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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 64 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 64/ मन्त्र 29
    ऋषिः - कश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    हि॒न्वा॒नो हे॒तृभि॑र्य॒त आ वाजं॑ वा॒ज्य॑क्रमीत् । सीद॑न्तो व॒नुषो॑ यथा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हि॒न्वा॒नः । हे॒तृऽभिः॑ । य॒तः । आ । वाज॑म् । वा॒जी । अ॒क्र॒मी॒त् । सीद॑न्तः । व॒नुषः॑ । य॒था॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हिन्वानो हेतृभिर्यत आ वाजं वाज्यक्रमीत् । सीदन्तो वनुषो यथा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हिन्वानः । हेतृऽभिः । यतः । आ । वाजम् । वाजी । अक्रमीत् । सीदन्तः । वनुषः । यथा ॥ ९.६४.२९

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 64; मन्त्र » 29
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 41; मन्त्र » 4
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (हेतृभिः) उपासकैः (हिन्वानः) उपासितः परमात्मा (यतः) स्वेन प्रयत्नेन (वाजी) उत्कृष्टबलवान् (वाजम्) बलं (अक्रमीत्) जयति (वनुषः) मनुष्यः (सीदन्तः) युद्धे प्रवेशं कृत्वा (यथा) येन प्रकारेणान्यानि बलान्यभिभवति तथैव जगदीश्वरः सर्वबलजेतास्ति ॥२९॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (हेतृभिः) उपासक लोगों से (हिन्वानः) उपासना किया हुआ परमात्मा (यतः) अपने प्रयत्न से (वाजी) सर्वोपरि बलवाला (वाजम्) बल को (अक्रमीत्) जीतता है (वनुषः) मनुष्य (सीदन्तः) युद्ध में प्रविष्ट होकर (यथा) जैसे अन्य बलों को जीतता है, इस प्रकार परमात्मा सब बलों को जीतता है ॥२९॥

    भावार्थ

    परमात्मा ने इस मन्त्र में बल का उपदेश किया है कि जिस प्रकार योद्धा सेनापति अपने बल के गर्व से अन्य सेनाधीशों को जीतकर स्वाधीन कर लेता है, इसी प्रकार सर्वोपरि बलस्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को अपने वशीभूत किए हुए है ॥२९॥

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    विषय

    वाजी वाजं अक्रमीत्

    पदार्थ

    [१] (हेतृभिः) = प्राणसाधना द्वारा शरीर में सोम को प्रेरित करनेवालों से (हिन्वानः) = शरीर में प्रेरित किया जाता हुआ, (यतः) = शरीर में संयत किया हुआ (वाजी) = यह शक्ति-सम्पन्न सोम (वाजं आ अक्रमीत्) = संग्राम में गतिवाला होता है। शरीरस्थ रोगकृमियों का संहार करता है और हृदयस्थ वासनाओं को भी विनष्ट करता है । [२] ये सोमकण शरीर में (सीदन्तः) = ऐसे आसीन होते हैं (यथा) = जैसे कि (वनुषः) = शत्रुओं का हिंसन करनेवाले योद्धा । ये रोगकृमि व वासनारूप शत्रुओं को विनष्ट करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - शरीर में प्रेरित सोम रोगों व वासनाओं से युद्ध करता हुआ उन्हें पराजित करता है।

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    विषय

    उसको सैनिक के समान सदा सज्जन रहने का आदेश

    भावार्थ

    (हेतृभिः) अन्य शासक जनों से (हिन्वानः) प्रेरित, शासित होकर (यतः वाजी) संयत, नियमबद्ध व्रती होकर (वाजी) ज्ञानवान् बलवान् पुरुष वेगवान् अश्व के समान (वाजं आ अक्रमीत्) संग्राम में जावे। और (यथा) जैसे (वनुषः) हिंसक सैनिक (सीदन्तः) बैठते और रहते हैं उसी प्रकार वह भी सैनिक के समान सदा सन्नद्ध रहे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ७, १२, १३, १५, १७, १९, २२, २४, २६ गायत्री। २, ५, ६, ८–११, १४, १६, २०, २३, २५, २९ निचृद् गायत्री। १८, २१, २७, २८ विराड् गायत्री। ३० यवमध्या गायत्री ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Just as a warrior spurred on by ambition and love of victory rushes to the field and wins the battle, and just as ardent yajakas sit on the vedi and win their object of yajna, so does the soul assisted by senses, mind and intelligential vision win the target of its meditation on Om, the presence of divinity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वराने या मंत्रात बलाचा उपदेश केलेला आहे. ज्या प्रकारे योद्धा सेनापती आपल्या बलाच्या सामर्थ्याने इतर सेनाधीशांना जिंकून घेतो त्याचप्रकारे सर्वोत्कृष्ट बलस्वरूप परमात्मा संपूर्ण लोकलोकांतरांना आपल्या वशीभूत करतो. ॥२९॥

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