ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 75 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 75/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विरुपः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    (अहम्) मैं उपासक (आर्क्षे) सामान्यतया मनुष्य के निमित्त (श्रुतर्वणि) श्रोतृजनों के निमित्त और (मदच्युति) मनुष्यजाति में आनन्द की वर्षा के लिये (हुवानः) ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ और मनुष्यमात्र के जो (स्तुकाविनाम्) ज्ञानविज्ञानसहित (चतुर्णाम्) नयन, कर्ण, घ्राण और रसना ये चारों ज्ञानेन्द्रिय हैं, उनके (शीर्षा) शिर (शर्धांसि+इव) परम बलिष्ठ होवें और (मृक्षा) शुद्ध और पवित्र होवें ॥१३॥

    भावार्थ -

    अहम्=इस पद से केवल एक ऋषि का बोध नहीं, किन्तु जो कोई ईश्वर से प्रार्थना करे, उस सबके लिये अहम् पद आया है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक ज्ञानी जन अपनी जाति के कल्याण के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे, जिससे मनुष्यमात्र के ज्ञानेन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति के लिये चेष्टा करें ॥१३॥

    पदार्थ -

    अहमुपासकः। आर्क्षे=सामान्येन सर्वेषां मनुष्याणां निमित्ते। श्रुतर्वणि=श्रोतॄणां निमित्ते। मदच्युति=आनन्दानां च्योतनाय। हुवानः=परमात्मानं स्तुवन्नस्मि। स्तुकाविनां= विज्ञानादिसहितानाम्। चतुर्णाम्=चक्षुरादीनाम्। शीर्षा=शिरांसि। शर्धांसि इव=बलवन्ति इव भवन्तु। तथा मृक्षा=शुद्धानि भवन्तु ॥१३॥

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