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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 47 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 47/ मन्त्र 6
    ऋषिः - त्रित आप्त्यः देवता - आदित्याः छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    प॒रि॒ह्वृ॒तेद॒ना जनो॑ यु॒ष्माद॑त्तस्य वायति । देवा॒ अद॑भ्रमाश वो॒ यमा॑दित्या॒ अहे॑तनाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒रि॒ऽह्वृ॒ता । इत् । अ॒ना । जनः॑ । यु॒ष्माऽद॑त्तस्य । वा॒य॒ति॒ । देवाः॑ । अद॑भ्रम् । आ॒श॒ । वः॒ । यम् । आ॒दि॒त्याः॒ । अहे॑तन । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परिह्वृतेदना जनो युष्मादत्तस्य वायति । देवा अदभ्रमाश वो यमादित्या अहेतनानेहसो व ऊतय: सुतयो व ऊतय: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परिऽह्वृता । इत् । अना । जनः । युष्माऽदत्तस्य । वायति । देवाः । अदभ्रम् । आश । वः । यम् । आदित्याः । अहेतन । अनेहसः । वः । ऊतयः । सुऽऊतयः । वः । ऊतयः ॥ ८.४७.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 47; मन्त्र » 6
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Adityas, powers of light and lightning speed, even though a person might be living in distress, he raises and expands what you give him and rises to higher joy and prosperity when you approach him and bless. Sinless are your protections, holy and noble your safeguards and securities.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    राष्ट्रनियमानुकूल चालण्याने जगात कल्याण होते. राष्ट्र चालविणारे विद्वान हितैषी, नि:स्वार्थी व विषयविमुख असले पाहिजेत. ॥६॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    परिह्वृता+इत्=क्लेशेनैव । अना=प्राणान् धारयन् जनः । युष्मादत्तस्य=युष्माभिर्दत्तं धनं प्राप्य । वायति=वर्धते । हे देवाः । हे आशवः=शीघ्रगामिनः ! हे आदित्याः=सभासदः ! यूयम् । यं=जनम् । अहेतन=प्राप्नुथ । स जनः । अदभ्रमनल्पं धनं प्राप्नोति । शिष्टं व्याख्यातम् ॥६ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    हे सभाध्यक्ष जनो ! (परिह्वृता+इत्) क्लेश से ही (अना) प्राण धारण करता हुआ (जनः) जन (युष्मादत्तस्य) आपसे पुरस्कारस्वरूप धन पाकर (वायति) जगत् में बढ़ता है (देवाः) हे देवो ! (आशवः) हे शीघ्रगामी जनो (आदित्याः) हे सभ्य पुरुषो ! (यम्) जिस सज्जन के निकट (अहेतनः) आप जाते हैं (अदभ्रम्) वह अधिक आनन्द, बहुत धन और बहुत सुख पाता है (अनेहसः) इत्यादि पूर्ववत् ॥६ ॥

    भावार्थ

    राष्ट्रनियमानुकूल चलने से जगत् में कल्याण होता है । राष्ट्र चलानेवाले विद्वान् हितैषी अस्वार्थी और विषयविमुख होने चाहियें ॥६ ॥

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे ( देवाः ) दानशील, ( आशवः ) शीघ्रगामी, ( आदित्याः ) सूर्य किरणवत् तेजस्वी जनो ! आप लोग ( यम् अदभ्रम् ) जिस अनल्प गुणवान्, अधिक बलशाली, वा अहिंसनीय, जन को ( अहेतन ) शासन करते, संचालित करते हो वह ( जनः ) जन ( परिह् वृता इत् अना ) कुटिलता से रहित ही जीवन से ( युष्मा-दत्तस्य ) आप लोगों के दिये ज्ञान और धन को ( वायति ) परम्परा से प्राप्त कर सकता है।

    टिप्पणी

    ( अनेहस: ० इत्यादि पूर्ववत् )

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रित आप्त्य ऋषिः॥ १-१३ आदित्यः। १४-१८ आदित्या उषाश्च देवताः॥ छन्द:—१ जगती। ४, ६—८, १२ निचृज्जगती। २, ३, ५, ९, १३, १६, १८ भुरिक् त्रिष्टुप्। १०, ११, १७ स्वराट् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। अष्टादशर्चं सूक्तम्।

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    विषय

    अदन धन

    पदार्थ

    [१] (परिहृता इत् अना) = तप नियम आदि से परिपीड़ित शरीर से ही युक्त (जनः) = मनुष्य (युष्मादत्तस्य) = हे देवो! आपसे दिये हुए धन को (वायति) = प्राप्त होता है। [२] हे (आशवः) = शीघ्र गतिवाले (आदित्याः) = अच्छाइयों का आदान करनेवाले (देवा:) = देवो! आप (यं) = जिसको (अहेतन) = व्याप्त करते हो-प्राप्त होते हो, वह वह (अदभ्रं) = अनल्प बहुत अधिक धन को प्राप्त होता है । (वः) = तुम्हारे (ऊतयः) = रक्षण (अनेहसः) = हमें निष्पाप बनानेवाले हैं। (वः) = आपके (ऊतयः) = रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ-तपस्वी पुरुष ही आदित्यों से अनल्प धन को प्राप्त करता है।

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