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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1439
ऋषिः - कविर्भार्गवः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
22
प꣡व꣢मानो असिष्यद꣣द्र꣡क्षा꣢ꣳस्यप꣣ज꣡ङ्घ꣢नत् । प्र꣣त्नव꣢द्रो꣣च꣢य꣣न्रु꣡चः꣢ ॥१४३९॥
स्वर सहित पद पाठप꣡व꣢꣯मानः । अ꣣सिष्यदत् । र꣡क्षा꣢꣯ꣳसि । अ꣣पज꣡ङ्घ꣢नत् । अ꣣प । ज꣡ङ्घ꣢꣯नत् । प्र꣣त्नव꣢त् । रो꣣च꣡यन् । रु꣡चः꣢꣯ ॥१४३९॥
स्वर रहित मन्त्र
पवमानो असिष्यदद्रक्षाꣳस्यपजङ्घनत् । प्रत्नवद्रोचयन्रुचः ॥१४३९॥
स्वर रहित पद पाठ
पवमानः । असिष्यदत् । रक्षाꣳसि । अपजङ्घनत् । अप । जङ्घनत् । प्रत्नवत् । रोचयन् । रुचः ॥१४३९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1439
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि उपासना किया हुआ जगदीश्वर क्या करता है।
पदार्थ
(पवमानः) पवित्रतादायक आनन्दवर्षी जगदीश्वर (रक्षांसि) काम, क्रोध आदि रिपुओं को और पापों को (अपजङ्घनत्) नष्ट करता हुआ (प्रत्नवत्) पुरातन अग्नि के समान (रुचः) तेजों को (रोचयन्) प्रदीप्त करता हुआ (असिष्यदत्) बह रहा है ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थ
परमेश्वर की कृपा से उपासक के अन्तःकरण से वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं, तेज दमकते हैं और हृदय कालिमा से रहित पवित्र हो जाता है ॥५॥
पदार्थ
(पवमानः) धारारूप में प्राप्त होने वाला परमात्मा (रक्षांसि अपजङ्घनत्) रक्षा जिनसे करनी चाहिए ऐसे दुर्गुणों पापों को नष्ट करता हुआ (प्रत्नवत् ‘प्रत्नवती’ रुचः-रोचयन्) परम्परा से चली आई८ दीप्तियों—ज्ञानज्योतियों को प्रकाशित करता हुआ (असिष्यदत्) प्राप्त होता है॥५॥
विशेष
<br>
विषय
ज्योतियों की जगमगाहट
पदार्थ
शरीर में सात्त्विक अन्न से उत्पन्न होनेवाली शक्ति ‘सोम' है । यह हमारे जीवनों में पवित्रता के सञ्चार का कारण बनती है, अत: 'पवमान' नामवाली होती है। ये (पवमानः) = पवित्रता करनेवाले सोम हमारे शरीरों में (रक्षांसि) = अपने रमण के लिए औरों का क्षय करनेवाले रोग-कृमिरूप राक्षसों को (अपजंघनत्) = नष्ट करके दूर करता हुआ (असिष्यदत्) = बहता है । [स्यन्दू – प्रस्रवणे] । यह शरीर को नीरोग करके (प्रत्नवत्) = पहले की भाँति (रुचः) = कान्तियों को (रोचयन्) = चमका देता है। हमारे शरीर पहले प्रकृत अवस्था में जैसे चमकते थे वैसे ही अब नीरोग होकर फिर चमक उठते हैं । १. सोम के अभाव में रोगकृमियों ने हमारे शरीर पर अपना अधिकार कर लिया था, परन्तु इस सोम ने उनका बुरी तरह संहार कर दिया है। अब शरीर फिर पहले की भाँति चमकने लगा है। २. सोम के अभाव में राक्षसी वृत्तियों ने मन को भी मलिन कर दिया था। अब इस सुरक्षित सोम ने इन राक्षसी वृत्तियों को समाप्त करके मन व हृदय को पवित्र व उज्वल बना दिया है । ३. ईंधन न मिलने से ज्ञानाग्नि भी बुझ-सी चली थी, पर अब इस सोमरूप ईंधन को पाकर ज्ञानाग्नि भी दीप्त हो उठी है। एवं, क्या शरीर, क्या हृदय, और क्या मस्तिष्क सभी की कान्तियाँ पहले की भाँति फिर से खूब चमक उठी हैं। सोम ने हमारे शरीर, हृदय व मस्तिष्क सभी को ‘रोचिष्मान्'–कान्तिवाला बना दिया है। इस प्रकार शरीर, मन व बुद्धि की शक्तियों को उज्ज्वल बनाकर यह व्यक्ति भार्गव— तेजस्वी तो बना ही है साथ ही बुद्धि की तीव्रता ने इसे क्रान्तदर्शी भी बना दिया है। एवं, मन्त्र का ऋषि यह ‘कविर्भार्गव' अन्वर्थ नामवाला है ।
भावार्थ
सोमरक्षा से राक्षसों का संहार हो, पहले की भाँति हमारे जीवन-गगन में ज्योतियाँ चमक उठें।
विषय
missing
भावार्थ
(पवमानः) अति शुद्धकान्तिरूप से देदीप्यमान सोमरूप अन्तरात्मा का ब्रह्मानन्द रस (असिष्यदद्) जब द्रवित होता है तब (प्रत्नवत्) पूर्व के अपने पुरातन (रुचः) कान्तियों को (रोचयन्) चमकाता हुआ (रक्षांसि) समस्त पाप, कुवासना, दुःसंकल्पों को अनायास (अप जंघनत्) दूर मार भगाता है। इस सूक्त में सूर्य, आत्मा, राजा, प्राण, शुक्र आदि समस्त प्रेरक शक्तियों को सोमधारा के दृष्टान्त से वर्णित किया गया है। मधु, घृत आदि शब्द वेद में ज्ञान के वाचक भी हैं। जैसे शतपथ में पञ्चमहायज्ञ प्रकरण में—पय आहुति=ऋग्वेद की ऋचाओं का स्वाध्याय, अग्न्याहुति=यजुर्वेद का स्वाध्याय, सोमाहुति=सामवेद का स्वाध्याय, मेदाहुति=अथर्ववेद के मन्त्रों का स्वाध्याय और मधु आहुति=अन्य शेष विद्या जैसे वाकोवाक्य, इतिहास, पुराण, गाथा, नाराशंसी इत्यादि का स्वाध्याय कहा जाता है। (शत० कां० १२। ५। ६। ३। ८) इत्यादि रूप से यह सोम का सवन ज्ञानपरक समझना चाहिये। इसी प्रकार अन्यत्र भी स्वाध्याय प्रशंसा प्रकरण में ‘मधु ह वा ऋचः’। ‘घृतं ह सामानि अमृतं यजूंषि’ यद् हवा अयं वाकोवाक्यमधीतो क्षीरोदनमांसोदनौ भवतः। (शत० का० ११। २। ७। ५)।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ कविर्भार्गवः। २, ९, १६ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ३ असितः काश्यपो देवलो वा। ४ सुकक्षः। ५ विभ्राट् सौर्यः। ६, ८ वसिष्ठः। ७ भर्गः प्रागाथः १०, १७ विश्वामित्रः। ११ मेधातिथिः काण्वः। १२ शतं वैखानसाः। १३ यजत आत्रेयः॥ १४ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १५ उशनाः। १८ हर्यत प्रागाथः। १० बृहद्दिव आथर्वणः। २० गृत्समदः॥ देवता—१, ३, १५ पवमानः सोमः। २, ४, ६, ७, १४, १९, २० इन्द्रः। ५ सूर्यः। ८ सरस्वान् सरस्वती। १० सविता। ११ ब्रह्मणस्पतिः। १२, १६, १७ अग्निः। १३ मित्रावरुणौ। १८ अग्निर्हवींषि वा॥ छन्दः—१, ३,४, ८, १०–१४, १७, १८। २ बृहती चरमस्य, अनुष्टुप शेषः। ५ जगती। ६, ७ प्रागाथम्। १५, १९ त्रिष्टुप्। १६ वर्धमाना पूर्वस्य, गायत्री उत्तरयोः। १० अष्टिः पूर्वस्य, अतिशक्वरी उत्तरयोः॥ स्वरः—१, ३, ४, ८, ९, १०-१४, १६-१८ षड्जः। २ मध्यमः, चरमस्य गान्धारः। ५ निषादः। ६, ७ मध्यमः। १५, १९ धैवतः। २० मध्यमः पूर्वस्य, पञ्चम उत्तरयोः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथोपासितो जगदीश्वरः किं करोतीत्याह।
पदार्थः
(पवमानः) पवित्रतादायकः आनन्दस्रावी जगदीश्वरः (रक्षांसि) कामक्रोधादीन् रिपून् पापानि च अपजङ्घनत् हिंसन्, (प्रत्नवत्) पुरातनाऽग्निवत्। [प्रत्नो होता वरेण्यः। ऋ० २।७।६ इत्यादिप्रामाण्याद् अग्निः प्रत्नः।] (रुचः) तेजांसि (रोचयन्) प्रदीपयन् (असिष्यदत्) प्रस्यन्दते ॥५॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥५॥
भावार्थः
परमेश्वरकृपयोपासकस्यान्तःकरणाद् वासनाः क्षीयन्ते तेजांसि दीप्यन्ते हृदयं च निष्कलुषं पवित्रं जायते ॥५॥
इंग्लिश (2)
Meaning
When the pure, divine joy of the soul flows onward, flashing out splendour as of old, it extirpates all sins, evil desires and ignoble resolves.
Meaning
May Soma, pure and purifying, all pervasive, destroy all evils and negativities, and continue to illumine the brilliant regions of the universe, macrocosmic as well as microcosmic, as ever before. (Rg. 9-49-5)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (पवमानः) ધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થનાર પરમાત્મા (रक्षांसि अपजङ्घनत्) જેનાથી રક્ષા કરવી જોઈએ એવા દુર્ગુણો, પાપોને નષ્ટ કરીને (प्रत्नवत् "प्रत्नवती" रुचः रोचयन्) પરંપરાથી ચાલી આવતી દીપ્તિઓ-જ્ઞાનજ્યોતિઓને પ્રકાશિત કરીને (असिष्यदत्) પ્રાપ્ત થાય છે. (૫)
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वराच्या कृपेने उपासकाच्या अंत:करणातील वासना क्षीण होतात, तेज चमकू लागते व हृदय काळिमारहित होऊन पवित्र होते. ॥५॥
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