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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1698
ऋषिः - मेध्यातिथिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
30
य꣢ उ꣣ग्रः꣡ सन्ननि꣢꣯ष्टृतः स्थि꣣रो꣡ रणा꣢꣯य꣣ स꣡ꣳस्कृ꣢तः । य꣡दि꣢ स्तो꣣तु꣢र्म꣣घ꣡वा꣢ शृ꣣ण꣢व꣣द्ध꣢वं꣣ ने꣡न्द्रो꣢ योष꣣त्या꣡ ग꣢मत् ॥१६९८॥
स्वर सहित पद पाठयः । उ꣣ग्रः꣢ । सन् । अ꣡नि꣢꣯ष्टृतः । अ । नि꣣ष्टृतः । स्थिरः꣢ । र꣡णा꣢꣯य । स꣡ꣳस्कृ꣢꣯तः । सम् । कृ꣣तः । य꣡दि꣢ । स्तो꣣तुः꣢ । म꣣घ꣡वा꣢ । शृ꣣ण꣡व꣢त् । ह꣡व꣢꣯म् । न । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यो꣣षति । आ꣢ । ग꣣मत् ॥१६९८॥
स्वर रहित मन्त्र
य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय सꣳस्कृतः । यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत् ॥१६९८॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । उग्रः । सन् । अनिष्टृतः । अ । निष्टृतः । स्थिरः । रणाय । सꣳस्कृतः । सम् । कृतः । यदि । स्तोतुः । मघवा । शृणवत् । हवम् । न । इन्द्रः । योषति । आ । गमत् ॥१६९८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1698
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 3; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 3; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
आगे फिर वही विषय है।
पदार्थ
(यः) जो इन्द्र जगदीश्वर (उग्रः सन्) अधार्मिकों के लिए प्रचण्ड होता हुआ (अनिष्टृतः) उनसे अहिंसित रहता है और (स्थिरः) अविचल होता हुआ (रणाय) असुरों के साथ युद्ध के लिए (संस्कृतः) सज्जित हो जाता है, वह (मघवा) ऐश्वर्यवान् (इन्द्रः) जगदीश्वर (यदि) यदि (स्तोतुः) उपासक के (हवम्) आह्वान को (शृणवत्) सुन ले, तो (न योषति) उससे अलग न खड़ा रहे, प्रत्युत (आ गमत्) उसके अन्तःकरण में आ जाए ॥३॥
भावार्थ
उपासक के हृदय से निकली हुई पुकार को जगदीश्वर अवश्य सुनता है और दस्युओं के साथ युद्ध में उसे बल देकर उसकी सहायता करता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा, उपास्य-उपासक का सम्बन्ध, आत्मा और मन, इन विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अठारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
पदार्थ
(यः) जो (उग्रा-अनिष्टृतः) तेजस्वी नितान्त किसी प्रकार हिंसित न होने वाला—अविनाशी (स्थिरः) एकरस रहने वाला (सन्) होता हुआ (रणाय संस्कृतः) रमण करने के लिये६ उपासना द्वारा सम्यक् उपासित या साक्षात्कृत है (स्तोतुः-हवम्) स्तुतिकर्ता के प्रार्थनावचन या आमन्त्रण को (यदि-यद्-इ) जब कि (मघवा शृणवत्) ऐश्वर्यवान् परमात्मा सुन ले—सुन लेता है (इन्द्रः-न योषति) परमात्मा उपासक से पृथक् नहीं होता, किन्तु (आगमत्) उपासक को समन्तरूप से प्राप्त रहता है॥३॥
विशेष
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विषय
प्रभु लोकसेवक का साथी है
पदार्थ
(यः) = जो मेधातिथि (उग्रः) = ओजस्वी व उदात्त है- जिसे कायरता छू नहीं गयी, (सन्) = ऐसा होता हुआ यह (अनिष्टृतः) = शत्रुओं से तीर्ण नहीं किया जा सकता, अर्थात् शत्रु इसे दबा नहीं लेते । (स्थिर:) = यह अपने कार्य में स्थिर वृत्तिवाला होता है तथा स्थितप्रज्ञ होने से डाँवाँडोल नहीं होता । यह तो (रणाय) = युद्ध के लिए (संस्कृत:) = पूर्णरूप से तैयारीवाला होता है । आन्तरिक शत्रुओं से तो इसने युद्ध किया ही है, बाहर भी बुराइयों को दूर करने के लिए यदि संघर्ष होता है तो यह घबरा नहीं जाता।
यही व्यक्ति वस्तुतः प्रभु का सच्चा स्तोता है। सर्वभूतहित में लगा हुआ व्यक्ति ही तो प्रभु का भक्ततम है। (यदि) = यदि यह स्तोता संकट में कभी प्रभु को सहायता के लिए पुकारता है तो (मघवा) = सम्पूर्ण ऐश्वर्योवाला प्रभु (स्तोतुः) = इस स्तोता की (हवम्) = पुकार को (शृणवत्) = सुनता है और (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (न योषति) = अलग तमाशबीन की भाँति खड़ा नहीं रहता, अपितु (आगमत्) = इसकी सहायता के लिए आता ही है, अर्थात् प्रभु इन लोकसेवकों के साथी होते हैं और प्रभु के साहाय्य से ये उस उस कार्य को करने में समर्थ हो जाते हैं । वस्तुतः इनका अपना तो कार्य होता ही नहीं—ये तो प्रभु के कार्य को उसके निमित्त [agent] बनकर कर रहे होते हैं।
भावार्थ
हम उदात्त, शत्रुओं से अनाक्रान्त, स्थिर वृत्ति के बनें । संसार संघर्ष को बड़े परिष्कृत प्रकार से चलानेवाले हों, सदा प्रभु के स्मरण से अपने में शक्ति का संचार करनेवाले हों ।
विषय
missing
भावार्थ
(यः) जो आत्मा (उग्रः) वीर्यवान्, शक्तिमान् (अनिस्तृतः) अविनाशी, किसी से न मारा गया, (स्थिरः) कूटस्थ, नित्य (रणाय) सर्वत्र विश्व में और इस देह में रमण करने के लिये (संस्कृतः) संस्कार किया गया, नाना कर्म फलों से, या तपः साधनों से शुद्ध किया गया है। (यदि) जब (मघवा) ज्ञानवान् आत्मा (स्तोतुः) स्तुति करने हारे विद्वान् की (हवे) पुकार को (शृणवत्) सुनलेता है तो (इन्द्रः) वह ऐश्वर्यवान् आत्मा (न योषति) पृथग् नहीं रहता प्रत्युत (आगमत्) उसे प्राप्त हो जाता है। परमात्मा के पक्ष में—(संस्कृतः) नाना गुणों से उपासित होकर जब वह अपने भक्त की पुकार सुनता है तो उसके हृदय में प्रकट होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः। २ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। ३ शुनःशेप आजीगर्तः। ४ शंयुर्बार्हस्पत्यः। ५, १५ मेधातिथिः काण्वः। ६, ९ वसिष्ठः। ७ आयुः काण्वः। ८ अम्बरीष ऋजिश्वा च। १० विश्वमना वैयश्वः। ११ सोभरिः काण्वः। १२ सप्तर्षयः। १३ कलिः प्रागाथः। १५, १७ विश्वामित्रः। १६ निध्रुविः काश्यपः। १८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। १९ एतत्साम॥ देवता—१, २, ४, ६, ७, ९, १०, १३, १५ इन्द्रः। ३, ११, १८ अग्निः। ५ विष्णुः ८, १२, १६ पवमानः सोमः । १४, १७ इन्द्राग्नी। १९ एतत्साम॥ छन्दः–१-५, १४, १६-१८ गायत्री। ६, ७, ९, १३ प्रागथम्। ८ अनुष्टुप्। १० उष्णिक् । ११ प्रागाथं काकुभम्। १२, १५ बृहती। १९ इति साम॥ स्वरः—१-५, १४, १६, १८ षड्जः। ६, ८, ९, ११-१३, १५ मध्यमः। ८ गान्धारः। १० ऋषभः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनस्तमेव विषयमाह।
पदार्थः
(यः) इन्द्रो जगदीश्वरः (उग्रः सन्) अधार्मिकाणां कृते प्रचण्डः सन् (अनिष्टृतः) तैः अनुपहिंसितो भवति। [स्तृतः इत्यत्र स्तृणातिर्हन्तिकर्मा। निघं० २।१९। निपूर्वो निष्टृतः, न निष्टृतः अनिष्टृतः।] अपि च, (स्थिरः) अविचलः सन् (रणाय) असुरैः सह युद्धाय (संस्कृतः) सज्जितो जायते, सः (मघवा) ऐश्वर्यवान्(इन्द्रः) जगदीश्वरः (यदि) चेत् (स्तोतुः) उपासकस्य (हवम्) आह्वानम् (शृणवत्) शृणुयात्, तर्हि (न योषति) पृथक् न तिष्ठेत्।[यु मिश्रणामिश्रणयोः, लेटि सिबागमे अडागमे च तिपि रूपम्।] प्रत्युत (आ गमत्) तस्यान्तःकरणम् उपागच्छेत् ॥३॥
भावार्थः
उपासकस्य हृदयान्निःसृतमाह्वानं जगदीश्वरोऽवश्यं शृणोति, दस्युभिः सह युद्धे च तस्मै बलं दत्त्वा तस्य साहाय्यं करोति ॥३॥ अस्मिन् खण्डे परमात्मो जीवात्मन उपास्योपासकसम्बन्ध- स्याऽऽत्ममनसोश्च विषयाणां वर्णनादेतत्खण्डस्य पूर्वखण्डेन संगतिरस्ति ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
The Almighty Father, Immortal, Invincible, Eternal, is competent to pervade the whole universe. When the Omniscient God listens to His praisers call. He will not stand aloof, but come.
Meaning
Indra who is blazing strong, uncountered and irresistible, constant and unshakable, is ever in perfect harness for the humans battle of existence, and if he hears the call of the celebrant, the lord of might and majesty never forsakes him, he comes, he saves, he blesses. (Rg. 8-33-9)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (यः) જે (उग्रा अनिष्टृतः) તેજસ્વી નિતાંત કોઈ પણ રીતે ન મરનાર-અવિનાશી, (स्थिरः) એકરસ રહેનાર (सन्) થતાં (रणाय संस्कृतः) રમણ કરવા માટે ઉપાસના દ્વારા સમ્યક્ ઉપાસિત અર્થાત્ સાક્ષાત્કૃત છે. (स्तोतुः हवम्) સ્તુતિકર્તાનાં પ્રાર્થનાવચન અથવા આમંત્રણને (यदि यद् इ) જ્યારે કે (मघवा श्रृणुवत्) ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મા સાંભળે છે-સાંભળી લે છે, ત્યારે (इन्द्रः न योषति) પરમાત્મા ઉપાસકથી અલગ રહેતો નથી, પરંતુ (आगमत्) ઉપાસકને સમગ્ર રૂપથી પ્રાપ્ત રહે છે. (૩)
मराठी (1)
भावार्थ
उपासकाच्या हृदयातून आलेली हाक जगदीश्वर अवश्य ऐकतो व दस्यूंबरोबर युद्धात त्याला बल देऊन त्याची साह्यता करतो. ॥३॥
टिप्पणी
या खंडात परमात्मा, जीवात्मा, उपास्य-उपासकाचा संबंध, आत्मा व मन या विषयांचे वर्णन असल्यामुळे या खंडाची पूर्व खंडाबरोबर संगती आहे
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