ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 39 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 39/ मन्त्र 1
    ऋषि: - नाभाकः काण्वः देवता - अग्निः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    (इन्द्राग्नी) हे राजन् तथा हे दूत ! आप दोनों (सुन्वतः) शुभ कर्मों में प्रवृत्त (श्यावाश्वस्य) रोगी पुरुष का तथा (अत्रीणाम्) माता, पिता और बन्धु इन तीनों से रहित अनाथों का (हवम्) निवेदन (शृणुतम्) सुनिये। और (सोमपीतये) सोमादि पदार्थों को पीने के लिये यहाँ आवें ॥८॥

    भावार्थ -

    रोगी और अनाथादि सबसे प्रथम द्रष्टव्य और पालनीय है ॥८॥

    पदार्थ -

    हे इन्द्राग्नी ! युवाम्। सुन्वतः=कर्माणि कुर्वतः। श्यावाश्वस्य=रुग्णेन्द्रियस्य। अत्रीणाम्=अनाथानाञ्च। हवम्=आह्वानम्। शृणुतम्। तथा सोमपीतये। आगच्छतम् ॥८॥

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