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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1468
    ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    21

    यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ ब्र꣣ध्न꣡म꣢रु꣣षं꣡ चर꣢꣯न्तं꣣ प꣡रि꣢ त꣣स्थु꣡षः꣢ । रो꣡च꣢न्ते रोच꣣ना꣢ दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ । ब्र꣣ध्न꣢म् । अ꣣रुष꣢म् । च꣡र꣢न्तम् । प꣡रि꣢꣯ । त꣣स्थु꣢षः꣢ । रो꣡च꣢꣯न्ते । रो꣣चना꣢ । दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः । रोचन्ते रोचना दिवि ॥१४६८॥


    स्वर रहित पद पाठ

    युञ्जन्ति । ब्रध्नम् । अरुषम् । चरन्तम् । परि । तस्थुषः । रोचन्ते । रोचना । दिवि ॥१४६८॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1468
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 12; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 4; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में दो हरियों का रथ में जोड़ना वर्णित है।

    पदार्थ

    प्रथम—प्राण-अपान के विषय में। विद्वान् योगी लोग (अस्य) इस इन्द्र नामक जीवात्मा के (रथे) शरीररूप रथ में (काम्या) चाहने योग्य, (विपक्षसा) प्राणक्रिया और अपानक्रिया रूप विशिष्ट पंखोंवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) चतुर, (नृवाहसा) मनुष्य-देह को वहन करनेवाले (हरी) प्राण-अपान रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) प्राणायाम की विधि से उपयोग में लाते हैं ॥ द्वितीय—शिल्प के विषय में। शिल्पी लोग (अस्य) इस सूर्य या बिजली रूप अग्नि के (काम्या) कमनीय, (विपक्षसा) परस्पर विरुद्ध गुणवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) घर्षणशील, (नृवाहसा) मनुष्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जानेवाले (हरी) ऋणात्मक विद्युत् तथा धनात्मक विद्युत् रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) भूयान, जलयान तथा विमानों में जोड़ते हैं ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे प्राणायाम का अभ्यास करनेवाले विद्वान् लोग प्राण-अपान रूप घोड़ों को नियुक्त करके शरीर-रथ को चलाते हैं,वैसे ही शिल्पी लोग ऋण और धन विद्युत् को यान आदि तथा घर आदि में लगाकर यात्रा और प्रकाश किया करें ॥२॥

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    पदार्थ

    (अरुषम्) आरोचन—समन्तरूप से प्रकाशमान१ (परिचरन्तम्) परिप्राप्त—व्यापक (ब्रध्नम्) महान्२ परमात्मा को (तस्थुषः) उपासकजन३ (युञ्जन्ति) युक्त होते हैं—उसके साथ योग को प्राप्त होते हैं, पुनः वे योगी उपासक (दिवि रोचना रोचन्ते) द्योतनात्मक मोक्षधाम में अध्यात्म ज्ञानप्रकाशयुक्त हुए शोभित होते हैं॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—मधुच्छन्दाः (मीठी इच्छा वाला या मधुपरायण उपासक)॥ देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥<br>

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    विषय

    मन को प्रभु में लगाना

    पदार्थ

    प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि ‘शतं वैखानसाः'=सैकड़ों आसुर वृत्तियों को विशेषरूप से उखाड़ देनेवाले युञ्जान पुरुष [योगमार्ग पर चलनेवाले पुरुष] (परितस्थुष:) = चारों ओर ठहरे हुए पदार्थों को (चरन्तम्) = चरते हुए—उनका भक्षण करते हुए – उन्हीं मैं निरन्तर विचरते हुए अपने (ब्रध्नम्) = महान् [नि० ३.३.२] (अरुषम्) = अत्यन्त दीप्त shining, गतिशील wandering मन को (अरुषम्) = क्रोधशून्य करके (युञ्जन्ति) = [ब्रध्नं अरुषम्] = उस महान्, देदीप्यमान प्रभु के साथ जोड़ते हैं ।

    इस मन्त्र में ‘ब्रध्नम् अरुषं' ये दोनों विशेषण मन तथा प्रभु की ओर लगाये गये हैं। महान् दीप्त मन को महान् देदीप्यमान प्रभु में लगाना है । यह मन महान् है इसमें तो सन्देह का प्रश्न ही नहीं । यह बन्ध व मोक्ष दोनों का ही कारण है । अत्यन्त चञ्चल होकर बन्ध का कारण बनता है [अरुष– wandering] तथा देदीप्यमान व क्रोध-शून्य होकर [अरुष = दीप्त, क्रोधशून्य] मोक्ष को प्राप्त कराता है। विषयों में भ्रमण करता है तो बन्ध का कारण होता है— विषयों से ऊपर उठता है तो मोक्ष प्राप्त कराता है। [बन्धाय विषयासक्तं, मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्]।

    इस प्रकार मन को विषयों से हटाकर प्रभु में जोड़नेवाले युञ्जान लोग (रोचनाः) = चमकनेवाले होते हैं— उनके चेहरों पर ब्रह्मदर्शन का उल्लास दिखता है । ये लोग (दिवि) = उस ज्योतिर्मय ब्रह्मलोक में रोचन्ते=शोभा पाते हैं - अर्थात् ये लोग मोक्षसुख का लाभ करते हैं ।

    भावार्थ

    हम मन को प्रभु में लगाने के लिए यत्नशील हों, यही मोक्ष का मार्ग है।

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    विषय

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    भावार्थ

    जो विद्वान् साधक योगी लोग (तस्थुषः) स्थिर आसन होकर (परिचरन्तं) समस्त देह में गति करने हारे, (अरुषः) सब मर्मस्थानों में विराजमान, उनका नाश न करने हारे (ब्रघ्नं) विशाल, सब इन्द्रियगण को अपने बल से बांधने और उनको चलाने हारे मुख्य प्राण को (युञ्जन्ति) योगाभ्यास द्वारा प्राप्त करते हैं वे (रोचनाः) कान्तिसम्पन्न होकर (दिवि) सात्विक ऊर्ध्व स्थान, ज्ञानप्रकाशमय मोक्ष में (रोचन्ते) विराजते और शोभा पाते हैं या (दिवि) मूर्द्धास्थान में विशेष तेज ले प्रकाशमान होते हैं। अथवा—जो विद्वान् योगी (तस्थुषः परिचरन्तं) समस्त स्थावर और जंगम पदार्थों में व्यापक (अरुषं) सब के प्रति स्नेहवान् (ब्रघ्नं) सर्वाश्रय, सबसे महान्, ब्रह्मस्वरूप परमेश्वर को (युञ्जन्ति) योग समाधि द्वारा प्राप्त करते हैं वे (दिवि) प्रकाशमान मोक्ष स्थान में (रोचनाः) तेजोमय होकर (रोचन्ते) विराजमान होते हैं। अथवा, जो शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये (ब्रघ्नं) सूर्य को, (अरुषं) अग्नि को, (चरन्तं) वायु को सम्यक् रीति से कार्य में नियुक्त करते हैं वे प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं और आनन्द लाभ करते हैं। महर्षि दयानन्द प्रदर्शित दिशा से ये तीनों अर्थ स्पष्ट हैं।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ कविर्भार्गवः। २, ९, १६ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ३ असितः काश्यपो देवलो वा। ४ सुकक्षः। ५ विभ्राट् सौर्यः। ६, ८ वसिष्ठः। ७ भर्गः प्रागाथः १०, १७ विश्वामित्रः। ११ मेधातिथिः काण्वः। १२ शतं वैखानसाः। १३ यजत आत्रेयः॥ १४ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। १५ उशनाः। १८ हर्यत प्रागाथः। १० बृहद्दिव आथर्वणः। २० गृत्समदः॥ देवता—१, ३, १५ पवमानः सोमः। २, ४, ६, ७, १४, १९, २० इन्द्रः। ५ सूर्यः। ८ सरस्वान् सरस्वती। १० सविता। ११ ब्रह्मणस्पतिः। १२, १६, १७ अग्निः। १३ मित्रावरुणौ। १८ अग्निर्हवींषि वा॥ छन्दः—१, ३,४, ८, १०–१४, १७, १८। २ बृहती चरमस्य, अनुष्टुप शेषः। ५ जगती। ६, ७ प्रागाथम्। १५, १९ त्रिष्टुप्। १६ वर्धमाना पूर्वस्य, गायत्री उत्तरयोः। १० अष्टिः पूर्वस्य, अतिशक्वरी उत्तरयोः॥ स्वरः—१, ३, ४, ८, ९, १०-१४, १६-१८ षड्जः। २ मध्यमः, चरमस्य गान्धारः। ५ निषादः। ६, ७ मध्यमः। १५, १९ धैवतः। २० मध्यमः पूर्वस्य, पञ्चम उत्तरयोः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ हर्यो रथयोगो वर्ण्यते।

    पदार्थः

    प्रथमः—प्राणापानपरः। विद्वांसो योगिनो जनाः (अस्य) इन्द्रस्य जीवात्मनः (रथे) देहरूपे (काम्या) काम्यौ कामयितव्यौ, (विपक्षसा) विपक्षसौ प्राणनापाननक्रियारूपविशिष्टपक्षौ, (शोणा) शोणौ गतिशीलौ। [शोणृ वर्णगत्योः भ्वादिः।] (धृष्णू) प्रगल्भौ, (नृवाहसा) नृवाहसौ नृणां मानवदेहानां वोढारौ (हरी) प्राणापानरूपौ अश्वौ (युञ्जन्ति) प्राणायामविधिना उपयुञ्जते ॥ द्वितीयः—शिल्पपरः। शिल्पिनो जनाः (अस्य) इन्द्रस्य सूर्यस्य विद्युदग्नेर्वा (काम्या) कामयितव्यौ, (विपक्षसा) परस्परविरुद्धगुणौ, (शोणा) गतिशीलौ, (धृष्णू) धर्षणशीलौ (नृवाहसा) मनुष्याणां वाहकौ स्थानान्तरप्रापकौ (हरी) ऋणात्मकधनात्मकविद्युद्रूपौ अश्वौ (युञ्जन्ति) भूजलान्तरिक्षयानेषु प्रयुञ्जते ॥२॥२

    भावार्थः

    यथा प्राणायामाभ्यासिनो विद्वांसो जनाः प्राणापानरूपौ हरी नियुज्य देहयज्ञं निर्वहन्ति तथैव शिल्पिनो जना ऋणात्मकधनात्मकविद्युतौ यानादिषु गृहादिषु च नियुज्य यात्रां प्रकाशं च कुर्युः ॥२॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The learned Yogis, who through Yogic Samadhi (deep meditation) attain to God, Who pervades all moving and stationary objects, and is the Friend of all, shine in their full splendour in their state of emancipation.

    Translator Comment

    This verse has been translated in Various ways by different commentators. Another plausible rendering of the verse given below : The artisans who properly use the Sun, fire and air, attain to supremacy and derive happiness. Maharishi Dayanand has interpreted the verse in three ways, in his commentary on the Rigveda 1-6-1 .

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    Meaning

    Pious souls in meditation commune with the great and gracious lord of existence immanent in the steady universe and transcendent beyond. Brilliant are they with the lord of light and they shine in the heaven of bliss. (Rg. 1-6-1)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अरुषम्) આરોચન-સમગ્રરૂપથી પ્રકાશમાન (परिचरन्तम्) પરિપ્રાપ્ત-વ્યાપક (ब्रध्नम्) મહાન પરમાત્માને (तस्थुषः) ઉપાસકજન (युञ्जन्ति) યુક્ત થાય છે-તેની સાથે યોગને પ્રાપ્ત થાય છે, પુનઃ તે યોગી ઉપાસક (दिवि रोचना रोचन्ते) પ્રકાશાત્મક મોક્ષધામમાં અધ્યાત્મજ્ઞાન-પ્રકાશયુક્ત થઈને શોભાયમાન બને છે. (૧)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    १) जसे प्राणायामचा अभ्यास करणारे विद्वान लोक प्राण-अपानरूपी घोड्यांना नियुक्त करून शरीर रथ चालवितात, तसेच शिल्पी लोक ऋण व धन विद्युतला यान इत्यादी व घर इत्यादीमध्ये वापरून यात्रा व प्रकाश करावा. ॥१॥
    २) जसा योग्यांना आपल्या आत्म्यात परमेश्वराच्या योगाने परमात्म्याचा प्रकाश प्राप्त होतो व शरीराच्या अवयवात प्राणाच्या योगाने प्राणसिद्धी होते, तसेच सूर्य किरणांच्या योगाने आपल्या सौरमंडलाच्या सर्व ग्रह-उपग्रहांना भौतिक प्रकाश मिळतो व शिल्पीं (कारागीर) ना यान इत्यादीमध्ये अग्नी, वायू, विद्युत, सूर्याच्या योगाने यश प्राप्त होते. ॥१॥

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