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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1529
    ऋषिः - केतुराग्नेयः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    42

    आ꣡ग्ने꣢ स्थू꣣र꣢ꣳ र꣣यिं꣡ भ꣢र पृ꣣थुं꣡ गोम꣢꣯न्तम꣣श्वि꣡न꣢म् । अ꣣ङ्धि꣢꣫ खं व꣣र्त꣡या꣢ प꣣वि꣢म् ॥१५२९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । अ꣣ग्ने । स्थूर꣢म् । र꣣यि꣢म् । भ꣣र । पृथु꣢म् । गो꣡म꣢꣯न्तम् । अ꣣श्वि꣡न꣢म् । अ꣣ङ्धि꣢ । खम् । व꣣र्त꣡य꣢ । प꣣वि꣢म् ॥१५२९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आग्ने स्थूरꣳ रयिं भर पृथुं गोमन्तमश्विनम् । अङ्धि खं वर्तया पविम् ॥१५२९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आ । अग्ने । स्थूरम् । रयिम् । भर । पृथुम् । गोमन्तम् । अश्विनम् । अङ्धि । खम् । वर्तय । पविम् ॥१५२९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1529
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आगे पुनः परमेश्वर और राजा से प्रार्थना है।

    पदार्थ

    हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजन् ! आप (गोमन्तम्) अन्तःप्रकाश से युक्त अथवा धेनु, पृथिवी आदि से युक्त, (अश्विनम्) प्राण-सम्पदा से युक्त अथवा श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त, (पृथुम्) अति विशाल, (स्थूरम्) अति स्थिर, (रयिम्) ऐश्वर्य (आभर) प्रदान करो। (खम्) ह्रदयाकाश को वा राष्ट्र के आकाश को (अङ्धि) तामसिकता हटाकर निर्मल कर दो। अन्तःशत्रुओं बाह्य शत्रुओं के विध्वंस के लिए (पविम्) पवित्रता का वा शस्त्रास्त्रों का (वर्तय) प्रयोग करो ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे जगदीश्वर आन्तरिक विघ्नों वा शत्रुओं को विनष्ट करके अन्तरात्मा को पवित्र करता है, वैसे ही राष्ट्र का राजा बाह्य उपद्रवकारियों को नष्ट करके राष्ट्र को निष्कण्टक करे ॥३॥

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    पदार्थ

    (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन्! तू (स्थूरम्) स्थिर या समाश्रितमात्र६ सब मात्राओं वाले—पूर्ण (पृथुम्) प्रयत्नशील उपकार में आने वाले (गोमन्तम्) इन्द्रियों का हित जिसमें हो तथा (अश्विनम्) व्यापन मन की मननशीलता जिसमें हो, ऐसे (रयिम्) आध्यात्मिक धन को (आभर) मेरे अन्दर आभरित कर (त्वम्-अङ्गधि) तू मेरे हृदयावकाश को अपने स्वरूप से पूरित कर (पविंवर्तय) मेरी स्तुतिवाणी को७ वर्तित—प्रतिवर्तित—प्रतिफलित कर या अपने आनन्दरथ की चक्रनेमि को मेरी ओर घुमा दे॥३॥

    विशेष

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    विषय

    पवित्र हृदय में ज्ञान का प्रकाश

    पदार्थ

    (अग्ने) = हे मार्ग-दर्शक प्रभो ! ऐसे (रयिम्) = धन को (आभर) = हममें सर्वथा भरिए जो १. (स्थूरम्) = स्थिर है [ऋ० ६.१९.१० द०] चञ्चल नहीं । सामान्यतः धन की अस्थिरता प्रसिद्ध है। हमें वह धन प्राप्त कराइए जो हममें स्थिर निवास करे। यास्क के शब्दों में 'समाश्रितमात्रो महान् भवति' [नि० ६.२२], जो आश्रय किया हुआ सदा बढ़ता है । २. (प्रथुम्) = विस्तृत है [प्रथ विस्तारे] । यदि यह धन केवल मेरा ही पोषण करता है तब तो यह अत्यन्त संकुचित होगा। हमें वह धन प्राप्त कराइए जो विस्तृत हो—जो बहुतों का पोषण करनेवाला हो। मेरे द्वारा यज्ञों में विनियुक्त होकर 'रोदसी'=द्यावापृथिवी, अर्थात् सभी प्राणियों का पालक हो। ३. (गोमन्तम् अश्विनम्) = उत्तम गौवों व घोड़ोंवाला हो— इस धन के द्वारा मैं घर में गौवों व घोड़ों के रखने की व्यवस्था करूँ । गौवें सात्त्विक दूध के द्वारा हमारे ज्ञान की वृद्धि का कारण बनें तथा घोड़े सवारी [riding] के काम में आकर उचित व्यायाम द्वारा हमारी शक्ति का पोषण करें। यह वस्तुतः दौर्भाग्य है कि धनी घरों में गौवों का स्थान कुत्तों को मिल गया है और घोड़ों का स्थान मोटरों [कारों] को, परिणामत: हमारे ज्ञान व शक्तियों का ह्रास होता जाता है। 'गो' शब्द ज्ञानेन्द्रियों का तथा 'अश्व' कर्मेन्द्रियों का भी वाचक है, अतः यह अर्थ भी ठीक है कि यह धन हमारी ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों को उत्तम बनानेवाला हो ।

    केतु प्रार्थना करता है कि – हे प्रभो ! (खम्) = हमारे हृदयाकाश को आप (अधि) = अलंकृत व परिष्कृत करें और (पविम्) = पवित्र करनेवाली वेदवाणी को [पविं=वाचम्-नि०] (वर्तया) = हममें प्रवृत्त करें ।

    भावार्थ

    हम स्थिर, विस्तृत, उत्तम ज्ञान व कर्मयुक्त धन को प्राप्त करें । हमारे हृदय निर्मल हों, हमारी वाणी सदा वेद-मन्त्रों का, ज्ञान की बातों का – उच्चारण करें।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे (अग्ने) ज्ञानवन् ! तू हमारे पास (पृथु) खूब विस्तृत (गोमन्तं) गौओं और (अश्विनं) अश्वों से युक्त तथा ज्ञान और कर्मेन्द्रिय से सम्पन्न (स्थूरं) स्थिर (रयिं) प्राण और धन को (आभर) प्राप्त करा। (खं*) सुख को (अंग्धि) हमारे लिये प्रकाशित कर और (पविम्*) पापनाशक पावकरूप यज्ञ, ज्ञानवज्र या ज्ञानप्रवर्तक वाणी को (वर्त्तय) उपदेश कर, उसका प्रयोग कर।

    टिप्पणी

    *‘खं’—यदेव खं तदेव कं यदेव कं तदेव खम्, छान्दोग्य उप० पविरिति वाग्वज्रयज्ञादिनामसु पठितः। ‘खं वित्तया पणिम्’ इति ऋ०। *‘संवर्त्तया’ इति अजमेरमुद्रितः प्रामादिकः पाठः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१,९ प्रियमेधः। २ नृमेधपुरुमेधौ। ३, ७ त्र्यरुणत्रसदस्यू। ४ शुनःशेप आजीगर्तिः। ५ वत्सः काण्वः। ६ अग्निस्तापसः। ८ विश्वमना वैयश्वः। १० वसिष्ठः। सोभरिः काण्वः। १२ शतं वैखानसाः। १३ वसूयव आत्रेयाः। १४ गोतमो राहूगणः। १५ केतुराग्नेयः। १६ विरूप आंगिरसः॥ देवता—१, २, ५, ८ इन्द्रः। ३, ७ पवमानः सोमः। ४, १०—१६ अग्निः। ६ विश्वेदेवाः। ९ समेति॥ छन्दः—१, ४, ५, १२—१६ गायत्री। २, १० प्रागाथं। ३, ७, ११ बृहती। ६ अनुष्टुप् ८ उष्णिक् ९ निचिदुष्णिक्॥ स्वरः—१, ४, ५, १२—१६ षड्जः। २, ३, ७, १०, ११ मध्यमः। ६ गान्धारः। ८, ९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनरपि परमेश्वरो नृपतिश्च प्रार्थ्येते।

    पदार्थः

    हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर राजन् वा ! त्वम् (गोमन्तम्) अन्तःप्रकाशयुक्तं धेनुपृथिव्यादियुक्तं वा, (अश्विनम्) प्राणसम्पद्युक्तं प्रशस्ततुरङ्गमयुक्तं वा, (पृथुम्) सुविशालम्, (स्थूरम्) सुस्थिरम् (रयिम्) ऐश्वर्यम् (आभर) आहर। (खम्) हृदयाकाशं राष्ट्राकाशं वा (अङ्धि) तामसिकतामपसार्य निर्मलं कुरु। अन्तःशत्रूणां बाह्यशत्रूणां वा विध्वंसनाय (पविम्) पवित्रभावं वज्रायुधं वा (वर्तय) प्रयुङ्क्ष्व ॥३॥

    भावार्थः

    यथा जगदीश्वरः सर्वानान्तरान् विघ्नान् शत्रूंश्च विनाश्यान्तरात्मानं पवित्रं करोति तथैव राष्ट्रस्य राजा बाह्यानुपद्रवकारिणो हत्वा राष्ट्रं निष्कण्टकं कुर्यात् ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, bring us secure, vast wealth in horses and in kine; send us happiness, use for us the sin-killing weapon of knowledge!

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    Meaning

    O light and fire of life, bring us solid, vast and lasting wealth rich in lands, cows and culture, horses, transport and achievement, fill the firmament with profuse rain and vapour, and turn poverty and indigence into plenty and generosity. (Rg. 10-156-3)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अग्ने) હે અગ્રણાયક પરમાત્મન્ ! તું (स्थूरम्) સ્થિર અથવા સમાશ્રિતમાત્ર-સર્વ માત્રાઓવાળાપૂર્ણ (पृथुम्) પ્રયત્નશીલ ઉપકારમાં આવનારા (गोमन्तम्) જેમાં ઇન્દ્રિયોનું હિત હોય તથા (अश्विनम्) જેમાં મનનશીલતા હોય, એવા (रयिम्) એવા આધ્યાત્મિક ધનને (आभर) મારી અંદર સારી રીતે ભરી દે. (त्वम् अङ्गधि) તું મારા હૃદયાવકાશને પોતાનાં સ્વરૂપથી પૂરિત કર (पविं वर्तय) મારી સ્તુતિ વાણીઓને વર્તિત પરિવર્તિત-પ્રતિફલિત કર અથવા તારા આનંદરથની ચક્રનેમિ-ચક્રના પરિધિને મારી તરફ ઘૂમાવી દે. (૩)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे जगदीश्वर आंतरिक विघ्ने किंवा शत्रूंना नष्ट करून अंतरात्म्याला पवित्र करतो, तसेच राष्ट्राच्या राजाने बाह्य उपद्रवकाऱ्यांना नष्ट करून राष्ट्राला निष्कंटक करावे. ॥३॥

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