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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1700
    ऋषिः - निध्रुविः काश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    54

    प꣡व꣢माना दि꣣व꣢꣫स्पर्य꣣न्त꣡रि꣢क्षादसृक्षत । पृ꣣थिव्या꣢꣫ अधि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१७००॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प꣡व꣢꣯मानाः । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षात् । अ꣣सृक्षत । पृथिव्याः꣣ । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡न꣢꣯वि ॥१७००॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत । पृथिव्या अधि सानवि ॥१७००॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पवमानाः । दिवः । परि । अन्तरिक्षात् । असृक्षत । पृथिव्याः । अधि । सानवि ॥१७००॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1700
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में सूर्य-किरणों के उपकार-वर्णन द्वारा भगवान् के उपकारों का वर्णन करते हैं।

    पदार्थ

    परमात्मा से रची हुई (पवमानाः) पवित्र करनेवाली सूर्य-रश्मियाँ(दिवः परि) द्युलोक से और (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से(पृथिव्याः) भूमि के (सानवि अधि) उच्च प्रदेशों पर (असृक्षत) सूर्य-ताप और मेघ-जल को बरसाती हैं ॥२॥

    भावार्थ

    यदि सूर्य न हो तो भूमि पर प्रकाश, ताप, वर्षा, ऋतुओं आदि का निर्माण कुछ भी न हो, सब जगह घोर अँधेरा व्यापा रहे। ऐसा अद्भुत सूर्य परमात्मा ने ही रचा है, इसलिए उसी की वह महिमा है ॥२॥

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    पदार्थ

    (पवमानाः) आनन्दधारा में प्राप्त होने वाला परमात्मा (दिवः-अन्तरिक्षात् परि) द्युलोक में अन्तरिक्षलोक में१ (पृथिव्याः-अधिसानवि) पृथिवीलोक में वर्तमान इनके सम्भजन स्थान—उपासनास्थान—आत्मा के उपकरण मूर्धा२ हृदय३ और शरीर४ में कर्मेन्द्रियगण में (असृक्षत) उपासना द्वारा पहुँचता है जिससे क्रमशः सद्विचार सद्भाव सदाचार प्रवाहित होता रहता है॥२॥

    विशेष

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    विषय

    शिखर पर, त्रिलोकी का सजाना

    पदार्थ

    (पवमाना:) = पवित्र करनेवाले सोम (दिव:) = द्युलोक के हेतु से (अन्तरिक्षात्) = अन्तरिक्ष के हेतु से  और (पृथिव्याः) = पृथिवी के हेतु से (परि असृक्षत) = इस शरीर में चारों और निर्मित हुए हैं । जब यह सोम शरीर में सारे रुधिर में व्याप्त हो जाता है, तब वह धुलोक, अन्तरिक्ष व पृथिवी को सुन्दर बनानेवाला होता है, द्युलोक, अर्थात् मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाता है, अन्तरिक्ष, अर्थात् हृदय को निर्मल बनाता है और पृथिवी, अर्थात् शरीर को दृढ़ बनाता है।

    क्या शरीर, क्या मन और क्या मस्तिष्क सभी दृष्टिकोणों से यह उसे (अधि सानवि) = शिखर पर पहुँचानेवाला होता है । यह सोम द्युलोक को उग्र तेजस्वी बनाता है, अर्थात् मस्तिष्क को दीप्त करता है, पृथिवी, अर्थात् शरीर को दृढ़ बनाता है और अन्तरिक्षरूपी हृदय में उचित राग का निर्माण करता है।

    भावार्थ

    सोम हमारी त्रिलोकी को सुभूषित करता है ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    (पवमानाः) शुद्ध पवित्र, या गति करने हारे, या ज्ञानवान्-पुरुष (दिवस्परि) द्यौ अर्थात् प्रकाशमान् लोकों में (अन्तरिक्षात्) ओर अन्तरिक्ष में और (पृथिव्याः) पृथिवी के (अधि सानवि) उच्च पर्वत भागों में (असृक्षत) तप और विद्या का सम्पादन करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः। २ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। ३ शुनःशेप आजीगर्तः। ४ शंयुर्बार्हस्पत्यः। ५, १५ मेधातिथिः काण्वः। ६, ९ वसिष्ठः। ७ आयुः काण्वः। ८ अम्बरीष ऋजिश्वा च। १० विश्वमना वैयश्वः। ११ सोभरिः काण्वः। १२ सप्तर्षयः। १३ कलिः प्रागाथः। १५, १७ विश्वामित्रः। १६ निध्रुविः काश्यपः। १८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। १९ एतत्साम॥ देवता—१, २, ४, ६, ७, ९, १०, १३, १५ इन्द्रः। ३, ११, १८ अग्निः। ५ विष्णुः ८, १२, १६ पवमानः सोमः । १४, १७ इन्द्राग्नी। १९ एतत्साम॥ छन्दः–१-५, १४, १६-१८ गायत्री। ६, ७, ९, १३ प्रागथम्। ८ अनुष्टुप्। १० उष्णिक् । ११ प्रागाथं काकुभम्। १२, १५ बृहती। १९ इति साम॥ स्वरः—१-५, १४, १६, १८ षड्जः। ६, ८, ९, ११-१३, १५ मध्यमः। ८ गान्धारः। १० ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ सूर्यकिरणानामुपकारवर्णनमुखेन भगवदुपकारा वर्ण्यन्ते।

    पदार्थः

    परमात्मना सृष्टाः (पवमानाः) पवित्रतासम्पादकाः सूर्यरश्मयः (दिवः परि) द्युलोकात् (अन्तरिक्षात्) मध्यलोकाच्च (पृथिव्याः) भूमेः (सानवि अधि) सानुप्रदेशे(असृक्षत) सूर्यतापं मेघजलं च वर्षन्ति ॥२॥

    भावार्थः

    यदि सूर्यो न भवेत् तर्हि भूमौ प्रकाशस्तापो वृष्टिर्ऋत्वादिनिर्माणं किमपि न भवेत्, सर्वत्र घोरं तमो व्याप्नुयात्। एतादृशोऽद्भुतः सूर्यः परमात्मनैव रचित इति तस्यैव स महिमा ॥२॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The pure, active, learned persons diffuse knowledge on the elevated places of earth, in the atmosphere and luminous planets.

    Translator Comment

    See verse 575.

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    Meaning

    Pure and purifying Somas, evolutionary powers of nature, divinity and humanity, creative, protective and defensive, are created from the regions of light above, the middle regions and the earth and, on top of the course of evolution and progress, they remain ever active for life in the service of divinity. (Rg. 9-63-27)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (पवमानाः) આનંદધારામાં પ્રાપ્ત થનાર પરમાત્મા (दिवः अन्तरिक्षात् परि) દ્યુલોકમાં અન્તરિક્ષલોકમાં (पृथिव्याः अधिसानवि) પૃથિવીલોકમાં રહેલાં તે સંભજન સ્થાન-ઉપાસના સ્થાન આત્માના ઉપકરણ-સાધન મૂર્ધા, હૃદય અને શરીરમાં કર્મેન્દ્રિયગણમાં (असृक्षत) ઉપાસના દ્વારા પહોંચે છે, જેથી ક્રમશઃ-સદ્વિચાર, સદ્ભાવ અને સદાચાર પ્રવાહિત થતાં રહે છે. (૨)

     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जर सूर्य नसता तर भूमीवर प्रकाश, ताप, वर्षा, ऋतू इत्यादीची निर्मिती झाली नसती. सर्वत्र घोर अंधकार पसरला असता. असा अद्भुत सूर्य परमेश्वरानेच निर्माण केलेला आहे, त्यासाठी त्याचाच तो महिमा आहे. ॥२॥

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