः । अनु । कृष्टीनाम् । अनु । आऽहुवः । इन्द्र । पिब । सुतानाम् ॥ ८.३२.१९
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 19
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 4; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 4; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Go forward, Indra, in response to the invitation to yajna of the people and drink of the soma extracted, distilled and offered by them.
मराठी (1)
भावार्थ
या जगात परमात्मा परिश्रमी व्यक्तींना त्यांच्याद्वारे यज्ञासाठी केल्या गेलेल्या कर्मानुसार भोग देतो. राजा राष्ट्राच्या व्यक्तींना त्यांच्या कर्मानुसार भोग्य पदार्थ देतो. ॥१९॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् अथवा राजन्! (कृष्टीनाम्) परिश्रमी प्रजा की (आहुवः अनु) पुकार अथवा यज्ञीय भावना के अनुरूप और ( स्वधा अनु) अपने स्वाभाविक दृढ़ निश्चय के अनुरूप (वि सुचर) विविध प्रकार से व्यवहार कर; हे इन्द्र! (सुतानाम्) निष्पन्न पदार्थों का (पिब) उपभोग करो ॥१९॥
भावार्थ
संसार में प्रभु परिश्रमियों को उनके द्वारा यज्ञ के लिए किए कर्मानुसार भोग भुगवाता है; राजा राष्ट्र के लोगों को उनके कर्मों के अनुरूप भोग्य पदार्थ प्रदान करता है ॥१९॥
विषय
जीव को कर्मफल भोग का उपदेश।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! तू ( सुतानां ) जगत् में उत्पन्न जीवों का (पिब) पालन कर। तू (कृष्टीनाम्) समस्त मनुष्यों को (आ-हुव:) सब से आदरपूर्वक प्रार्थना करने योग्य और सब सुख देने वाला है तू ( स्वधा अनु ) अपनी शक्ति से जगत् का धारक होकर ( वि सु चर ) अच्छी प्रकार सर्वत्र व्याप, ( अनु चर ) कर्मों के अनुसार उनको फल प्रदान कर। अथवा हे इन्द्र ! जीवात्मन् ! तू (कृष्टीनां) अपने आप कृष्टिवत् परिश्रम से बोये बीजों की ( स्वधाः अनु ) स्वयं परिपुष्ट, स्वयं उत्पन्न के समान अपने किये कर्मों का ( वि सु चर ) उत्तम और विपरीत फल प्राप्त कर। ( अनु आ हुवः ) उनके अनुकूल ही सुख, दुःख प्राप्त कर ( सुतानां ) उत्पन्न फलों का ही ( पिब ) पालन कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥
विषय
प्रभु स्मरण व आत्मधारणशक्ति
पदार्थ
[१] हे प्रभो! आप (स्वधाः अनु) = आत्मधारणशक्तियों के अनुपात में (वि सु चर) = विशेषरूप से हमारे हृदय देशों में सम्यक् गतिवाले होइये । वास्तव में जितना जितना हम आपका हृदय में स्मरण करते हैं, उतना उतना ही आत्मधारण के योग्य बनते हैं । [२] हे प्रभो! आप (कृष्टीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों के (अनु आहुवः) = अनुकूलता से आह्वान के योग्य हैं। ये श्रमशील व्यक्ति आपको पुकारते हैं। आपका आराधन ही उन्हें 'कृष्टि' बनाता है। हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! आप (सुतानाम्) = हमारे शरीरों में उत्पन्न इन सोमों का (पिब) = पान करिये, इसे शरीर में ही सुरक्षित करिये।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु स्मरण हमें आत्मधारणशक्ति देता है, हमें 'कृष्टि' बनाता है, हमारे अन्दर सोम का रक्षण करता है।
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