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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1111
ऋषिः - भुवन आप्त्यः साधनो वा भौवनः
देवता - विश्वे देवाः
छन्दः - द्विपदा त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
25
य꣣ज्ञं꣡ च꣢ नस्त꣣꣬न्वं꣢꣯ च प्र꣣जां꣡ चा꣢दि꣣त्यै꣡रिन्द्रः꣢꣯ स꣣ह꣡ सी꣢षधातु ॥११११॥
स्वर सहित पद पाठय꣣ज्ञ꣢म् । च꣣ । नः । तन्व꣢म् । च꣣ । प्रजा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । च꣣ । आदित्यैः꣢ । आ꣣ । दित्यैः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । स꣣ह꣢ । सी꣣षधातु ॥११११॥
स्वर रहित मन्त्र
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह सीषधातु ॥११११॥
स्वर रहित पद पाठ
यज्ञम् । च । नः । तन्वम् । च । प्रजाम् । प्र । जाम् । च । आदित्यैः । आ । दित्यैः । इन्द्रः । सह । सीषधातु ॥११११॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1111
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 23; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 7; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 23; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 7; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में अध्यात्म विषय तथा राष्ट्र का विषय वर्णित है।
पदार्थ
(इन्द्रः) हमारा जीवात्मा (आदित्यैः सह) सूर्य के समान ज्ञानसाधक मन-बुद्धि सहित ज्ञानेन्द्रियों के साथ मिलकर, अथवा (इन्द्रः) राष्ट्र का राजा (आदित्यैः सह) विद्वानों के साथ मिलकर (नः) हमारे (यज्ञं च) यज्ञ को, (तन्वं च) शरीर को (प्रजां च) और सन्तति वा राष्ट्र की प्रजा को (सीषधातु) सिद्ध करे ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थ
जीवात्मा मन, बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करके सब कुछ सिद्ध कर सकता है। उसी प्रकार विद्वान् प्रजाजन, राजा और राज्याधिकारी मिलकर पुरुषार्थ से सब यज्ञ-सुख, देह-सुख, सन्तति-सुख और प्रजा-सुख सिद्ध कर सकते हैं ॥२॥
पदार्थ
(नः) हमारे (यज्ञं च) आत्मा को*109 और (तन्वं च) शरीर को (प्रजां च) और प्रजा पुत्र शिष्य को (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (आदित्यैः सह सीषधातु) अदिति—मुक्ति के अधिकारी मुमुक्षु जीवन्मुक्तों के द्वारा सिद्ध बनावे॥२॥
टिप्पणी
[*109. “आत्मा वै यज्ञः” [श॰ ६.२.१.७]।]
विशेष
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विषय
सन्तान प्रभु की धरोहर है
पदार्थ
प्रभु चाहते हैं कि–(इन्द्रः) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव (आदित्यैः सह) = सदा गुणों का आदान करनेवाले सज्जनों के सङ्ग में वास करता हुआ (यज्ञं च) = उत्तम कर्मों को (नः तन्वं च) = हमारे दिये हुए इस शरीर को प्रजां च और इस हमारी प्रजा को, सन्तान को (सीषधातु) = जीवन- यात्रा में उन्नति के लिए साधन बनाए ।
प्रस्तुत मन्त्र में निम्न बातें ध्यान देने योग्य हैं
१. मनुष्य को इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनने का प्रयत्न करना । उसका नाम ही प्रभु ने ‘इन्द्र'=इन्द्रियों का अधिष्ठाता रक्खा है । २. सदा गुणीजनों के सम्पर्क में चलना, क्योंकि जैसों के साथ रहता है, वैसा ही मनुष्य बन जाता है । ३. जीवन यात्रा में सदा यज्ञिय मनोवृत्ति से चलना । प्रभु ने प्रजाओं को उत्पन्न ही यज्ञों के साथ किया है। 'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा० ' । ४. शरीर को अपना न समझ प्रभु का समझना, इसीलिए इसे पूर्ण स्वस्थ रखने का प्रयत्न करना । ५. सन्तान को प्रभु की धरोहर समझ मधुरता व प्रेम से, परन्तु बिना किसी मोह के उत्तम बनाना।
भावार्थ
हे प्रभो! हम इन्द्र बनें, आदित्यों के सहवास में रहें, यज्ञशील हों, आप के दिये शरीर को विकृत न होने दें, सन्तान को आपकी धरोहर समझें।
विषय
missing
भावार्थ
(नः) हमारे (यज्ञम्) आत्मा को (तन्वं च) और शरीर को (प्रजां च) और प्रजा सन्तति को (इन्द्रः) परमात्मा (आदित्यैः) द्वादश मासों, या आदित्य स्वरूप विद्वानों और प्राणों के (सह) साथ (सीषधातु) रक्षा कर।
टिप्पणी
‘सहचीक्लृपाति’।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ (१) आकृष्टामाषाः (२, ३) सिकतानिवावरी च। २, ११ कश्यपः। ३ मेधातिथिः। ४ हिरण्यस्तूपः। ५ अवत्सारः। ६ जमदग्निः। ७ कुत्सआंगिरसः। ८ वसिष्ठः। ९ त्रिशोकः काण्वः। १० श्यावाश्वः। १२ सप्तर्षयः। १३ अमहीयुः। १४ शुनःशेप आजीगर्तिः। १६ मान्धाता यौवनाश्वः। १५ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १७ असितः काश्यपो देवलो वा। १८ ऋणचयः शाक्तयः। १९ पर्वतनारदौ। २० मनुः सांवरणः। २१ कुत्सः। २२ बन्धुः सुबन्धुः श्रुतवन्धुविंप्रबन्धुश्च गौपायना लौपायना वा। २३ भुवन आप्त्यः साधनो वा भौवनः। २४ ऋषि रज्ञातः, प्रतीकत्रयं वा॥ देवता—१—६, ११–१३, १७–२१ पवमानः सोमः। ७, २२ अग्निः। १० इन्द्राग्नी। ९, १४, १६, इन्द्रः। १५ सोमः। ८ आदित्यः। २३ विश्वेदेवाः॥ छन्दः—१, ८ जगती। २-६, ८-११, १३, १४,१७ गायत्री। १२, १५, बृहती। १६ महापङ्क्तिः। १८ गायत्री सतोबृहती च। १९ उष्णिक्। २० अनुष्टुप्, २१, २३ त्रिष्टुप्। २२ भुरिग्बृहती। स्वरः—१, ७ निषादः। २-६, ८-११, १३, १४, १७ षड्जः। १-१५, २२ मध्यमः १६ पञ्चमः। १८ षड्जः मध्यमश्च। १९ ऋषभः। २० गान्धारः। २१, २३ धैवतः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथाऽध्यात्मविषयो राष्ट्रविषयश्चोच्यते।
पदार्थः
(इन्द्रः) अस्माकं जीवात्मा (आदित्यैः सह)आदित्यवद् ज्ञानसाधनैर्मनोबुद्धिसहितैः ज्ञानेन्द्रियैः सार्धम्, यद्वा (इन्द्रः) राष्ट्रस्य राजा (आदित्यैः सह) विद्वद्भिः सार्धम् मिलित्वा (नः) अस्माकम् (यज्ञं च) अध्वरं च, (तन्वं च) देहं च, (प्रजां च) सन्ततिं राष्ट्रस्य प्रजां च (सीषधातु) साधयतु ॥२॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥२॥
भावार्थः
जीवात्मा मनोबुद्धिज्ञानेन्द्रियाण्युपयुज्य सर्वं साद्धुं शक्नोति। तथैव विद्वांसः प्रजाजना राजा राज्याधिकारिणश्च मिलित्वा पुरुषार्थेन सर्वं यज्ञसुखं, देहसुखं, सन्ततिसुखं, प्रजासुखं च साद्धुं शक्नुवन्ति ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १०।१५७।२, ‘सीषधातु’ इत्यत्र ‘ची॑क्लृपाति’ इति पाठः।
इंग्लिश (2)
Meaning
May God, bring to fruition our soul, our bodies, and our offspring, through learned persons.
Meaning
Indra, the sun, the wind, electric energy of the firmament with all years phases of the sun, supports, strengthens and promotes our yajna, our bodys health and our people and future generations. (Rg. 10-157-2)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (नः) અમારા (यज्ञ च) આત્માને તથા (तन्वं च) શરીરને (प्रजां च) તથા પ્રજા, પુત્ર, શિષ્યને (इन्द्रः) ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મા (अदित्यैः सह सीषधातु) અદિતિ-મુક્તિના અધિકારી મુમુક્ષુ જીવન મુક્તો દ્વારા સિદ્ધ બનાવે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
जीवात्मा मन, बुद्धी व ज्ञानेन्द्रियांचा उपयोग करून सर्व काही सिद्ध करू शकतो. त्याच प्रकारे विद्वान प्रजाजन, राजा व राज्याधिकारी यांनी मिळून पुरुषार्थाने सर्व यज्ञ-सुख, देह-सुख, संतती-सुख व प्रजासुख सिद्ध करू शकतात. ॥२॥
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