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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 63 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 63/ मन्त्र 23
    ऋषिः - निध्रुविः काश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    पव॑मान॒ नि तो॑शसे र॒यिं सो॑म श्र॒वाय्य॑म् । प्रि॒यः स॑मु॒द्रमा वि॑श ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पव॑मान । नि । तो॑शसे । र॒यिम् । सो॒म॒ । श्र॒वाय्य॑म् । प्रि॒यः । स॒मु॒द्रम् । आ । वि॒श॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पवमान नि तोशसे रयिं सोम श्रवाय्यम् । प्रियः समुद्रमा विश ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पवमान । नि । तोशसे । रयिम् । सोम । श्रवाय्यम् । प्रियः । समुद्रम् । आ । विश ॥ ९.६३.२३

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 63; मन्त्र » 23
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 34; मन्त्र » 3
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (पवमान) सर्वपावकपरमात्मन् ! (सोम) सौम्यस्वभाव ! यो भवान् (श्रवाय्यम् रयिम्) दुष्टानां धनं (नितोशसे) नितरां नाशयति सः (प्रियः) आनन्दप्रदो भवान् (समुद्रम्) आर्द्रीभूते मदन्तःकरणे (आविश) विराजमानो भवतु ॥२३॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले ! (सोम) हे परमात्मन् ! जो आप (श्रवाय्यं रयिम्) दुष्टों के धन को (नितोशसे) भलि-भाँति नष्ट करते हैं, वह (प्रियः) आनन्ददाता आप (समुद्रम्) आर्द्रीभूत हमारे अन्तःकरण में (आविश) विराजमान होवें ॥२३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में परमात्मा के रौद्रभाव का वर्णन किया है। जैसा कि “भयं वज्रमुद्यतम्” इस उपनिषद्वाक्य में परमात्मा के वज्र को भयरूप से वर्णन किया गया है। इसी प्रकार यहाँ परमात्मा का स्वरूप दुष्टों के प्रति भयप्रद वर्णन किया है ॥२३॥

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    विषय

    समुद्र आविश

    पदार्थ

    [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (पवमान) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले ! (नितोशसे) = तू निश्चय से हमारे रोगकृमि व वासनारूप शत्रुओं को विनष्ट करता है। इनको विनष्ट करके तू (श्रवाय्यम्) = अत्यन्त प्रशंसनीय (रयिम्) = [आविश] ऐश्वर्य में प्रवेश करनेवाला हो। [२] (प्रियः) = अन्नमय आदि सब कोशों के ऐश्वर्यों से प्रीणित करनेवाला तू (समुद्रम्) = [स+मुद्] आनन्द के साथ वर्तमान प्रभु में (आविश) = प्रवेश कर। यह सोम हमें प्रभु को प्राप्त करानेवाला हो ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम [क] शत्रुओं को नष्ट करता है, [ख] उत्कृष्ट ऐश्वर्य को प्राप्त कराता है, [ग] अन्ततः प्रभु से हमारा मेल करता है ।

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    विषय

    विद्वान् ऐश्वर्यवान् का अपार ज्ञान-सागर प्रभु में प्रवेश।

    भावार्थ

    हे (सोम) ! ऐश्वर्यवन्, विद्वन् ! हे (पवमान) अन्यों को पवित्र करने वाले ! तू (श्रवाय्यं) श्रवण करने योग्य (रयिम्) धन को (नि तोषसे) निरन्तर बढ़ाता, कई गुणा करता है, तू (प्रियः) सर्व-प्रिय होकर (समुद्रम्) समुद्र के समान अपार ज्ञानसागर में प्रवेश कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    निध्रुविः काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:- १, २, ४, १२, १७, २०, २२, २३, २५, २७, २८, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७-११, १६, १८, १९, २१, २४, २६ गायत्री। ५, १३, १५ विराड् गायत्री। ६, १४, २९ ककुम्मती गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Soma, pure and purifying omnificent lord, you grant ample and praise-worthy wealth, honour and excellence to the devotees. Pray, let your dear and blissful presence arise in the ocean-like time and space of human existence, inspire the depth of the heart and save the supplicant.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात, परमेश्वराच्या रौद्र भावाचे वर्णन केलेले आहे. जसे ‘भय वज्रमुद्यतं’ या उपनिषदाच्या वाक्यात परमात्म्याच्या वज्राला भयरूपाने वर्णित केलेले आहे. याचप्रकारे येथे परमात्म्याचे दुष्टांशी वागण्याच्या भयप्रद स्वरूपाचे वर्णन केलेले आहे. ॥२३॥

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