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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 94 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 94/ मन्त्र 11
    ऋषिः - बिन्दुः पूतदक्षो वा देवता - मरूतः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    त्यान्नु ये वि रोद॑सी तस्त॒भुर्म॒रुतो॑ हुवे । अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्यान् । नु । ये । वि । रोद॑सी॒ इति॑ । त॒स्त॒भुः । म॒रुतः॑ । हु॒वे॒ । अ॒स्य । सोम॑स्य । पी॒तये॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्यान्नु ये वि रोदसी तस्तभुर्मरुतो हुवे । अस्य सोमस्य पीतये ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्यान् । नु । ये । वि । रोदसी इति । तस्तभुः । मरुतः । हुवे । अस्य । सोमस्य । पीतये ॥ ८.९४.११

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 94; मन्त्र » 11
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 29; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Those Maruts, nature’s powers of divine energy who stabilise the regions of heaven and earth in the cosmos, those Maruts, scholars, scientists and pioneers of vibrant nature and energy who maintain the laws and values of heaven and earth in human life, I call, to join them in the experience of the delight and ecstasy of this joyous world of beauty.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जगातील पदार्थांचे ज्ञान तात्त्विक रूपाने जाणणारे विद्वानच त्याचा बोध दुसऱ्यांना करवू शकतात. ॥११॥

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    हिन्दी (2)

    पदार्थ

    (ये) जो (मरुतः) मानव (रोदसी) धरती तथा (द्युलोक) दोनों में स्थित पदार्थों को (वितस्तभुः) विशेष रूप से बनाए रखते हैं (त्यान् नु) निश्चय ही उन्हीं को मैं (अस्य) इस पदार्थ-व्यवहार-बोध का (पीतये) पान करने हेतु (हुवे) आमन्त्रित करता हूँ॥११॥

    भावार्थ

    विश्व भर के पदार्थों के ज्ञान के तात्त्विक रूप से ज्ञाता विद्वान् ही दूसरों को उनका बोध करा सकते हैं॥११॥

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    विषय

    उन के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    ( ये मरुतः ) जो वीर पुरुष ( रोदसी तस्तभुः ) आकाश पृथिवी के समान स्वपक्ष और परपक्ष वा स्त्री-पुरुष, शास्य-शासक दोनों वर्गों को ( वितस्तभुः ) विशेष रूप से थामते या वश करते हैं। उन को मैं ( अस्य सोमस्य पीतये ) इस ऐश्वर्य के पालन के लिये बुलाता और स्वीकार करता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    बिन्दुः पूतदक्षो वा ऋषिः॥ मरुतो देवता॥ छन्दः—१, २, ८ विराड् गायत्री। ३, ५, ७, ९ गायत्री। ४, ६, १०—१२ निचृद् गायत्री॥

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