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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 121
    ऋषिः - गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    58

    य꣣ज्ञ꣡ इन्द्र꣢꣯मवर्धय꣣द्य꣢꣫द्भूमिं꣣ व्य꣡व꣢र्तयत् । च꣣क्राण꣡ ओ꣢प꣣शं꣢ दि꣣वि꣢ ॥१२१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य꣣ज्ञः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣वर्धयत् । य꣢त् । भू꣡मि꣢म् । व्य꣡व꣢꣯र्तयत् । वि꣣ । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । च꣣क्राणः꣢ । ओपश꣢म् । ओ꣣प । श꣢म् । दि꣣वि꣢ ॥१२१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्यद्भूमिं व्यवर्तयत् । चक्राण ओपशं दिवि ॥१२१॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यज्ञः । इन्द्रम् । अवर्धयत् । यत् । भूमिम् । व्यवर्तयत् । वि । अवर्तयत् । चक्राणः । ओपशम् । ओप । शम् । दिवि ॥१२१॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 121
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 7
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 1;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में, यज्ञ से ही परमेश्वर की महिमा सर्वत्र फैली हुई है, इस विषय का वर्णन करते हैं।

    पदार्थ

    (यज्ञः) परोपकार के लिए किये जानेवाले महान् कर्म ने (इन्द्रम्) परमात्मा को अर्थात् उसकी महिमा को (अवर्धयत्) बढ़ाया हुआ है। परमात्मा के यज्ञ कर्म का एक दृष्टान्त यह है (यत्) कि (दिवि) द्युलोक में (ओपशम्) सूर्यरूप मुकुट को (चक्राणः) रचनेवाला वह परमात्मा (भूमिम्) भूमि को (व्यवर्तयत्) सूर्य के चारों ओर घुमा रहा है ॥७॥

    भावार्थ

    परमेश्वर यज्ञ का आदर्शरूप है। उसके किये जाते हुए यज्ञ का ही उदाहरण है कि वह द्युलोक में महान् मुकुटमणि सूर्य को संस्थापित करके उसके चारों ओर भूमि को अण्डाकार मार्ग से चक्ररूप में घुमा रहा है, जिससे छहों ऋतुओं का चक्र चलता है ॥७॥

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    पदार्थ

    (यज्ञः-इन्द्रम्-अवर्धयत्) अध्यात्म यज्ञ ने उपासक के अन्दर परमात्मा को बढ़ा दिया—स्पष्ट साक्षात् करा दिया—करा देता है (यत्-भूमिं व्यवर्तयत्) पुनः वह परमात्मा उपासक की भूमि—स्थिति को विवर्तित कर देता है—बदल देता है बद्धावस्था से जीवन्मुक्तावस्था कर देता है (ओपशं-दिवि-चक्राणः) उस परमात्मा के समीप में शयन करनेवाले उपासक आत्मा को दिव्यधाम-अमृतधाम में पहुँचाने के हेतु।

    भावार्थ

    अध्यात्म यज्ञ से उपासक के अन्दर परमात्मा साक्षात् हो जाता है, पुनः वह साक्षात् हुआ परमात्मा उपासक आत्मा की भूमि को बदल देता है उसे बद्ध से जीवन्मुक्त कर देता है परमात्मा के समीप शयन करनेवाले आत्मा को अमृतधाम—मोक्ष में पहुँचाने के लिए॥७॥

    विशेष

    ऋषिः—गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ (इन्द्रियों के विषय में अच्छी उक्ति समर्पण करने वाला और प्राण के सम्बन्ध में अच्छी उक्ति प्राणायाम करने वाला जन)॥<br>

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    विषय

    मस्तिष्क का आभूषण

    पदार्थ

    इस मन्त्र के ऋषि 'गोषूक्ती' और 'अश्वसूक्ती' हैं। गौवों से-ज्ञानेन्द्रियों से उत्तम कथन करनेवाला गोषूक्ती है और अश्वों-कर्मेन्द्रियों से उत्तम कथन करनेवाला अश्वसूक्ती है, अर्थात् जिनकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ दोनों ही ठीक मार्ग पर चल रही हैं ऐसे ये ऋषि हैं। इन ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों के ठीक चलने का रहस्य इस बात में है कि रथी ‘इन्द्र’ शक्तिशाली है। वह निर्बल होता तो ये घोड़े मार्ग से विचलित हो जाते, परन्तु यहाँ तो (यज्ञः) = यज्ञ की भावना ने (इन्द्रम्)  आत्मा को (अवर्धयत्) बढ़ाया है। यज्ञ की भावना स्थूलरूप में त्याग की भावना है। जब मनुष्य इस भावना को अपने अन्दर जाग्रत् करता है तो उसकी आत्मिक शक्ति का विकास होता है। इसके विपरीत जब वह त्याग की भावना से दूर होकर भोगों को बढ़ाने में जुट जाता है तो वह इन्द्रियों का दास बन जाता है और उसकी आत्मा निर्बल हो जाती है। यज्ञ 'इन्द्र' को बढ़ाता है तो यज्ञ का अभाव 'इन्द्रियों' को। इसलिए आत्मिक शक्ति का विकास चाहनेवाला अपने अन्दर यज्ञ की भावना का पोषण करता है। ये गोषूक्ती और अश्वसूक्ती तो खूब यज्ञ करते हैं, इतना (यत्) = कि (भूमिम्) = इस पृथिवी को ही व्(यवर्तयत्) = उलट देते हैं। जैसे खूब दान देनेवाला सारी थैली को ही उलट देता है, उसी प्रकार ये यज्ञशील व्यक्ति अपने सारे कोश को उलटकर खाली कर देता है। अपने पास कुछ बचाता नहीं। यही सर्वमेधयज्ञ कहलाता है। यह यज्ञिय भावना हमारे अन्दर उत्पन्न हो, इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता है, अतः यह ऋषि (दिवि) = मूर्धा में [मस्तिष्क में] (ओपशम्) = मस्तक के ज्ञानरूप आभरण को (चक्राणः) = ग: - बनाने के स्वभाववाला होता है। यह ज्ञान उसे पवित्र करता है। उसमें यज्ञ की भावना को जगाये रखता है और इस प्रकार उसकी आत्मा को बलवान् बनाता है। ('कस्य स्विद् धनम्') = भला यह धन किसका है? यह सोचना ही सबसे बड़ा ज्ञान है। यह धन आज तक किसी के साथ नहीं गया, यह समझकर मनुष्य यज्ञशील बनता है – भोगासक्त नहीं होता- धन व इन्द्रियों का दास नहीं बनता।

    भावार्थ

    मनुष्य यज्ञशील बने, दानी हो और अपने मस्तिष्क को ज्ञान से अलंकृत करे ।

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    विषय

    परमेश्वर की स्तुति

    भावार्थ

    भा० = ( यज्ञः ) = यज्ञ प्रजापति ( इन्द्रं ) = आत्मा को ( अवर्धयत् ) = बढ़ाता है ( यद् ) = क्योंकि यज्ञ ही ( दिवि ) = सूर्य के आश्रय, आकाश में ( ओपशं  ) = लटकाकर ( आ  चक्राण: ) = चक्र के समान चलाता हुआ ( भूमिं  ) = भूमि को ( वि अवर्तयत् ) = विशेषरूप से वृत्तगति में घुमाता है । इस अर्थ से 'इन्द्र' का अर्थ सूर्य' और 'यज्ञ' का अर्थ 'सौर जगत्' या प्रवर्त्तक प्रजापति होता है। समस्त ब्रह्माण्ड में इस सौर जगत् के अनुकरण में ही यह यज्ञवेदी और छोटे अनुपात में यह देह रूप यज्ञभूमि बनी है, वेदमन्त्रों में समान रूप से तीनों का वर्णन किया गया है ।  अध्यात्म पक्ष में - इस जीवन यज्ञ ने इन्द्र आत्मा के सामर्थ्य को बढ़ा दिया है अर्थात् देहरूप कर्मभूमि को नाना प्रकार की प्रवृत्तियों में बहने दिया ।  और द्यौलक रूप मस्तक में वह विद्यमान है, इत्यादि । 
     

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ ।

    छन्दः - गायत्री। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ यज्ञेनैव परमेश्वरस्य महिमा सर्वत्र प्रसरतीत्याह।

    पदार्थः

    (यज्ञः) परोपकाराय क्रियमाणं महत् कर्म (इन्द्रम्) परमात्मानम्, परमात्मनो महिमानमिति यावत्, (अवर्धयत्) वर्धयति। सामान्यकालार्थे लङ्। यज्ञे निदर्शनमाह—(यत्) यथा (दिवि) द्युलोके (ओपशम्२) सूर्यरूपं किरीटम्। आ आगत्य उपशेते शिरसि विराजते इति ओपशः किरीटम्। (चक्राणः) चक्रिवान् स इन्द्रः। कृधातोर्लिटः कानच्। चित्वात् चितः। अ० ६।१।१६३ इत्यन्तोदात्तत्वम्। (भूमिम्) पृथिवीम् (व्यवर्तयत्) सूर्यं परितो विवर्तयति परिक्रमयति ॥७॥

    भावार्थः

    परमेश्वरो हि यज्ञस्यादर्शरूपः। तेन क्रियमाणस्य यज्ञस्यैव निदर्शनं विद्यते यत् स द्युलोके महान्तं मुकुटमणिभूतं सूर्यं संस्थाप्य तं परितः पृथिवीम् अण्डाकृतिमार्गेण चक्रतया भ्रमयति, येन षड्ऋतुचक्रं प्रवर्तते ॥७॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।१४५, अथ० २०।२७।५, साम० १६३९। २. ओपशं गर्जितलक्षणं शब्दम्—इति वि०। ओपशं मेघम्। उपशेरतेऽस्मिन्नापः इति ओपशः—इति भ०। दिवि अन्तरिक्षे मेघम् ओपशम् उपेत्य शयानं चक्राणः कुर्वन्। यद्वा आत्मनि समवेतो वीर्यविशेषः ओपशः, तमन्तरिक्षे कुर्वन्—इति सा०।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The united force of knowledge and action, coupled with deliberation, makes the body perform diverse deeds and Tends strength to the soul.

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    Meaning

    Yajna, joint creative endeavour which protects and replenishes the earth and environment, pleases and elevates Indra, the ruler, and creates a place of bliss in the light of heaven for the doer. (Rg. 8-14-5)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (यज्ञः इन्द्रम् अवर्धयत्) અધ્યાત્મયજ્ઞના ઉપાસકની અંદર પરમાત્માએ વૃદ્ધિ કરી સ્પષ્ટ સાક્ષાત્ કરાવ્યો - કરાવી દે છે , (यत् भूमिं व्यवर्तयत्) પુનઃ તે પરમાત્મા ઉપાસકની ભૂમિ-સ્થિતિને વિવર્તિત કરી દે છે - બદલી નાખે છે. બંધનથી જીવન મુક્ત અવસ્થા કરી દે છે. (ओपशं दिवि चक्राणः) તે પરમાત્માની સમીપમાં શયન કરનાર ઉપાસક આત્માને દિવ્યધામ - અમૃતધામમાં પહોંચાડવા માટે કરી દે છે. (૭)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : અધ્યાત્મયજ્ઞના ઉપાસકની અંદર પરમાત્મા સાક્ષાત્ થઈ જાય છે , પુનઃ તે સાક્ષાત્ થતા પરમાત્મા ઉપાસક આત્માની ભૂમિને બદલી દે છે , પરમાત્માની સમીપમાં શયન કરનાર આત્માને અમૃતધામ-મોક્ષમાં પહોંચાડવા માટે બંધનથી જીવન મુક્ત કરી દે છે. (૭)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    یَگ سے بَھگوان کی پرسنتا

    Lafzi Maana

    (یگیہ) پروپکار، سیوا، خدمتِ خلق جس کے لئے یگیہ کا نام پرجا پتی ہے اور پرمیشور کی بھگتی، اُپاسنا سے اُس کی قُربت، یقیناً یہ سبھی کرم (اِندرم اور دَھیت) اُس اِندر بھگوان کی پرسنتا اور کِرپا بڑھاتے ہیں۔ (یت) جو پرمیشور کہ (بُھومی ویورتیت) زمین کو سُورج کے چاروں طرف گھما رہا ہے اور (دِوی اوپشم چکران) دئیو لوک میں جس نے سُورج، چاند، تارے وغیرہ جگت کے سر کے طور پر بنا کر چمکائے ہیں۔

    Tashree

    یگیہ نام پرمیشور کا ہے جس سے ہو سب کا پالن، ہے ثواب کا کام اِس سے ہوتے ہیں اِیشور پرسّن۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    परमेश्वर यज्ञाचे आदर्शरूप आहे. त्याने केलेल्या यज्ञाचे हे उदाहरण आहे, की तो द्युलोकात महान मुकुटमणी सूर्याला संस्थापित करून त्याच्या चारही बाजूंनी भूमीला अंडाकार मार्गाने चक्ररूपाने फिरवीत आहे, त्यामुळेच सहा ऋतूंचे चक्र चालते. ॥७॥

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    विषय

    पुढील मंत्रात यज्ञामुळेच परमेश्वराचा महिमा सर्वत्र प्रसृत होत आहे, हा विषय प्रतिपादिला आहे. -

    शब्दार्थ

    (यज्ञः) परोपकारासाठी करीत असलेल्या श्रेष्ठ महान कर्मांनी (इन्द्रम्) परमेश्वराला म्हणजे त्याच्या महिमेला (अवर्धयत्) वाढविले आहे. परमेश्वराच्या त्या यज्ञकर्माचे एक उदाहरण असे (यत्) की (दीवि) घुतोकात (ओषशम्) सूर्यरूप मुकुटाचे निर्माण करणारा तो परमात्म (भूमिम्) भूमीला (व्यवर्तयत्) सूर्याभोवती फिरवीत आहे. ।। ७।।

    भावार्थ

    परमेश्वर यज्ञाचे आदर्श रूप आहे. (तो करीत असलेल्या यज्ञ सर्वोत्कृष्ट आहे) तो करीत असलेल्या यज्ञाचेच एक उदाहरण असे की तो द्युलोकात महान मुकुटमणी सूर्याला त्याच्या स्थानात संस्थापित करून पृथ्वीला चारही दिशेला अण्डाकार मार्गावर परिक्रमा करवीत आहे. ज्यामुळे पृथ्वीवर सहा ऋतूंचे चक्र फिरत आहे. ।। ७।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    பூமியை வேறுவடிவம் செய்யும் பொழுது வானத்தில் சயனம் செய்யுங்கால் யக்ஞமானது இந்திரனைப் [1] பெரியவனாகச் செய்கிறது.

    FootNotes

    [1].பெரியவனாக - நம்முடைய மனத்தில்

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