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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1722
ऋषिः - देवातिथिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
33
म꣡न्द꣢न्तु त्वा मघवन्नि꣣न्द्रे꣡न्द꣢वो राधो꣣दे꣡या꣢य सुन्व꣣ते꣢ । आ꣣मु꣢ष्या꣣ सो꣡म꣢मपिबश्च꣣मू꣢ सु꣣तं꣢꣫ ज्येष्ठं꣣ त꣡द्द꣢धिषे꣣ स꣡हः꣢ ॥१७२२॥
स्वर सहित पद पाठम꣡न्द꣢꣯न्तु । त्वा꣣ । मघवन् । इन्द्र । इ꣡न्द꣢꣯वः । रा꣣धोदे꣡या꣢य । रा꣣धः । दे꣡या꣢꣯य । सु꣣न्वते꣢ । आ꣣मु꣡ष्य꣢ । आ꣣ । मु꣡ष्य꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯म् । अ꣡पिबः । चमू꣡इति꣢ । सु꣣त꣢म् । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯म् । तत् । द꣣धिषे । स꣡हः꣢꣯ ॥१७२२॥
स्वर रहित मन्त्र
मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रेन्दवो राधोदेयाय सुन्वते । आमुष्या सोममपिबश्चमू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः ॥१७२२॥
स्वर रहित पद पाठ
मन्दन्तु । त्वा । मघवन् । इन्द्र । इन्दवः । राधोदेयाय । राधः । देयाय । सुन्वते । आमुष्य । आ । मुष्य । सोमम् । अपिबः । चमूइति । सुतम् । ज्येष्ठम् । तत् । दधिषे । सहः ॥१७२२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1722
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 1; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में जगदीश्वर को सम्बोधन है।
पदार्थ
हे (मघवन्) ऐश्वर्यशाली (इन्द्र) जगत्पति परमेश्वर ! (इन्दवः) भक्तिरस (सुन्वते) भक्त को (राधोदेयाय) ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए (त्वा) आपको (मन्दन्तु) प्रसन्न करें। आप (चमू) आत्मा और मनरूप कटोरों में (सुतम्) अभिषुत किये हुए (सोमम्) भक्तिरस को (आमुष्य) उत्सुकता से हर कर (अपिबः) पीते हो, (तत्) उसके बदले में (जयेष्ठम्) अतिशय प्रशस्य और वृद्ध (सहः) बल को (दधिषे) उपासक में रख देते हो ॥२॥
भावार्थ
भक्तिरस से तृप्त परमेश्वर भक्त को पुरुषार्थ और दिव्य शक्ति प्रदान करता है ॥२॥
पदार्थ
(मघवन्-इन्द्र) हे अध्यात्मयज्ञ के आधार परमात्मन्! (त्वा) तुझे (इन्दवः-मदन्तु) आर्द्रभावनापूर्ण उपासनारस हर्षित करे (राधः-देयाय सुन्वते) राधनीय—साधनीय मोक्ष देय दातव्य जिससे है अतः उपासनारस निष्पादन करते हुए उपासक के लिये (आमुष्य सोमम्-अपिबः) सामने आ—साक्षात् होकर१ उपासनारस को पान कर—स्वीकार कर—करता है पर निश्चय है, और (चमू सुतम्) चमनी—आचमनी२ वाक्—वाणी के अन्दर निष्पन्न किया है उसे स्वीकार कर (तत्-ज्येष्ठे सहः-दधिषे) मुझ उपासक के अन्दर उस अपने श्रेष्ठ साहस को३ धारण कराता है॥२॥
विशेष
<br>
विषय
उस ज्येष्ठ बल का धारण
पदार्थ
हे (मघवन्) = ज्ञानैश्वर्य सम्पन्न देवातिथे ! हे (इन्द्र) = शक्ति के सर्वकार्यों को करनेवाले शचीपते इन्द्र ! (त्वा) = तुझे (इन्दवः) = ये सोमकण (मन्दन्तु)- आनन्दयुक्त करें। ये सोमकण (सुन्वते) = अपना अभिषव करनेवाले के लिए (राधो-देयाय) = सफलता देनेवाले होते हैं, अर्थात् जो भी व्यक्ति उत्तम भोजन द्वारा अपने में इन सात्त्विक सोमकणों का सम्पादन करता है, वह संसार में राधस्= सफलता प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति जिस भी कार्य को प्रारम्भ करता है उसमें उसे सफलता प्राप्त होती है । 'मघवन्' और ‘इन्द्र' ये सम्बोधन यह संकेत करते हैं कि यह व्यक्ति ज्ञानैश्वर्य-सम्पन्न बनता है और शक्तिसम्पन्न कार्यों का करनेवाला होता है । ज्ञान और शक्ति ये सोम के परिणाम हैं तथा ज्ञान और शक्ति मिलकर प्रत्येक कार्य में सफलता देते ही हैं। (अमुष्य) = उस प्रभु के (चमूसुतम्) = शरीर व मस्तिष्क के विकास के लिए उत्पन्न किये गये इस (सोमम्) = सोम को हे देवातिथे ! तू (आ अपिब:) = समन्तात् इस शरीर में पी ले—व्याप्त कर ले। इसका परिणाम यह होगा कि (तत्) = तब तू (ज्येष्ठं सहः) = सर्वोत्कृष्ट सहोनामक बल को (दधिषे) = धारण करनेवाला होगा। सोमपान करनेवाला व्यक्ति दीप्त मस्तिष्क का होता है—उसका शरीर सबल बनता है और उसमें एक अद्भुत सहनशक्ति होती है। सोमपान के अभाव में ज्ञानाग्नि को ईंधन न मिलने से वह मन्द हो जाती है। शरीर में शक्ति=vitality की कमी से रोग होकर, शरीर निर्बल हो जाता है तथा मन सहनशक्तिशून्य होकर चिड़चिड़ा-सा हो जाता है। ऐसा व्यक्ति प्रभु का क्या अतिथि बन सकता है ? देवातिथि को तो उज्ज्वल मस्तिष्क, सबल शरीर व शान्त-मनस्क बनना है ।
भावार्थ
हम सोमपान द्वारा सर्वोत्कृष्ट बल को धारण करें।
विषय
missing
भावार्थ
हे (मघवन्) ज्ञानवान् आत्मन् ! हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! (इन्दवः) ये सोमरस ज्ञान और आनन्ददायक समाधि के विशेष अनुभव (त्वा) तुझको (मन्दन्तु) हर्षित करें। (सुन्वते) ज्ञानरस को उत्पन्न करने हारे साधक विद्वान् योगी के (राधः) सिद्धि (देयाय) प्राप्त कराने के लिये (चमूसुतं) प्राण और अपान रूप चमू दोनों से उत्पन्न किये गये (सोमम्) सोम अर्थात् आनन्दरस को (अमुष्य) गुप्तरूप से प्राप्त करके स्वयं (सोमम्) ब्रह्मानन्द को (अपिवः) पान करता है और तू (तत्) उस अलौकिक (ज्येष्ठं) सबसे महान् (सहः) सह, स्वरूप, सर्वशक्तिमान् ईश्वर को अपने भीतर (दधिषे) धारण करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः–१ विरूप आंङ्गिरसः। २, १८ अवत्सारः। ३ विश्वामित्रः। ४ देवातिथिः काण्वः। ५, ८, ९, १६ गोतमो राहूगणः। ६ वामदेवः। ७ प्रस्कण्वः काण्वः। १० वसुश्रुत आत्रेयः। ११ सत्यश्रवा आत्रेयः। १२ अवस्युरात्रेयः। १३ बुधगविष्ठिरावात्रेयौ। १४ कुत्स आङ्गिरसः। १५ अत्रिः। १७ दीर्घतमा औचथ्पः। देवता—१, १०, १३ अग्निः। २, १८ पवमानः सोमः। ३-५ इन्द्रः। ६, ८, ११, १४, १६ उषाः। ७, ९, १२, १५, १७ अश्विनौ॥ छन्दः—१, २, ६, ७, १८ गायत्री। ३, ५ बृहती। ४ प्रागाथम्। ८,९ उष्णिक्। १०-१२ पङ्क्तिः। १३-१५ त्रिष्टुप्। १६, १७ जगती॥ स्वरः—१, २, ७, १८ षड्जः। ३, ४, ५ मध्यमः। ८,९ ऋषभः। १०-१२ पञ्चमः। १३-१५ धैवतः। १६, १७ निषादः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ जगदीश्वरः सम्बोध्यते।
पदार्थः
हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् (इन्द्र) जगत्पते परमेश्वर ! (इन्दवः) भक्तिरसाः (सुन्वते) भक्ताय उपासकाय (राधोदेयाय) ऐश्वर्यप्रदानाय (त्वा) त्वाम् (मन्दन्तु) प्रसादयन्तु। त्वम् (चमू) चम्वोः आत्ममनसोः (सुतम्) अभिषुतम् (सोमम्) भक्तिरसम् (आमुष्य) औत्सुक्येन हृत्वा (अपिबः) पिबसि, (तत्) ततश्च विनिमयरूपेण (ज्येष्ठम्) प्रशस्यतमं वृद्धतमं वा (सहः) बलम्, (दधिषे) उपासके दधासि ॥२॥
भावार्थः
भक्तिरसेन तृप्तः परमेश्वरो भक्ताय पुरुषार्थं दिव्यां शक्तिं च प्रयच्छति ॥२॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O wise and glorious soul, may the experiences of knowledge and deep concentration (Samadhi) gladden thee. In order to make a Yogi acquire supernatural power, having silently obtained the joy born through the control of Prana and Apana, thou enjoyest God’s bliss. Thou preservest within thee, the Supernatural, Great, Almighty Father!
Meaning
Indra, lord of power and glory, may these soma drinks exhilarate you for the bestowal of wealth and honour upon the dedicated lover of the soma of honour and enlightenment. Having won over the soma of victory prize in the contests of competing parties, you drank of the soma of ecstasy of the highest order and for that reason you command the courage and confidence of the victor. (Rg. 8-4-4)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (मघवन् इन्द्र) હે અધ્યાત્મયજ્ઞના આધાર પરમાત્મન્ ! (त्वा) તને (इन्दवः मदन्तु) આર્દ્ર ભાવનાપૂર્ણ ઉપાસનારસ હર્ષિત કરે. (राधः देवाय सुन्वते) રાધનીય-સાધનીય મોક્ષ આપવા યોગ્ય દાતવ્ય જેમાં છે, તેથી ઉપાસનારસ નિષ્પાદન કરતાં ઉપાસકને માટે (आमुष्य सोमम् अपिवः) સામે આવ-સાક્ષાત્ થઈને ઉપાસનારસનું પાન કર-સ્વીકાર કર-કરે છે. તે નિશ્ચય છે; અને (चमू सुतम्) ચમની-આચમની વાક્-વાણીની અંદર નિષ્પન્ન કરેલ છે તેનો સ્વીકાર કર. (तत् ज्येष्ठे सहः दधिषे) મારામાં-ઉપાસકમાં તે પોતાનું શ્રેષ્ઠ સાહસ ધારણ કરાવે છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
भक्तिरसाने तृप्त परमेश्वर भक्ताला पुरुषार्थ व दिव्य शक्ती प्रदान करतो. ॥२॥
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