ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 109/ मन्त्र 6
ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - स्वराडार्चीगायत्री
स्वरः - षड्जः
दि॒वो ध॒र्तासि॑ शु॒क्रः पी॒यूष॑: स॒त्ये विध॑र्मन्वा॒जी प॑वस्व ॥
स्वर सहित पद पाठदि॒वः । ध॒र्ता । अ॒सि॒ । शु॒क्रः । पी॒यूषः॑ । स॒त्ये । विऽध॑र्मन् । वा॒जी । प॒व॒स्व॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
दिवो धर्तासि शुक्रः पीयूष: सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व ॥
स्वर रहित पद पाठदिवः । धर्ता । असि । शुक्रः । पीयूषः । सत्ये । विऽधर्मन् । वाजी । पवस्व ॥ ९.१०९.६
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 109; मन्त्र » 6
अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 6
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अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(दिवः, धर्ता, असि) भवान् द्युलोकस्य धारकः (सत्ये, विधर्मन्) सत्यतायज्ञे (पीयूषः) अमृतमस्ति (शुक्रः) दीप्तिमान् (वाजी) बलवान् (पवस्व) मां पवित्रयतु ॥६॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(दिवः, धर्ता, असि) हे परमात्मन् ! आप द्युलोक के धारक और (सत्ये, विधर्मन्) सत्यरूप यज्ञ में (पीयूषः) अमृत हैं (शुक्रः) दीप्तिमान्, तथा (वाजी) बलस्वरूप आप (पवस्व) हमको पवित्र करें ॥६॥
भावार्थ
द्युलोक का धारक, अमृत, देदीप्यमान तथा बलस्वरूप परमात्मा, जिसने सूर्य्य, चन्द्रमादि सब लोक-लोकान्तरों को निर्माण किया है, वही हम सबका एकमात्र उपास्य देव है, अन्य नहीं ॥६॥
विषय
शुक्रः पीयूषः
पदार्थ
हे सोम ! तू (दिवः धर्ता असि) = मस्तिष्क रूप द्युलोक का धारण करनेवाला है। (शुक्रः) = हमारे जीवनों को दीप्त व निर्मल बनाता है। (पीयूषः) = तू जीवन के लिये अमृत है। शरीर में किसी प्रकार के रोगों को नहीं आने देता । (सत्ये) = उस सत्य प्रभु प्राप्ति के निमित्त जीवन में सत्य व्यवहार के निमित्त, तथा (विधर्मन्) = विशिष्ट धारण के निमित्त, सब अंग-प्रत्यंगों के स्वास्थ्य के निमित्त (वाजी) = शक्तिशाली तू पवस्व हमें प्राप्त हों ।
भावार्थ
भावार्थ- सुरक्षित सोम ही मस्तिष्क का धारण करता है। हमें दीप्ति व अमृतत्व प्राप्त कराता है। हमारे जीवन को सत्यमय बनाता हुआ हमारा धारण करता है ।
विषय
विश्वकर्ता प्रभु।
भावार्थ
हे प्रभो ! तू (दिवः धर्त्ता असि) आकाश का, सूर्य का वा तेज का धारण करने वाला, (शुक्रः) शुद्ध, कान्तिमान् (पीयूषः) दुष्टों का नाशक, और साथी सज्जनों से पान करने योग्य, रस के तुल्य है। तू (सत्ये) सत् प्रकृति से उत्पन्न (विधर्मन्) विशेष रूप से धारण करने योग्य इस विश्व में (वाजी) बलवान्, ज्ञानवान् (धर्त्ता असि) धारण करने हारा है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा ऋषयः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, १०, १३, १४, १५, १७, १८ आर्ची भुरिग्गायत्री। २–६, ९, ११, १२, १९, २२ आर्ची स्वराड् गायत्री। २०, २१ आर्ची गायत्री। १६ पादनिचृद् गायत्री॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
You are the sustainer of the heavenly regions of light, most blissful presence for experience in the yajna of truth and divine law, and the ultimate winner of the victory. Flow forth, divine Soma, purify and consecrate us in the presence.
मराठी (1)
भावार्थ
द्युलोक धारक, अमृत, देदीप्यमान व बलस्वरूप परमात्मा, ज्याने सूर्य, चंद्र इत्यादी सर्व लोकलोकांतर निर्माण केलेले आहेत. तोच सर्वांचा एकमेव उपास्य देव आहे, दुसरा नाही. ॥६॥
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