Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 93 के मन्त्र
1 2 3 4 5
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 93/ मन्त्र 1
    ऋषि: - नोधाः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    सा॒क॒मुक्षो॑ मर्जयन्त॒ स्वसा॑रो॒ दश॒ धीर॑स्य धी॒तयो॒ धनु॑त्रीः । हरि॒: पर्य॑द्रव॒ज्जाः सूर्य॑स्य॒ द्रोणं॑ ननक्षे॒ अत्यो॒ न वा॒जी ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सा॒क॒म्ऽउक्षः॑ । म॒र्ज॒य॒न्त॒ । स्वसा॑रः । दश॑ । धीर॑स्य । धी॒तयः॑ । धनु॑त्रीः । हरिः॑ । परि॑ । अ॒द्र॒व॒त् । जाः । सूर्य॑स्य । द्रोण॑म् । न॒न॒क्षे॒ । अत्यः॑ । न । वा॒जी ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः । हरि: पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    साकम्ऽउक्षः । मर्जयन्त । स्वसारः । दश । धीरस्य । धीतयः । धनुत्रीः । हरिः । परि । अद्रवत् । जाः । सूर्यस्य । द्रोणम् । ननक्षे । अत्यः । न । वाजी ॥ ९.९३.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 93; मन्त्र » 1
    अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 3; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (अत्यो वाजी) बलवाले विद्युदादि पदार्थ (न) जैसे (ननक्षे) व्यापक हो जाते हैं, इसी प्रकार (सूर्य्यस्य, द्रोणं) सूर्य्यमण्डल का जो प्रभाकलश है तथा (जाः) उसकी जो दिशा उपदिशायें हैं, उनमें (हरिः) हरणशील परमात्मा (पर्य्यद्रवत्) सर्वत्र परिपूर्ण है। उस पूर्ण परमात्मा को (साकमुक्षः) एक समय में (मर्जयन्त) विषय करती हुई (स्वसारः) स्वयं सरणशील (दश धीः) १० प्रकार की इन्द्रियवृत्तियें (धीतयः) जो ध्यान द्वारा परमात्मा को विषय करनेवाली हैं और (धनुत्रीः) और मन की प्रेरक हैं, वे परमात्मा के स्वरूप को विषय करती हैं ॥१॥

    भावार्थ - योगी पुरुष जब अपने मन का निरोध करता है, तो उसकी इन्द्रियरूप वृत्तियें परमात्मा का साक्षात्कार करती हैं ॥१॥


    Bhashya Acknowledgment

    पदार्थः -
    (अत्यः, वाजी) विद्युदादयो महाबलाः पदार्थाः (न) यथा (ननक्षे) व्याप्नुवन्ति तथैव (सूर्यस्य, द्रोणं) सूर्यमण्डलस्य यः प्रभावकलशोऽस्ति तथा (जाः)  तदीया या  दिश उपदिशश्च सन्ति तासु (हरिः) हरणशीलः   परमात्मा (परि, अद्रवत्) सर्वत्र परिपूरितः तं पूर्णपरमात्मानं (साकमुक्षः) युगपत् (मर्जयन्त) विषयं कुर्वत्यः (स्वसारः) स्वयं सरणशीलाः (दश, धीः) दशधा इन्द्रियवृत्तयः (धीतयः) या ध्यानेन परमात्मानं विषयीकुर्वन्ति तथा (धनुत्रीः) मनःप्रेरिकाश्च सन्ति, ता एव परमात्मस्वरूपं विषयीकुर्वन्ति ॥१॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    Ten generous, agile, spontaneous and simultane ous sister faculties of the self-controlled, self-established yogi together concentrate, communicate and glorify Hari, Soma spirit of divine joy that eliminates want and suffering, and the Spirit, pervading the vibrations of divinity, the light born of the sun, radiates like a constant wave, reaches and settles in the heart core of the blessed soul, the seat of divinity. (The faculties are faculties of perception, thought and will which normally wander over the world of outside reality but which are controlled, concentrated and inverted in meditation and focussed on the presence of divinity within, and then the presence reveals itself in all its refulgent glory.)


    Bhashya Acknowledgment

    भावार्थ - साधक पुरुष जेव्हा आपल्या मनावर नियंत्रण ठेवतो तेव्हा त्याच्या इंद्रियरूप वृत्ती परमेश्वराचा विषय बनतात. ॥१॥


    Bhashya Acknowledgment
    Top