ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 78 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 78/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कुरुसुतिः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    हे राजन् ! (ते) तुमने (एता) मनुष्यों की इन व्यवहारसम्बन्धी वस्तुओं को (च्यौत्नानि) सुदृढ़ और नियमों से सुबद्ध (कृता) किया है (वर्षिष्ठानि) अतिशय उन्नत किया है और (परीणसा) और जो अनम्र दुष्कर और कठिन काम थे, उनको नम्र सुकर और ऋजु कर दिया है, क्योंकि तुम (हृदा) हृदय से (वीळु) स्थिर करके (अधारयः) उनको रखते हो अर्थात् यह अवश्यकर्त्तव्य है, ऐसा मन में स्थिर करके रखते हो ॥९॥

    भावार्थ -

    जो राजा मन में दृढ़ संकल्प रखता है, वह उत्तमोत्तम कार्य्य करके दिखलाता है ॥९॥

    पदार्थ -

    हे राजन् ! ते=त्वया। एता=एतानि=मनुष्याणां व्यावहारिकाणि वस्तूनि। च्यौत्नानि=सुदृढानि नियमसुबद्धानि। कृता=कृतानि। वर्षिष्ठानि=अतिशयेन प्रवृद्धानि कृतानि। पुनः। परीणसा=परितो न तानि कृतानि। यतस्त्वम्। हृदा। वीळु=स्थिराणि। अधारयः। इदमवश्यमेव कर्त्तव्यमिति हृदि धारयसि ॥९॥

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