ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 12
स नो॑ अर्ष प॒वित्र॒ आ मदो॒ यो दे॑व॒वीत॑मः । इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥
स्वर सहित पद पाठसः । नः॒ । अ॒र्ष॒ । प॒वित्रे॑ । आ । मदः॑ । यः । दे॒व॒ऽवीत॑मः । इन्दो॒ इति॑ । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
स नो अर्ष पवित्र आ मदो यो देववीतमः । इन्दविन्द्राय पीतये ॥
स्वर रहित पद पाठसः । नः । अर्ष । पवित्रे । आ । मदः । यः । देवऽवीतमः । इन्दो इति । इन्द्राय । पीतये ॥ ९.६४.१२
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 12
अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 38; मन्त्र » 2
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अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 38; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(इन्दो) हे विविधगुणसम्पन्न परमात्मन् ! (इन्द्राय पीतये) कर्मयोगिनस्तृप्तये भवान् (आ) समन्तात् (मदः) आमोदस्य वृष्टिं करोतु। (यः) यो ह्यानन्दः (देववीतमः) देवानां तर्पकोऽस्ति। अथ च यस्य (पवित्रे) पवित्रान्तःकरणेषु सञ्चारो भवति (सः) तमानन्दं (नः) अस्मान् (अर्ष) देहि ॥१२॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(इन्दो) हे परमैश्वर्ययुक्त परमात्मन् ! (इन्द्राय पीतये) कर्मयोगी के तृप्ति के लिये आप (आ) सब ओर से (मदः) आनन्द की वृष्टि करें। (यः) जो आनन्द (देववीतमः) देवताओं की तृप्ति करनेवाला है और (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरणों में जिसका संचार होता है, (सः) उस आनन्द को (नः) हम लोगों को (अर्ष) दीजिये ॥१२॥
भावार्थ
परमात्मा का वह आनन्द, जो देवताओं के लिये तृप्तिकारक है अर्थात् जिसके अधिकारी दिव्य गुणवाले सदाचारी पुरुष है, वह आनन्द केवल कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों को ही उपलब्ध हो सकता है, अन्यों को नहीं। इसलिये सबको चाहिये कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी बनकर उस आनन्द की प्राप्ति का यत्न करें ॥१२॥
विषय
मदः - देववीतमः
पदार्थ
[१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! (यः) = वह तू (नः) = हमें (पवित्रे) = इस पवित्र हृदय में (आ) = सर्वथा (अर्ष) = प्राप्त हो। वह तू हमें प्राप्त हो, (यः) = जो कि (मदः) = उल्लास को देनेवाला है और (देववीतम्) = अतिशयेन दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाला है । [२] हे इन्दो ! तू (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को प्राप्त कराने के लिये हो तथा (पीतये) = हमारे रक्षण के लिये हो, हमें रोगों के आक्रमणों से बचानेवाला हो ।
भावार्थ
भावार्थ- सोम उल्लास को पैदा करनेवाला है, दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाला है ।
विषय
अभिषिक्त दयालु पुरुष के पवित्र कर्त्तव्य
भावार्थ
हे (इन्दो) अभिषेक जल से आर्द्र, जनता के प्रति दयार्द्र ! ऐश्वर्यवन् ! विद्वन् ! (यः) जो तू (मदः) हर्षजनक (देव-वीतमः) मनुष्यों को चाहने वाला, सर्वप्रिय है (सः) वह तू (नः पवित्रे अर्ष) हमारे बीच सत्यासत्य विवेक करने के पद पर (इन्द्राय) ऐश्वर्ययुक्त, शत्रु वा दुष्टों और दोषों के दूर करने और (पीतये) जगत् वा प्रजा, शिष्यादि के पालन के लिये (अर्ष) आ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Let that divine ecstasy which is most heavenly radiate and vibrate in our pure heart, O lord of beauty and bliss, for the fulfilment of the soul.
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वर देवतांची तृप्ती करतो. अर्थात ज्याचे अधिकारी दिव्य गुणयुक्त सदाचारी पुरुष आहेत, त्याचा आनंद केवळ कर्मयोगी-ज्ञानयोगी यांना मिळतो इतरांना नाही. त्यासाठी सर्वांनी कर्मयोगी व ज्ञानयोगी बनून त्या आनंदाची प्राप्ती करण्याचा प्रयत्न करावा. ॥१२॥
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