Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 64 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 64/ मन्त्र 12
    ऋषिः - प्रगाथः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    तम॒द्य राध॑से म॒हे चारुं॒ मदा॑य॒ घृष्व॑ये । एही॑मिन्द्र॒ द्रवा॒ पिब॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । अ॒द्य । राध॑से । म॒हे । चारु॑म् । मदा॑य । घृष्व॑ये । आ । इ॒हि॒ । ई॒म् । इ॒न्द्र॒ । द्रव॑ । पिब॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तमद्य राधसे महे चारुं मदाय घृष्वये । एहीमिन्द्र द्रवा पिब ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । अद्य । राधसे । महे । चारुम् । मदाय । घृष्वये । आ । इहि । ईम् । इन्द्र । द्रव । पिब ॥ ८.६४.१२

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 64; मन्त्र » 12
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 45; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    To that soma yajna being performed for gifts of great wealth and power, excitement and joy, and the destruction of negativities, pray come fast and drink the soma of love, faith and homage.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वराची उपासना करणाऱ्याला धन व आनंदाची कमतरता नसते. ॥१२॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    वयम् । चारुम्=परमसुन्दरम् । तमद्य=तमिन्द्रम् अस्मिन् दिने । राधसे=अन्नाय=आराधनाय वा । मदाय= आनन्दाय । घृष्वये=शत्रूणां विनाशाय च स्तुम इति शेषः । हे इन्द्र ! स त्वम् । एहि । ईम्=इदानीम् । द्रव पिब च ॥१२ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    हम उपासक (अद्य) आज (चारुम्) परमसुन्दर (तम्) उस परमदेव की स्तुति करते हैं, (राधसे) धन और आराधना के लिये (मदाय) आनन्द के लिये और (घृष्वये) निखिल शत्रु के विनाश के लिये उसकी उपासना करते हैं । (इन्द्र) हे इन्द्र ! वह तू (ईम्) इस समय (एहि) आ, (द्रव) कृपा कर और (पिब) कृपादृष्टि से देख ॥१२ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    राजा का अभिषेक रहस्य।

    भावार्थ

    ( अद्य ) आज हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! ( आ इहि ) आ। ( तम् चारुं ) उस उत्तम वा चरण अर्थात् फल रूप में उपभोग योग्य ऐश्वर्य पद को ( महे राधसे ) बड़े भारी धन प्राप्ति के लिये और ( घृष्वये मदाय ) शत्रु-पराजयकारी, आनन्द लाभ के लिये ( द्रव ) प्राप्त हो और (आ पिब ) पालन और उपभोग कर। इति पञ्चचत्वारिंशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रगाथः काण्व ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ५, ७, ९ निचृद् गायत्री। ३ स्वराड् गायत्री। ४ विराड् गायत्री। २, ६, ८, १०—१२ गायत्री। द्वादशर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    राधसे-मदाय- घृष्वये

    पदार्थ

    [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (तम्) = उस (चारुं) = सुन्दर अथवा चरणीय [भक्षणीय] सोम को (महे) = महान् (राधसे) = सफलता व ऐश्वर्य के लिए (पिब) = शरीर में ही पीनेवाला हो। [२] पिया हुआ यह सोम (मदाय) = आनन्द के लिए होता है तथा (घृष्वये) = शत्रुओं के घर्षण के लिए होता है। (एहि) = आओ द्रव = गतिमय जीवनवाले बनो और ईम् इस समय इस सोम का पान करो। शरीर में ही इसे सुरक्षित करो।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम महान् साफल्य के लिए होता है। आनन्द को प्राप्त कराता है तथा शत्रुओं का घर्षण करता है। अगले सूक्त के ऋषि देवता भी 'प्रागाथ काण्व' व 'इन्द्र' हैं-

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top