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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 106 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 106/ मन्त्र 7
    ऋषिः - मनुराप्सवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    पव॑स्व दे॒ववी॑तय॒ इन्दो॒ धारा॑भि॒रोज॑सा । आ क॒लशं॒ मधु॑मान्त्सोम नः सदः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पव॑स्व । दे॒वऽवी॑तये । इन्दो॒ इति॑ । धारा॑भिः । ओज॑सा । आ । क॒लश॑म् । मधु॑ऽमान् । सो॒म॒ । नः॒ । स॒दः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा । आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पवस्व । देवऽवीतये । इन्दो इति । धाराभिः । ओजसा । आ । कलशम् । मधुऽमान् । सोम । नः । सदः ॥ ९.१०६.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 106; मन्त्र » 7
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 10; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (देववीतये) देवमार्गप्राप्तये (धाराभिः) आनन्दवर्षैः (ओजसा) स्वविज्ञानयुक्तबलेन च (पवस्व) पुनातु मां (सोम) हे परमात्मन् ! (मधुमान्) आनन्दमयो भवान् (नः, कलशं) मदन्तःकरणं (आसदः) प्राप्नोतु ॥७॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (देववीतये) देवमार्ग की प्राप्ति के लिये (धाराभिः) आनन्द की वृष्टि से और (ओजसा) अपने विज्ञानयुक्त बल से (पवस्व) हमको पवित्र करें और (सोम) हे परमात्मन् ! (मधुमान्) आनन्दमय आप (नः, कलशं) हमारे अन्तःकरण में (आसदः) आकर विराजमान हों ॥७॥

    भावार्थ

    ब्रह्मानन्द जो सब आनन्दों से बढ़कर आनन्द है, जिसको उपनिषत्कारों ने “रसो वै सः रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति” इत्यादि वाक्यों में वर्णन किया है, वह आनन्दरूप परमात्मा अपने भक्तों को अवश्यमेव अपने ब्रह्मानन्द से आनन्दित करता है ॥७॥

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    विषय

    देववीतये

    पदार्थ

    हे (इन्दो) = सोम ! तू (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (धाराभिः) = अपनी धारणशक्तियों के साथ (देववीतये) = उस महान् देव प्रभु की प्राप्ति के लिये (पवस्व) = हमें प्राप्त हो । सोम हमें ओजस्वी बनाकर प्रभु प्राप्ति का पात्र बनाता है 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः' । हे सोम ! तू (मधुमान्) = प्रशस्त माधुर्य वाला होता हुआ (नः) = हमारे (कलशं) = इस शरीर रूप कलश में (आसदः) = आसीन हो। इस शरीर की सब कलाओं का रक्षण इस सोम ने ही तो करना है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोम हमें ओजस्वी बनाकर प्रभु को प्राप्त कराये। यह हमें मधुर बनाता हुआ सब कलाओं से युक्त जीवन वाला बनाये ।

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    विषय

    उसकी उपासना।

    भावार्थ

    हे (इन्दो) तेजस्विन् ! हे (सोम) सर्वशासक ! तू (देव-वीतये) देवों विद्वानों को प्राप्त होने के लिये वा उनकी कामना की पूर्त्ति के लिये (धाराभिः) धाराओं से मेघवत्, वाणियों से गुरुवत्, गतियों से अश्ववत्, धारकशक्तियों से और (ओजसा) पराक्रम से (मधुमान्) बलवान् होकर (कलशम् आ सदः) कला ज्ञानशक्ति से सम्पन्न चेतना के अधिष्ठान् देह वा अन्तःकरण में भी (आ सदः) विराजता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषि:-१-३ अग्निश्चाक्षुषः। ४–६ चक्षुर्मानवः॥ ७-९ मनुराप्सवः। १०–१४ अग्निः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ३, ४, ८, १०, १४ निचृदुष्णिक्। २, ५–७, ११, १२ उष्णिक् । ९,१३ विराडुष्णिक्॥ चतुदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma of divine light and peace, harbinger of honeyed joy, flow in streams with power and lustre for our attainment of the path of divinity and abide in our heart core of the soul.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो सर्व आनंदापेक्षा जास्त आनंद आहे तो ब्रह्मानंद होय. ज्याला उपनिषदकारांनी ‘‘रसो वै स: ह्मेवायं लब्ध्वा आनंदी भवति’’ इत्यादी वाक्यात वर्णन केलेले आहे. तो आनंदरूप आपल्या भक्तांना अवश्य आपल्या ब्रह्मानंदाने आनंदित करतो ॥७॥

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