ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 53/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अवत्सारः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    (अद्रिवः) हे शस्त्रों को धारण करनेवाले ! (ते शुष्मासः) आपकी शत्रुशोषक शक्तियें राक्षसों का नाश करती हुयी (रक्षः भिन्दन्तः) सदा उद्यत रहती हैं (उदस्थुः) जो आपके द्वेषी हैं, उनकी शक्तियों को वेगरहित करिये ॥१॥

    भावार्थ -

    परमात्मा में राग-द्वेषादि भावों का गन्ध भी नहीं है। जो लोग परमात्मोपदिष्ट मार्ग को छोड़कर यथेष्टाचार में रत हैं, उनके यथायोग्य फल देने के कारण परमात्मा उनका द्वेष्टा कथन किया गया है ॥१॥

    पदार्थ -

    (अद्रिवः) हे शस्त्रधारिन् ! (ते शुष्मासः) भवतः शत्रुशोषिकाः शक्तयः (रक्षः भिन्दन्तः) रक्षांसि निघ्नन् (उदस्थुः) सदोद्यता भवन्ति | (नुदस्व याः परिस्पृधः) ये भवद्द्वेषिणस्तेषां शक्तीः स्तम्भय ॥१॥

    Meanings -

    O lord of mountains, thunder and clouds, your powers and forces stand high, breaking down the negative and destructive elements of life. Pray impel or compel the adversaries to change or remove them from the paths of progress.

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