ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 63/ मन्त्र 30
ऋषिः - निध्रुविः काश्यपः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
अ॒स्मे वसू॑नि धारय॒ सोम॑ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा । इन्दो॒ विश्वा॑नि॒ वार्या॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒स्मे इति॑ । वसू॑नि । धा॒र॒य॒ । सोम॑ । दि॒व्यानि॑ । पार्थि॑वा । इन्दो॒ इति॑ । विश्वा॑नि । वार्या॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्मे वसूनि धारय सोम दिव्यानि पार्थिवा । इन्दो विश्वानि वार्या ॥
स्वर रहित पद पाठअस्मे इति । वसूनि । धारय । सोम । दिव्यानि । पार्थिवा । इन्दो इति । विश्वानि । वार्या ॥ ९.६३.३०
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 63; मन्त्र » 30
अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 35; मन्त्र » 5
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अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 35; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(इन्दो) हे समस्तगुणसम्पन्न ! (सोम) परमात्मन् ! भवान् (दिव्यानि) दिवि भवानि (पार्थिवा) पृथिवीस्थानि (विश्वानि वसूनि) समस्तरत्नानि (वार्या) यानि वरणीयानि तानि (अस्मे) अस्मभ्यं (धारय) वितरतु ॥३०॥ इति त्रिषष्टितमं सूक्तं पञ्चत्रिंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(इन्दो) हे ज्ञान-विज्ञानादि गुणसम्पन्न विद्वन् ! (सोम) हे परमात्मन् ! आप (पार्थिवा) पृथिवीसम्बन्धी (दिव्यानि) तथा द्युलोसम्बन्धी (विश्वानि वसूनि) सर्व रत्न (वार्या) जो वरण करने योग्य हैं, उनको (अस्मे) हमारे लिये (धारय) धारण कराइये ॥३०॥
भावार्थ
परमात्मा ने इस मन्त्र में इस बात का उपदेश किया है कि जो लोग सौम्य स्वभावयुक्त शूरवीरों के अनुयायी होकर देश का परिपालन करते हैं, वे नाना प्रकार के रत्नों को धारण करके ऐश्वर्यशाली होते हैं ॥३०॥ यह ६३ वाँ सूक्त और ३५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
दिव्य व पार्थिव वसु
पदार्थ
[१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (अस्मे) = हमारे लिये (दिव्यानि) = पार्थिवा दिव्य और पार्थिव (वसूनि) = वसुओं को (धारय) = धारण कर । विज्ञान के नक्षत्र व आत्मज्ञान का सूर्य ही दिव्य वसु हैं । पूर्ण स्वास्थ्य ही पार्थिव वसु है। सुरक्षित सोम हमें इन वसुओं को प्राप्त कराता है । [२] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! तू (विश्वानि) = सब (वार्या) = वरणीय वसुओं को प्राप्त करा । तेरे द्वारा हमारा शरीर स्वस्थ हो, मन निर्मल हो तथा बुद्धि दीप्त हो। इस प्रकार यह सोम सब दृष्टिकोणों से हमारे जीवनों को उत्तम निवासवाला बनाये।
भावार्थ
भावार्थ- सुरक्षित सोम दिव्य व पार्थिव वसुओं को प्राप्त कराता है। यह सब वरणीय वसुओं का दाता है । अगले सूक्त में 'काश्यप मारीच' सोम का स्तवन करता है, ज्ञानी वासनाओं को विनष्ट करनेवाला-
विषय
उसका सर्वेश्वर्य-धारण।
भावार्थ
हे (इन्दो) दयालो ! ऐश्वर्यवन्! शत्रु संतापक ! (सोम) हे शासक ! विद्वन् ! तू (अस्मे) हमारे लिये (दिव्यानि पार्थिवा) दिव्य और पार्थिव (विश्वानि वार्या) समस्त वरण करने योग्य उत्तम २ (वसूनि धारय) नाना ऐश्वर्यों को धारण कर और हमें धारण करा। इति पञ्चत्रिंशो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
निध्रुविः काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:- १, २, ४, १२, १७, २०, २२, २३, २५, २७, २८, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७-११, १६, १८, १९, २१, २४, २६ गायत्री। ५, १३, १५ विराड् गायत्री। ६, १४, २९ ककुम्मती गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O Soma, lord of peace, prosperity and divine bliss, bring us all wealth, honour and excellence of the earth and heavenly light. O spirit of beauty and grace, bless us with all the wealth of success and fulfilment of our highest choice on earth and beyond.
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वराने या मंत्रात या गोष्टीचा उपदेश केलेला आहे की जे लोक सौम्य स्वभावयुक्त शूरवीरांचे अनुयायी बनून देशाचे परिपालन करतात ते नाना प्रकारच्या रत्नांना धारण करतात व ऐश्वर्यवान होतात. ॥३०॥
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