Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 77 के मन्त्र
1 2 3 4 5
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 77/ मन्त्र 3
    ऋषिः - कविः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - पादनिचृज्ज्गती स्वरः - निषादः

    ते न॒: पूर्वा॑स॒ उप॑रास॒ इन्द॑वो म॒हे वाजा॑य धन्वन्तु॒ गोम॑ते । ई॒क्षे॒ण्या॑सो अ॒ह्यो॒३॒॑ न चार॑वो॒ ब्रह्म॑ब्रह्म॒ ये जु॑जु॒षुर्ह॒विर्ह॑विः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ते । नः॒ । पूर्वा॑सः । उप॑रासः । इन्द॑वः । म॒हे । वाजा॑य । ध॒न्व॒न्तु॒ । गोऽम॑ते । ई॒क्षे॒ण्या॑सः । अ॒ह्यः॑ । न । चार॑वः । ब्रह्म॑ऽब्रह्म । ये । जु॒जु॒षुः । ह॒विःऽह॑विः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ते न: पूर्वास उपरास इन्दवो महे वाजाय धन्वन्तु गोमते । ईक्षेण्यासो अह्यो३ न चारवो ब्रह्मब्रह्म ये जुजुषुर्हविर्हविः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ते । नः । पूर्वासः । उपरासः । इन्दवः । महे । वाजाय । धन्वन्तु । गोऽमते । ईक्षेण्यासः । अह्यः । न । चारवः । ब्रह्मऽब्रह्म । ये । जुजुषुः । हविःऽहविः ॥ ९.७७.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 77; मन्त्र » 3
    अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (ते) पूर्वोक्ता विद्वांसो ये (नः) अस्माकं (पूर्वासः) पूर्वजाः सन्ति तथा (उपरासः) ये भविष्यन्ति ते (इन्दवः) ज्ञानिनः (महे गोमते) महते ज्ञानाय अथ च (वाजाय) बलाय (धन्वन्तु) तं परमात्मानं प्राप्नुवन्तु। अथ च (ये) ये (ब्रह्म ब्रह्म) ब्रह्मप्राप्तये (हविर्हविः) तथा हविष्यार्थं (जुजुषुः) संसेवन्ते ते (चारवो न) श्रेष्ठजना इव (अह्यः) सुरूपाः (ईक्षेण्यासः) दर्शनीयाश्च भवन्ति ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (2)

    पदार्थ

    (ते) पूर्वोक्त विद्वान् (नः) जो हमारे (पूर्वासः) पूर्वज (उपरासः) और जो भविष्य में होनेवाले हैं, (इन्दवः) वे ज्ञानी (महे गोमते) बड़े ज्ञान के लिये और (वाजाय) बल के लिये (धन्वन्तु) उस परमात्मा को प्राप्त हों और (ये) जो (ब्रह्म ब्रह्म) ब्रह्मप्राप्ति के लिये और (हविर्हविः) हवि के लिए (जुजुषुः) सेवन करते हैं, वे (चारवो न) श्रेष्ठ लोगों के समान (अह्यः) सुन्दर और (ईक्षेण्यासः) दर्शनीय होते हैं ॥३॥

    भावार्थ

    प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात् पुराने और नये दोनों प्रकार के विद्वान् जो वेद को ईश्वर प्राप्ति के लिये पढ़ते हैं और हवनादि यज्ञों को कर्म्मकाण्ड के लिये करते हैं, वे इस संसार में दर्शनीय और सदाचार फैलाने के हेतु होते हैं, अन्य नहीं ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ज्ञानी पुरुषों के कत्तव्य।

    भावार्थ

    (ते) वे (नः) हम में से (पूर्वासः) पूर्व ही लक्ष्य तक पहुंचे हुए, ज्ञानादि से पूर्ण, (उपरासः) सर्वोपरि विराजमान, वा (उपरासः) अति समीप होकर शिष्यों को ज्ञान देने वाले, ब्रह्मतत्व के अति समीप पहुंच कर आनन्द में रमण करने वाले, (इन्दवः) ऐश्वर्यवान्, दयाशील एवं उस प्रभु को लक्ष्य कर उसकी ओर जाने वाले और उसी की उपासना करने हारे होते हैं। वे (महे वाजाय) बड़े भारी (गोमते) सद्-वाणियुक्त, ज्ञान-बल और ऐश्वर्य के लाभ के लिये (धन्वन्तु) आगे बढ़ें। वे (ईक्षेण्यासः) तत्व को यथार्थ देखने वाले (अह्यः न चारवः) स्त्री जनों वा सूर्य किरणों के समान उत्तम स्वच्छ, अनिन्दनीय हैं, (ये) जो (ब्रह्म-ब्रह्म हविः-हविः) सब प्रकार का ब्रह्म ज्ञान और सब प्रकार के अन्न आदि (जुजुषुः) सेवन करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कविर्ऋषिः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः– १ जगती। २, ४, ५ निचृज्जगती। ३ पादनिचृज्जगती॥ पञ्चर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    May those ancients of vision and the later ones present and future blest with light and power, inspire us to win new prizes of great advancement and victory rich in wealth and advancement. May they, thinkers and seekers, generous and sublime like clouds of rain showers, who meditate on the essence of vast existence and offer the essence of sacred oblations of yajnic fragrances with love and faith, inspire us.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    प्राचीन व अर्वाचीन अर्थात जुने व नवे दोन प्रकारचे विद्वान जे ईश्वरप्राप्तीसाठी वेदांचे अध्ययन करतात व हवन इत्यादी यज्ञांना कर्मकांडासाठी करतात ते या जगात दर्शनीय व सदाचार प्रसृत करण्याचे हेतु असतात, इतर नाही. ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top