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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1045
    ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    29

    गो꣣षा꣡ इ꣢न्दो नृ꣣षा꣡ अ꣢स्यश्व꣣सा꣡ वा꣢ज꣣सा꣢ उ꣣त꣢ । आ꣣त्मा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ पू꣣र्व्यः꣢ ॥१०४५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    गो꣣षाः꣢ । गो꣢ । साः꣢ । इ꣣न्दो । नृषाः꣢ । नृ꣣ । साः꣢ । अ꣣सि । अश्वसाः꣢ । अ꣣श्व । साः꣢ । वा꣣जसाः꣢ । वा꣣ज । साः꣢ । उ꣣त꣢ । आ꣣त्मा꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । पू꣣र्व्यः꣢ ॥१०४५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    गोषा इन्दो नृषा अस्यश्वसा वाजसा उत । आत्मा यज्ञस्य पूर्व्यः ॥१०४५॥


    स्वर रहित पद पाठ

    गोषाः । गो । साः । इन्दो । नृषाः । नृ । साः । असि । अश्वसाः । अश्व । साः । वाजसाः । वाज । साः । उत । आत्मा । यज्ञस्य । पूर्व्यः ॥१०४५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1045
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 9
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा के गुण-कर्मों का वर्णन है।

    पदार्थ

    हे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्द-रस से आर्द्र करनेवाले परमात्मदेव ! आप (गोषाः) गायों, वेदवाणियों, भूमियों वा इन्द्रियों को देनेवाले, (नृषाः) पुरुषार्थी वीर सन्तानों को देनेवाले, (अश्वसाः) घोड़ों और प्राणों को देनेवाले, (उत) और (वाजसाः) बल, अन्न, धन और विज्ञान को देनेवाले (असि) हो। आप (यज्ञस्य) परोपकार-रूप यज्ञ के (पूर्व्यः) सनातनकाल से चले आये (आत्मा) प्राण हो ॥९॥

    भावार्थ

    अहो, महान् हैं जगदीश्वर के उपकार, जो हमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ उत्पन्न करके देता ह और ऐसा करता हुआ वह सबको परोपकार का उपदेश करता है ॥९॥

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    पदार्थ

    (इन्दो) हे आनन्दरसपूर्ण परमात्मन्! तू (गोषाः) वाणी वेदवाणी का सेवन कराने वाला (नृषाः) जीवन्मुक्तों को*20 सेवन कराने वाला (अश्वसाः) व्यापनशील मन का*21 सेवन करानेवाला (उत) और (वाजसाः) अमृत अन्नभोग का*22 सेवन कराने वाला (असि) है (यज्ञस्य पूर्व्यः-आत्मा) अध्यात्मयज्ञ—देवपूजा का*23 शाश्वतिक आत्मा—आधार है॥९॥

    टिप्पणी

    [*20. “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९]।] [*21. “अश्वोऽसि.....नृमणा असि” [तै॰ स॰ ७.१.१२.१]।] [*22. “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै॰ २.१९३]।] [*23. “यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु” [भ्वादि॰]।]

    विशेष

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    विषय

    प्रभु की आराधना

    पदार्थ

    हे (इन्दो) = ज्ञानरूप परमैश्वर्य-सम्पन्न प्रभो! आप हमें १. (गोषा:) = ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्त करानेवाले हैं। आपने कृपा करके हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ दी हैं, जिससे हम इस पञ्चभौतिक संसार को ठीक प्रकार से समझ सकें । २. (नृषा: असि) - आप समय-समय पर हमें नरों को – नेताओं को प्राप्त करानेवाले हैं। हम ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्त करके भी इन नरों की सहायता के बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं? हमें अपने जीवन में क्रमशः माता, पिता, आचार्य व अतिथियों से नेतृत्व प्राप्त होता रहता है, तभी हमारी उन्नति सम्भव होती है। ३. (अश्वसाः) = हे प्रभो! आपने हमें कर्मों में व्याप्त होनेवाली पाँच कर्मेन्द्रियाँ प्राप्त करायी हैं, जिनके द्वारा हम यम-नियमादिरूप से पाँच-पाँच भागों में विभिन्न कर्मों को सुचारुरूपेण कर पाते हैं । ४. (उत) = और (वाजसा:) = आप हमें शक्ति देनेवाले हैं । ५. हे प्रभो ! वस्तुतः (यज्ञस्य आत्मा) = सब श्रेष्ठतम कर्मों की आत्मा आप ही हो । आपके बिना किसी भी उत्तम कर्म का होना सम्भव नहीं है। आपकी शक्ति से ही तो सब यज्ञ हो पाते हैं । ६. (पूर्व्यः) = क्या ज्ञान, क्या शक्ति, क्या धन सभी दृष्टिकोणों से आप सबसे प्रथम स्थान में स्थित हैं। अथवा निर्माणमात्र के प्रारम्भ से पहले आप विद्यमान हैं और आपकी शक्ति से सर्वत्र निर्माण होता है ।

    भावार्थ

    हे प्रभो! आपने ज्ञानेन्द्रियाँ दी हैं, समय-समय पर नेताओं को प्राप्त कराते हैं, आपने कर्मेन्द्रियाँ दी हैं, शक्ति दी है। आपकी कृपा से ही सब यज्ञ पूर्ण होते हैं। आप पूर्व्य हैंनिर्माण से पहले हैं, अतएव निर्माता है ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे (इन्दो) एश्वर्यवन् ! आप (गोषा) वाणियों, गौओं, रश्मियों और ज्ञान इन्द्रियों के दाता (नृषा) पुत्र भृत्यादि तथा नेता अग्रणी पुरुषों के देने हारे, (अश्वसा) देहों में आत्मा, ब्रह्माण्ड में सूर्य और प्राणेन्द्रियों और धन में अश्वों के देने हारे, (वाजसा) ज्ञानबल और अन्न के देने वाले (उत) भी (असि) हो। आप ही (यज्ञस्य) आत्मा, ब्रह्माण्ड, जीवन और सब कर्मों के (पूर्व्यः) पूर्ण करनेहारे, सबसे आदिम (आत्मा) आत्मा, कर्त्ता, स्वामी हो।

    टिप्पणी

    ‘अस्मभ्यमिन्दविन्द्रयुः’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ (१) आकृष्टामाषाः (२, ३) सिकतानिवावरी च। २, ११ कश्यपः। ३ मेधातिथिः। ४ हिरण्यस्तूपः। ५ अवत्सारः। ६ जमदग्निः। ७ कुत्सआंगिरसः। ८ वसिष्ठः। ९ त्रिशोकः काण्वः। १० श्यावाश्वः। १२ सप्तर्षयः। १३ अमहीयुः। १४ शुनःशेप आजीगर्तिः। १६ मान्धाता यौवनाश्वः। १५ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १७ असितः काश्यपो देवलो वा। १८ ऋणचयः शाक्तयः। १९ पर्वतनारदौ। २० मनुः सांवरणः। २१ कुत्सः। २२ बन्धुः सुबन्धुः श्रुतवन्धुविंप्रबन्धुश्च गौपायना लौपायना वा। २३ भुवन आप्त्यः साधनो वा भौवनः। २४ ऋषि रज्ञातः, प्रतीकत्रयं वा॥ देवता—१—६, ११–१३, १७–२१ पवमानः सोमः। ७, २२ अग्निः। १० इन्द्राग्नी। ९, १४, १६, इन्द्रः। १५ सोमः। ८ आदित्यः। २३ विश्वेदेवाः॥ छन्दः—१, ८ जगती। २-६, ८-११, १३, १४,१७ गायत्री। १२, १५, बृहती। १६ महापङ्क्तिः। १८ गायत्री सतोबृहती च। १९ उष्णिक्। २० अनुष्टुप्, २१, २३ त्रिष्टुप्। २२ भुरिग्बृहती। स्वरः—१, ७ निषादः। २-६, ८-११, १३, १४, १७ षड्जः। १-१५, २२ मध्यमः १६ पञ्चमः। १८ षड्जः मध्यमश्च। १९ ऋषभः। २० गान्धारः। २१, २३ धैवतः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मनो गुणकर्माणि वर्णयसि।

    पदार्थः

    हे (इन्दो) तेजस्विन्, आनन्दरसेन क्लेदयितः परमात्मदेव ! त्वम् (गोषाः) गाः धेनूः वेदवाचः पृथिवीः इन्द्रियाणि वा सनोति ददातीति तादृशः, (नृषाः) नॄन् पुरुषार्थिनः वीरान् सन्तानान् सनोति ददातीति तादृशः, (अश्वसाः) अश्वान् तुरङ्गान् प्राणान् वा सनोति ददातीति तथाविधः, (उत) अपि च (वाजसाः) वाजं बलम् अन्नं धनं विज्ञानं वा सनोति ददातीति तथाविधः (असि) वर्तसे। त्वम् (यज्ञस्य) परोपकाररूपस्य अध्वरस्य (पूर्व्यः) पूर्वकालादागतः (आत्मा) प्राणः, असि ॥९॥

    भावार्थः

    अहो, महान्तः किल जगदीश्वरस्योपकारा योऽस्मभ्यमनेकानि बहुमूल्यानि वस्तून्युत्पाद्य ददाति, एवं च कुर्वन्नसौ सर्वान् परोपकारमुपदिशति ॥९॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।२।१०।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, Thou art the Giver of knowledge, progeny, enterprise and prosperity. Thou art the Primeval Lord of the universe !

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    Meaning

    O lord of peace and glory, you are the very soul of yajna, original and eternal since you are the foremost fount of all giving. You are the giver of cows, lands and the voices of wisdom and culture. You are the giver of children and grandchildren over ages of humanity. You are the giver of horses and all advancement and progress in achievements. You are the giver of food, sustenance and all powers and victories of success. Pray be that for us all time. (Rg. 9-2-10)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्दो)  હે આનંદરસપૂર્ણ પરમાત્મન્ ! (गोषाः) વાણી-વેદવાણીનું સેવન કરાવનાર (नृषाः) જીવનમુક્તોને સેવન કરાવનાર (अश्वसाः) વ્યાપનશીલ મનનું સેવન કરાવનાર (उत) અને (वाजसाः) અમૃત અન્નભોગનો સેવન કરનાર (असि) છે. (यज्ञस्य पूर्व्यः आत्मा) અધ્યાત્મયજ્ઞ-દેવપૂજાનો શાશ્વતિક આત્મા આધાર છે. (૯)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जगदीश्वराचे उपकार महान आहेत. तो आम्हाला अनेक बहुमूल्य वस्तु निर्माण करून देतो व ते दान देताना सर्वांना परोपकाराचा उपदेश करतो. ॥९॥

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