Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 83 के मन्त्र
1 2 3 4 5
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 83/ मन्त्र 5
    ऋषिः - पवित्रः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः

    ह॒विर्ह॑विष्मो॒ महि॒ सद्म॒ दैव्यं॒ नभो॒ वसा॑न॒: परि॑ यास्यध्व॒रम् । राजा॑ प॒वित्र॑रथो॒ वाज॒मारु॑हः स॒हस्र॑भृष्टिर्जयसि॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ह॒विः । ह॒वि॒ष्मः॒ । महि॑ । सद्म॑ । दैव्य॑म् । नभः॑ । वसा॑नः । परि॑ । या॒सि॒ । अ॒ध्व॒रम् । राजा॑ । प॒वित्र॑ऽरथः । वाज॑म् । आ । अ॒रु॒हः॒ । स॒हस्र॑ऽभृष्टिः । ज॒य॒सि॒ । श्रवः॑ । बृ॒हत् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसान: परि यास्यध्वरम् । राजा पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्रभृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हविः । हविष्मः । महि । सद्म । दैव्यम् । नभः । वसानः । परि । यासि । अध्वरम् । राजा । पवित्रऽरथः । वाजम् । आ । अरुहः । सहस्रऽभृष्टिः । जयसि । श्रवः । बृहत् ॥ ९.८३.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 83; मन्त्र » 5
    अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 8; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    हे परमात्मन् ! (हविः) त्वं हविःस्वरूपोऽसि। अथ च (हविष्मः) हविर्वानसि। (महि) महानसि। (दैव्यम्) दिव्यस्वरूपवान् (नभः) विस्तृत आकाशः (सद्म) त्वदीयं गृहमस्ति। अस्मिन् गृहे (वसानः) निवसन् (अध्वरम्) अहिंसारूपं यज्ञं (परियासि) प्राप्नोषि। तथा (राजा) त्वं सर्वत्र विराजसे। अथ च त्वं (पवित्ररथः) पूतगतिवान् (वाजमारुहः) सर्वविधबलधारकोऽसि। तथा (सहस्रभृष्टिः) नानाविधपवित्रतां अदधत (बृहत्, श्रवः) सर्वोत्कृष्टयशो बिभ्रत् (जयसि) अखिलान् जनान् विजयसे ॥५॥ इति त्र्यशीतितमं सूक्तमष्टमो वर्गश्च समाप्तः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे परमात्मन् ! (हविः) आप हवि हैं (हविष्मः) और हविवाले हैं। (महि) बड़े हैं। (दैव्यं) दिव्यरूपवाला (नभः) यह विस्तृत आकाश (सद्म) आपका गृह है। इसमें (वसानः) निवास करते हुए (अध्वरं) अहिंसारूप यज्ञ को (परियासि) प्राप्त होते हैं। (राजा) आप सर्वत्र विराजमान हो रहे हैं। (पवित्ररथः) पवित्र गतिवाले (वाजमारुहः) सब प्रकार के बलों को धारण किये हुए हैं। (सहस्रभृष्टिः) अनन्त प्रकार की पवित्रताओं को धारण किये हुए हैं (बृहत्, श्रवः) सर्वोपरि यश को धारण किये हुए आप (जयसि) सबको जय करते हैं ॥५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में परमात्मा को सहस्त्र शक्तियोंवाला वर्णन किया है। जैसा कि “सहस्त्रशीर्षा पुरुषः” इस मन्त्र में वर्णन किया गया है। उस अनन्तशक्ति युक्त परमात्मा की उपासना करके जो पुरुष तपस्वी बनते हैं, वे इस भवनिधि से पार होते हैं ॥५॥ यह ८३ वाँ सूक्त और ८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    शत्रुविजय के अनन्तर राज्य की वृद्धि के समान मोक्ष पद की प्राप्ति।

    भावार्थ

    (महि सद्म वसानः हविः परि अध्वरं याति) जिस प्रकार बड़े भारी गृह में रहने वाला महाशाल, सम्पन्न पुरुष अन्नों से यज्ञ का सम्पादन करता है, उसी प्रकार हे (हविष्मः) समस्त अन्नों, ज्ञानों, बलों और साधनों के स्वामिन्। तू भी (हविः) देने लेने, भोगने योग्य ऐश्वर्य को और (दिव्यं महि सद्म) दिव्य महान्, गृहवत् इस महान् (अध्वरम्) अविनाशी संसार रूप यज्ञ मण्डप को (वसानः) अच्छादित करता हुआ (परि यासि) व्याप रहा है। (राजा पवित्र रथं वाजम्) जिस प्रकार वेगवान् रथ का स्वामी राजा युद्धार्थ सैन्य का अध्यक्ष होकर रहता है, और (सहस्र-भृष्टिः जयति) सहस्रों को युद्धाग्नि में भूनकर विजय प्राप्त करता है उसी प्रकार हे प्रभो ! तू भी (राजा) प्रकाशस्वरूप (पवित्र-रथः) परम पावन उपदेशमय, ज्ञानमय स्वरूप वाला होकर (सहस्र-भृष्टिः) सहस्रों पापों को भूंज कर दग्ध करने वाला होकर (बृहत् श्रवः जयसि) बड़े भारी यश-ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। इत्यष्टमो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पवित्र ऋषिः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:– १, ४ निचृज्जगती। २, ५ विराड् जगती॥ ३ जगती॥ पञ्चर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    राजा पवित्ररथः

    पदार्थ

    [१] हे (हविष्मः) = उत्तम हविवाले पुरुष ! तू (हविः) = दानपूर्वक अदन को तथा (नभः) = प्रकाश को (वसानः) = धारण करता हुआ, अर्थात् त्याग व स्वाध्याय के द्वारा प्रकाशमय जीवनवाला होता हुआ अध्वरं परियासि यज्ञों की ओर जाता है और (महि दैव्यं सद्म) = महान् देव के गृह की ओर जाता है, यज्ञशील बनकर प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर बढ़ रहा होता है । [२] इस सोमरक्षण से तू राजा - दीप्त जीवनवाला होता है, (पवित्ररथः) = पवित्र शरीर रूप रथवाला होता है, (वाजम् आरुहः) = तू शक्ति का आरोहण करता है। (सहस्त्रभृष्टिः) = हजारों शत्रुओं का भूननेवाला होता हुआ, सोमरक्षण द्वारा सब रोग व वासना रूप शत्रुओं को नष्ट करता हुआ, (बृहत् श्रवः) = बहुत अधिक ज्ञान का (जयसि) = विजय करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोमरक्षणवाला पुरुष 'त्याग, स्वाध्याय व यज्ञों' को धारण करता हुआ ब्रह्म की ओर चलता है । 'शक्तिशाली व पवित्र' बनकर शत्रुओं का नाश करता हुआ उज्ज्वल जीवनवाला होता है । यह पवित्र रथ 'प्रजापति' बनता है, सब प्रजाओं का रक्षण करनेवाला होता है और 'वाच्यः ' प्रशंसनीय जीवनवाला होता है । यह सोमस्तवन करता हुआ कहता है कि-

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Soma, lord of light and bliss, you are the prime yajamana of universal yajna. Holding the holy materials, wearing divine space as refulgent cloak, you move to the great hall of creative yajna free from negativity and violence. Supreme ruler, riding the divine chariot, rising to omnipotence, wielding a thousand arms, you are the supreme victor of infinite glory.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात परमेश्वराला सहस्रशक्तिमान म्हटले आहे. जसे सहस्रशीर्ष पुरुष या मंत्रात वर्णिलेला आहे. त्या अनंतशक्तीयुक्त परमेश्वराची उपासना करून जे पुरुष तपस्वी बनतात ते या भवसागरातून पार पडतात. ॥५॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top