ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 74 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 74/ मन्त्र 1
    ऋषि: - गोपवन आत्रेयः देवता - अग्निः छन्दः - निचृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः
    पदार्थ -

    हे राजा अमात्य ! सृष्टि की विभूति देखिये। (उषाः) प्रातःकालरूपा देवी (ऋतावरी) परम सत्या है, समानकाल में वह सदा आती है। आलस्य कभी नहीं करती। पुनः (अरुणाप्सुः) वह शुभ्रवर्णा (अभूत्) हुई पुनः (ज्योतिः) प्रकाश (अकः) करती है। ऐसे पवित्र काल में आपकी ओर से रक्षा अवश्य होनी चाहिये ॥१६॥

    पदार्थ -

    हे राजामात्यौ ! दृश्यतां सृष्टेर्विभूतिः कार्य्यपरायणता चेति शिक्षते। यथा−उषा ऋतावरी=परमसत्यास्ति। समानकाले सदाऽऽगच्छति। नालस्यं कदापि विदधाति। पुनः। अरुणाप्सुः=शुभवर्णा अभूत्। पुनश्च। ज्योतिः=प्रकाशञ्च। अकः=करोति। ईदृशे काले युवयो रक्षयाऽवश्यं भाव्यम् ॥१६॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top