Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 48 के मन्त्र
1 2 3 4 5
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 48/ मन्त्र 5
    ऋषि: - कविभार्गवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अधा॑ हिन्वा॒न इ॑न्द्रि॒यं ज्यायो॑ महि॒त्वमा॑नशे । अ॒भि॒ष्टि॒कृद्विच॑र्षणिः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अध॑ । हि॒न्वा॒नः । इ॒न्द्रि॒यम् । ज्यायः॑ । म॒हि॒ऽत्वम् । आ॒न॒शे॒ । अ॒भि॒ष्टि॒ऽकृत् । विऽच॑र्षणिः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे । अभिष्टिकृद्विचर्षणिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अध । हिन्वानः । इन्द्रियम् । ज्यायः । महिऽत्वम् । आनशे । अभिष्टिऽकृत् । विऽचर्षणिः ॥ ९.४८.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 48; मन्त्र » 5
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 5; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (अधा) आप (इन्द्रियं हिन्वानः) इन्द्रिय के प्रेरक हैं (ज्यायः) सर्वोपरि विराजमान होने से (महित्वमानशे) अपनी महिमा से सर्वत्र व्याप्त हो रहे हैं (अभिष्टिकृत्) तथा अपने भक्तों के लिये कामनाओं के प्रदाता हैं (विचर्षणिः) सबके कर्मों के द्रष्टा हैं ॥५॥

    भावार्थ - जीवों के अन्दर अन्तर्यामी रूप से व्याप्त एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य देव नहीं ॥५॥ यह ४८ वाँ सूक्त और ५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥


    Bhashya Acknowledgment

    पदार्थः -
    (अधा) भवान् (इन्द्रियं हिन्वानः) इन्द्रियप्रेरकोऽस्ति (ज्यायः) सर्वोपरि स्थिततया (महित्वमानशे) स्वतेजसा सर्वत्र व्याप्तो भवसि त्वम्। (अभिष्टिकृत्) तथा स्वभक्तेभ्योऽभीष्टदाताऽसि। (विचर्षणिः) अथ च सर्वेषां कर्मणां प्रेक्षकोऽसि ॥५॥ इति अष्टचत्वारिंशत्तमं सूक्तं पञ्चमो वर्गश्च समाप्तः ॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    And so, the inspirer of the power of senses, mind and intelligence, giver of fulfilment to the devotees, all watching Soma, divine Spirit of peace, power and enlightenment, pervades and abides in and over existence as the supreme power of divine glory.


    Bhashya Acknowledgment

    भावार्थ - जीवाच्या अंतर्यामी रूपाने व्याप्त एकमेव परमात्माच आहे. दुसरा कोणी नाही. ॥५॥


    Bhashya Acknowledgment
    Top