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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 64 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 17
    ऋषिः - कश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    म॒र्मृ॒जा॒नास॑ आ॒यवो॒ वृथा॑ समु॒द्रमिन्द॑वः । अग्म॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    म॒र्मृ॒जा॒नासः॑ । आ॒यवः॑ । वृथा॑ । स॒मु॒द्रम् । इन्द॑वः । अग्म॑न् । ऋ॒तस्य॑ । योनि॑म् । आ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मर्मृजानास आयवो वृथा समुद्रमिन्दवः । अग्मन्नृतस्य योनिमा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मर्मृजानासः । आयवः । वृथा । समुद्रम् । इन्दवः । अग्मन् । ऋतस्य । योनिम् । आ ॥ ९.६४.१७

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 17
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 39; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    पूर्वोक्तः परमात्मा (ऋतस्य योनिम्) सत्यतायाः स्थानं (आ) समन्तात् (अग्मन्) प्राप्नोति। स परमेश्वरः (मर्मृजानासः) सर्वपवित्रकर्तास्ति। अथ च (आयवः) गमनशीलोऽस्ति। (इन्दवः) प्रकाशस्वरूपस्तथा (वृथा समुद्रम्) अन्तरिक्षेऽप्यनायासेन गच्छति ॥१७॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    उक्त परमात्मा (ऋतस्य योनिं) सत्यता के स्थान को (आ) भली-भाँति (अग्मन्) प्राप्त होता है। वह परमात्मा (मर्मृजानासः) सबको पवित्र करनेवाला है (आयवः) गतिशील है (इन्दवः) प्रकाशस्वरूप है तथा (वृथा समुद्रम्) अन्तरिक्ष में भी अनायास गमन करनेवाला है ॥१७॥

    भावार्थ

    उक्त सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मा विना परिश्रम के ही अन्तरिक्षादि लोकों में गमन कर सकता है, अन्य नहीं ॥१७॥

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    विषय

    मर्मृजानास आयवः

    पदार्थ

    [१] (मर्मृजानासः) = शुद्ध करते हुए, (आयवः) = [एति] शरीर में क्रियाशीलता को पैदा करते हुए (इन्दवः) = सोमकण (वृथा) = अनायास ही (समुद्रम्) = उस आनन्दमय प्रभु को (अग्मन्) = प्राप्त होते हैं । शरीर में सुरक्षित सोम हृदय के दृष्टिकोण से हमें पवित्र बनाता है, शरीर के दृष्टिकोण से गतिशील । [२] इस प्रकार हमें पवित्र व गतिशील बनाते हुए ये सोमकण (ऋतस्य योनिम्) = ऋत के उत्पत्ति-स्थान प्रभु में (आ) [अग्मन्] = ले जाते हैं। सोमरक्षण से हमारा जीवन ऋतमय बनता है, ऋत का वर्धन करते हुए हम 'ऋत के योनि' प्रभु को प्राप्त करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें हृदय में पवित्र बनाता है, शरीर में गतिशील। ऐसा बनाकर यह हमें प्रभु की ओर ले चलता है ।

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    विषय

    ज्ञान वाणियों द्वारा परम-पद प्राप्ति।

    भावार्थ

    (मर्मृजानासः) अपने को पवित्र करते हुए (इन्दवः आयवः) अभिषिक्त, तेजस्वी जन (ऋतस्य योनिम्) सत्य ज्ञान, तेज और न्याय के परम स्थान, (समुद्रम्) अगाध ज्ञानैश्वर्य के सागर, प्रभु को (वृथा आ अग्मन्) आनायास ही प्राप्त होते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Purified and sanctified devotees, bright, clear and radiant, spontaneously concentrate on the infinite oceanic presence of divinity and reach the central origin of the moving universe and the dynamics of existence.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सर्वशक्तिसंपन्न परमात्मा अनायसे अंतरिक्ष इत्यादी लोकात गमन करू शकतो. दुसरा नाही. ॥१७॥

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