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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 14
    ऋषिः - त्रिशोकः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    क॒कु॒हं चि॑त्त्वा कवे॒ मन्द॑न्तु धृष्ण॒विन्द॑वः । आ त्वा॑ प॒णिं यदीम॑हे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क॒कु॒हम् । चि॒त् । त्वा॒ । क॒वे॒ । मन्द॑न्तु । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । इन्द॑वः । आ । त्वा॒ । प॒णिम् । यत् । ईम॑हे ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ककुहं चित्त्वा कवे मन्दन्तु धृष्णविन्दवः । आ त्वा पणिं यदीमहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ककुहम् । चित् । त्वा । कवे । मन्दन्तु । धृष्णो इति । इन्दवः । आ । त्वा । पणिम् । यत् । ईमहे ॥ ८.४५.१४

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 14
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 44; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    While we pray to you, generous lord, and ask for what we want, O cosmic poet and visionary, may our yajnas and soma celebrations please you, most high and supreme lord of power, justice and award.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ईश्वर स्वत: पणि (व्यवहाराचा जाणकार) आहे. तुम्ही त्याला जे द्याल त्याच्या बदल्यात तो तुम्हालाही काही देईल त्यासाठी त्याची सेवा करा. ॥१४॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे कवे=परमज्ञानिन् ! हे धृष्णो ! पापान् प्रति भयंकर ! इन्दवः=भूमे स्थावरा जङ्गमाश्च पदार्थाः । ककुहं चित्=सर्वश्रेष्ठं सर्वोपरि । त्वा=त्वाम् । मदन्तु=आनन्दयन्तु । हे इन्द्र ! यद्=यदा वयम् । पणिं=व्यवहारकुशलं त्वा=त्वाम् । आ+ईमहे=आभिमुख्येन याचामहे ॥१४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (कवे) हे महाकवि हे परमज्ञानी देव (धृष्णो) हे पापियों के प्रति महाभयङ्कर देव ! यद्यपि आप (ककुहम्) महाश्रेष्ठ और सर्वोत्तम हैं तथापि (त्वाम्) आपको (इन्दवः) ये समस्त स्थावर और जङ्गम पदार्थ (मदन्तु) आनन्द देवें । हे भगवन् ! (यद्) जब हम उपासक (त्वाम्+पणिम्) आपको पणि अर्थात् व्यवहारकुशल जानकर (आ) आपके समीप और आपकी ओर होकर (ईमहे) अपना अभीष्ट माँगें ॥१४ ॥

    भावार्थ

    ईश्वर स्वयं पणि है, उसको जो तुम दोगे, उसके बदले में वह भी कुछ तुमको देगा, अतः उसकी सेवा करो ॥१४ ॥

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    विषय

    ऐश्वर्यवान् प्रभु।

    भावार्थ

    हे ( कवे ) क्रान्तदर्शिन् ! विद्वन् ! हे ( धृष्णो ) शत्रुओं को पराजित करने हारे ! ( ककुहं ) विनीत, श्रेष्ठ ( त्वा ) तुझको ( इन्दवः ) नाना ऐश्वर्य ( मन्दन्तु ) सदा प्रसन्न, तृप्त, भरा पूरा किये रखते हैं। ( यत् ) जिससे हम (पणिं त्वां) उत्तम व्यापारी तुझ से ( आ ईमहे ) धनादि की याचना करते हैं। तू व्यापारी होकर ऐश्वर्य से भरपूर होकर खूब प्रसन्नता से दान दे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    'ककुहं पणिम्'

    पदार्थ

    [१] हे (कवे) = सर्वज्ञ [क्रान्तप्रज्ञ] (धृष्णो) = शत्रुधर्षक प्रभो ! (ककुहं) = सर्वश्रेष्ठ [शिखर - भूत] (त्वा) = आपको (चित्) = निश्चय से (इन्दवः) = ये सोमकण [सब ऐश्वर्य] (मन्दन्तु) = आनन्दित करते हैं। जब हम सोमकणों का रक्षण करते हैं, तो ये रक्षित सोमकण हमारे जीवन में आपके प्रकाश को बढ़ाते है और इस प्रकार हमें आपका प्रिय बनाते हैं। [२] यह वह समय है (यत्) = जब (पणि) = [पण स्तुतौ] स्तुति के योग्य आपको आ ईमहे सब प्रकार से प्राथत करते हैं। प्रभु से सब उचित साधनों को पाकर हम उन साधनों के सत्प्रयोग से प्रभु को पानेवाले बनते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु की आराधना करते हुए हम सोमरक्षण से प्रभु को प्रसन्न करके सब उचित साधनों को प्राप्त कराने के लिए प्रभु से प्रार्थना करते हैं।

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