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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 64 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 21
    ऋषिः - कश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒भि वे॒ना अ॑नूष॒तेय॑क्षन्ति॒ प्रचे॑तसः । मज्ज॒न्त्यवि॑चेतसः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि । वे॒नाः । अ॒नू॒ष॒त॒ । इय॑क्षन्ति । प्रऽचे॑तसः । मज्ज॑न्ति । अवि॑ऽचेतसः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि वेना अनूषतेयक्षन्ति प्रचेतसः । मज्जन्त्यविचेतसः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । वेनाः । अनूषत । इयक्षन्ति । प्रऽचेतसः । मज्जन्ति । अविऽचेतसः ॥ ९.६४.२१

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 21
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 40; मन्त्र » 1
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (प्रचेतसो वेनाः) अत्युत्कृष्टज्ञानवन्तो विज्ञानिनो जनाः (अभ्यनूषत) जगदीश्वरस्योपासनां कुर्वन्ति। अथ च (इयक्षन्ति) उपासनात्मकयज्ञेन परमात्मयजनं कुर्वन्ति। तथा (अविचेतसः) अज्ञानिनः (मज्जन्ति) निमग्ना भवन्ति ॥२१॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (प्रचेतसो वेनाः) प्रकृष्ट ज्ञानवाले विज्ञानी लोग (अभ्यनूषत) परमात्मा की उपासना करते हैं और (इयक्षन्ति) उपासनात्मक यज्ञ से परमात्मा का यजन करते हैं। (अविचेतसः) अज्ञानी लोग (मज्जन्ति) डूबते हैं ॥२१॥

    भावार्थ

    जो लोग शुद्ध मनवाले हैं, वे परमात्मा के तत्त्वज्ञान से मुक्ति के भागी होते हैं और अज्ञानी लोग बार-बार जन्म लेते हैं और मरते हैं, परन्तु फिर भी परमात्मा के तत्त्व को नहीं पाते। इसीलिये उनका यहाँ डूबना दिखलाया है ॥२१॥

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    विषय

    'प्रचेताः, न कि अविचेताः ' बनें

    पदार्थ

    [१] (वेना:) = कान्त स्तुतिमय जीवनवाले पुरुष (अभि) = दिन के दोनों ओर प्रातः सायं अनूषत उस प्रभु का स्तवन करते हैं। यह स्तवन ही उन्हें वासनाओं से बचाता है । [२] (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले समझदार पुरुष (इयक्षन्ति) = यज्ञों को करने की कामनावाले होते हैं । सदा यज्ञों में प्रवृत्त रहकर ये विषयों के ध्यान से दूर रहते हैं । [३] पर (अविचेतसः) = नासमझ लोग न स्तवन करते हैं, नां ही यज्ञों को करने की कामनावाले होते हैं। अतः ये भोगों में फँसकर वीर्य नाश करते हुए संसार सागर में (मज्जन्ति) = डूब जाते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु-स्तवन व यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्ति हमें भोगों में फँसने से बचाती है ।

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    विषय

    ज्ञानी और अज्ञानी लोगों की ऊर्ध्वगति और अधःपतन।

    भावार्थ

    (वेनाः अभि अनूषत) तेजस्वी, ज्ञानी, रक्षक पुरुष उसकी स्तुति करते हैं। (प्र-चेतसः) उत्तम चित्त वाले, उदार ज्ञानी जन ही (इयक्षन्ति) उसकी पूजा, सत्संग करते हैं। (अविचेतसः) विशेष ज्ञान से रहित मूर्ख, मिथ्या बुद्धि वाले जन डूब जाते हैं। (२) इसी प्रकार राजा को ज्ञानी जन उपदेश करें, वे ही संगति करें और मूर्ख नीचे गिरें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Enlightened sages adore, exalt and join the divine infinity of bliss while the ignorant get drowned in the existential ocean they fail to cross.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे लोक शुद्ध मनाचे आहेत ते परमात्म्याच्या तत्त्वज्ञानामुळे मुक्तीचे अधिकारी बनतात व अज्ञानी लोक वारंवार जन्म घेतात व मरतात तरीही परमात्म्याच्या तत्त्वाला जाणत नाहीत. त्यासाठी त्यांचा येथे नाश दर्शविलेला आहे. ॥२१॥

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