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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 177
    ऋषिः - दध्यङ्ङाथर्वणः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    29

    दो꣣षो꣡ आगा꣢꣯द्बृ꣣ह꣡द्गा꣢य꣣ द्यु꣡म꣢द्गामन्नाथर्वण । स्तु꣣हि꣢ दे꣣व꣡ꣳ स꣢वि꣣ता꣡र꣢म् ॥१७७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दो꣣षा꣢ । उ꣣ । आ꣣ । अ꣣गात् । बृह꣢त् । गा꣣य । द्यु꣡म꣢꣯द्गामन् । द्यु꣡म꣢꣯त् । गा꣣मन् । आथर्वण । स्तुहि꣢ । दे꣣वम् । स꣣वि꣡ता꣢रम् ॥१७७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दोषो आगाद्बृहद्गाय द्युमद्गामन्नाथर्वण । स्तुहि देवꣳ सवितारम् ॥१७७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    दोषा । उ । आ । अगात् । बृहत् । गाय । द्युमद्गामन् । द्युमत् । गामन् । आथर्वण । स्तुहि । देवम् । सवितारम् ॥१७७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 177
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 3
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 7;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में मनुष्य को परमात्मा और राजा की स्तुति के लिए प्रेरणा की गयी है।

    पदार्थ

    हे (द्युमद्गामन्) विद्यादिसद्गुणों से प्रकाशित आचरणवाले (आथर्वण) अचंचल वृत्तिवाले अतिशय स्थितप्रज्ञ विद्वन् ! देख, (दोषा उ) अज्ञान, मोह, दुर्व्यसन, दुराचार आदि की अँधियारी रात (अगात्) आ गयी है, इसलिए तू (बृहत्) बहुत अधिक (गाय) गान कर अर्थात् सदुपदेश, शुभ शिक्षा आदि के द्वारा धर्मवाणी को फैला, (देवम्) प्रकाशमय और प्रकाशक (सवितारम्) सद्विद्या आदि के प्रेरक इन्द्र प्रभु की (अर्च) अर्चना कर, अथवा (सवितारम्) सद्विद्या आदि के प्रेरक इन्द्र राजा को (अर्च) उद्बोधन दे । इस ऋचा का देवता इन्द्र होने से ‘सविता’ यहाँ इन्द्र का ही विशेषण जानना चाहिए ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे गगन में उदित हुआ सूर्य अपनी किरणों से घनघोर अन्धकारवाली रात्रि को हटाकर सर्वत्र प्रकाश फैला देता है, वैसे ही मनुष्यों के हृदयों में प्रकट हुआ परमात्मा और राष्ट्र में राजा के पद पर अभिषिक्त हुआ वीर मनुष्य सर्वत्र व्याप्त अधर्म, अज्ञान, दुश्चरित्रता, दुराचार आदि की काली रात को विदीर्ण कर धर्म, विद्या, सच्चरित्रता आदि के उज्ज्वल प्रकाश को चारों ओर फैला देता है। अतः विद्वानों को चाहिए कि वे उस परमात्मा और राजा की उनके गुणों के वर्णन द्वारा पुनः पुनः स्तुति करें ॥३॥

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    पदार्थ

    (द्युमद्गामन्) हे द्युतिमान् परमात्मा को प्राप्त करने वाले ज्ञानी उपासक! “द्युमन्तं गच्छतीति ‘द्युमत्’ उपपदपूर्वकाद् गाधातोर्मनिन् प्रत्ययः” “आतो मनिन्०” [अष्टा॰ २.२.७४] (आथर्वण) अत्यन्त स्थिर मन वाले (बृहद्गाय) बहुत गुणगायक मुमुक्षु जन। (दोषा-उ-आगात्) अरे रात्रि आ रही है—आने वाली है, अतः उससे पूर्व-पूर्व (सवितारं देवं स्तुहि) उत्पादक प्रेरक सुखैश्वर्यप्रद परमात्मा की स्तुति कर।

    भावार्थ

    प्रकाशमान परमात्मा को प्राप्त करने वाले स्थिरमना गुणगायक मुमुक्षु जन! रात्रि में सायं समय तथा जीवन की निशा से पूर्व ही युवावस्था में उत्पादक प्रेरक विविध भोग और आनन्द के दाता परमात्मा की स्तुति निरन्तर किया कर॥३॥

    विशेष

    ऋषिः—दध्यङ्ङाथर्वणः (‘दधि-ध्यानमञ्चति प्राप्नोति दध्यङ्’-ध्यानशील अथर्वा ‘स्थिरमनाःसोऽति-शयितः’ मन की स्थिरता करने में कुशल)॥<br>

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    विषय

    प्रकाश में, दृढ़ता से

    पदार्थ

    मन्त्रश्रुत बातों पर हम आचरण करते रहें? इसके लिए आवश्यक है कि हम सदा सावधान रहें। (भूत्यै जागरणम्) = यह वेदवचन स्पष्ट कर रहा है कि 'विभूतिमय जीवन के लिए जागना आवश्यक है।' (अभूत्यै स्वप्नम्) = सोये और विभूति से पृथक् हुए । मन्त्र में कहा है कि (दोषा उ आगात्) = अब रात्रि आ गई । (बृहद् गाय) = उस प्रभु का खूब ही गायन करो । यह प्रभु का स्मरण हमें वासनाओं से बचाएगा। हममें वासनाओं से लड़ने की शक्ति नहीं है । हमारे हृदयों में प्रकाश होगा। उस प्रकाश में हमारा कर्तव्य-पथ हमें स्पष्ट दीखेगा। 

    मन्त्र के शब्दों में हम (द्युमद् गामन्) = प्रकाशमय मार्गवाले होंगे। इतना ही नहीं, के प्रभु सम्पर्क में प्रभु से शक्ति प्राप्त करके,  हम (‘अथर्वण') = अपने  मार्ग से डावाँडोल न होने के कारण [न थर्वति=चरति] होंगे। इसलिए रात्रि में सोने से पूर्व प्रभु का स्मरण अवश्य करें। वेद कहता है कि उस (देवम्) = सब दिव्य गुणों के भण्डार (सवितारम्) = सबको सदा उत्तम प्रेरणा देनेवाले प्रभु की स्(तुहि) = स्तुति करो ।

    प्रभु के दिव्य गुणों का चिन्तन ही वस्तुतः स्तोता को उन दिव्य गुणों के धारण करने की प्रेरणा देता है। अपने जीवन को उत्तम बनाने के लिए यह स्तोता सदा प्रभु का ध्यान करता है। ध्यान करने के कारण ही 'दध्यङ्' कहलाता है। यह प्रभु का ध्यान ही इसे आथर्वण= अडिग बना देता है।

    भावार्थ

    हम प्रभु की स्तुति करते हुए सदा प्रकाश को देखें और दृढ़ता से मार्ग का आक्रमण करें।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = साधक१   अपने ही आत्मा के प्रति कहता है, हे ( वृहद्वाय ) = बृहत्साम का गान करने वाले या प्राण स्वर से गान करनेहारे ! हे ( आथर्वण ) = जीवन का नाश न करनेहारे आत्मन् ! हे ( गामन् ) = गतिशील ! आत्मन् ! ( द्युमद्, दोषः ) = दीप्तिमान्, सब अन्धकारों का नाश करने हारा ईश्वर ( आगात् ) = अब अन्तरात्मा में उदित होगया है। अतः उस ( सवितारं ) = सबको प्रेरणा करनेहारे ( देवं ) = प्रकाशस्वरूप देव को ( स्तुहि ) = तू कीर्त्तन कर । विशोका, ज्योतिष्मती प्रज्ञा के उदय के अवसर पर साधक की यही दशा होती है।

    टिप्पणी

    १७७–‘दोषो गाय बृहद्गाय द्युमद्धेहि ।  आथर्वण देवं सवितारम्' । इति अथ० । 
    १. स्वात्मानमेवमामन्त्रयते । सा० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - दध्यङ्आथर्वण:। 

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - गायत्री।

    स्वरः - षड्जः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ मनुष्यः परमात्मानं राजानं च स्तोतुं प्रेर्यते।

    पदार्थः

    हे (द्युमद्गामन्२) द्युमान् दीप्तिमान् विद्यादिसद्गुणप्रकाशयुक्तः३ गामा गमनम् आचरणं यस्य तथाविध ! द्युमान् द्योतनवान्। निरु० ६।१९। गामा इत्यत्र गाङ् गतौ धातोः सर्वधातुभ्यो मनिन् उ० ४।१४६ इति मनिन्। (आथर्वण) अचञ्चलवृत्ते अतिशयस्थितप्रज्ञ विद्वन् ! अथर्वाणोऽथर्वणवन्तः। थर्वतिश्चरतिकर्मा, तत्प्रतिषेधः। निरु० ११।१९। अथर्वणोऽपत्यम् आथर्वणः। अपत्यार्थे अण् प्रत्ययः४। पश्य, (दोषा५ उ) रात्रिः, अज्ञानमोहदुर्व्यसनदुराचारादीनां तमिस्रा। दोषा इति रात्रिनाम। निघं० २।७। (आ अगात्) आगताऽस्ति। अतस्त्वम् (बृहत्६) प्रचुरम् (गाय) गानं कुरु, सदुपदेशसच्छिक्षादिद्वारेण धर्मवाणीं प्रसारय। (देवम्) प्रकाशमयं प्रकाशकं च (सवितारम्) सद्विद्यादिप्रेरकम् इन्द्रं परमात्मानं राजानं वा (स्तुहि) अर्च, उद्बोधय वा। अत्र इन्द्रदेवताकत्वाद् ऋचः सविता इन्द्र एव ज्ञेयः ॥३॥

    भावार्थः

    यथा गगने प्रकटितः सूर्यः स्वरश्मिभिर्निविडान्धकारपूर्णां निशां निवार्य सर्वत्र प्रकाशं विकिरति, तथैव जनानां हृदयेषु प्रकटितः परमात्मा, राष्ट्रे राजपदेऽभिषिक्तो वीरो मनुष्यश्च सर्वतो व्याप्तामधर्माज्ञानदुश्चारित्र्यकदाचारादेः कृष्णां तमिस्रां विदार्य धर्मविद्यासच्चारित्र्यादेरुज्ज्वलं प्रकाशं प्रसारयति। अतो विद्वद्भिः स परमेश्वरो राजा च गुणवर्णनेन मुहुर्मुहुः स्तोतव्यः ॥३॥

    टिप्पणीः

    १. अथ० ६।१।१। दोषो गाय बृहद् गाय द्युमद् धेहि। आथर्वण स्तुहि देवं सवितारम् ॥ इति पाठः। ऋषिः अथर्वा। देवता सविता। २. कीदृशं स्तुतिरूपम् ? द्युमत् स्वरसौष्ठवयुक्तमित्यर्थः। गामन्। गामान् गाता उच्चारयिता स्तोता। तस्य संबोधनं हे गामन् स्तोतरित्यर्थः—इति वि०। द्युमत् दीप्तिमत् स्तोत्रम्। हे गामन्। गायतीति गामान् स्तोता। हे स्तोतः—इति भ०। तदुभयमपि पदकारविरुद्धम्, तन्मते द्युमद्गामन् इत्यस्य समस्तपदत्वात्। ३. द्युमान् विद्यादिसद्गुणप्रकाशयुक्तः इति ऋ० १।६२।१२ भाष्ये—द०। ४. अपत्यप्रत्यया अपत्यवाचिनः शब्दाश्च येन संयुज्यन्ते तस्याधिक्यं द्योतयन्तीति वैदिकी शैली। यथा अग्निर्वेदे सहसः सूनुः उक्तः अतिशयबलवान् इत्यर्थं व्यनक्ति। लोकभाषायामपि बल का पुतला इत्युक्तौ पुतला शब्दः पुत्र शब्द-स्यैवापभ्रंशः। ५. दोषः दूषयति नाशयति तमांसीति वा, दुनोति उपतपति रक्षांसि इति वा दोषः सविता—इति भ०। ‘दोषः ऋत्विग्—यजमानापराधेन यः कश्चिद् दोषः आगात् आगच्छति, तत्परिहारार्थं सवितारं प्रेरकम् एतन्नामकं देवं स्तुहि। यद्वा दोषः दूषयति नाशयति तमांसीति, दुनोति उपतपति रक्षांसीति वा दोषः स सविता आगात्—इति सा०। तदुभयमपि पदकारविरुद्धम्। तत्र दोषा उ इति पदच्छेदात्। ६. सायणस्तु बृहद्गाय इति समस्तं पदं मन्यते, बृहदाख्यस्य साम्नो गातः इति। तदपि पदकारविरुद्धं स्वरविरुद्धं च।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O soul, the singer of Brihat Sama, the non-destroyer of life, the master of action, the Effulgent God, the Remover of all sorts of ignorance, has manifested Himself in thee. Sing His praise, the Persuader of all.

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    Meaning

    O singer of Brhat Samans, scholar of Atharva, passionate seeker celebrant of divinity, Brahma, high priest, when the night is come, sing of Savita, adore the light of life.

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (द्युमद्गामन्) હે પ્રકાશમાન પરમાત્માને પ્રાપ્ત કરનાર જ્ઞાની ઉપાસક ! (आथर्वण) અત્યંત સ્થિર મનવાળા (बृहद्गाय) બહુ જ ગુણગાયક મુમુક્ષુજન ! (दोषा उ आगात्) અરે રાત્રિનું આગમન થઈ રહ્યું છે - આવનારી છે, માટે તેના પહેલાં (सवितारं देवं स्तुहि) ઉત્પાદક, પ્રેરક અને સુખ ઐશ્વર્યપ્રદ  પરમાત્માની સ્તુતિ કર. (૩)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પ્રકાશમાન પરમાત્માને પ્રાપ્ત કરનાર, સ્થિર મનયુક્ત, ગુણગાયક મુમુક્ષુજન ! રાત્રિમાં, સાંજના સમયે તથા જીવનની નિશા = રાત્રિની પહેલાં જ યુવાવસ્થામાં ઉત્પાદક, પ્રેરક, વિવિધ ભોગ અને આનંદના દાતા પરમાત્માની સ્તુતિ નિરંતર કર્યા કર. (૩)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    سندھیا آگئی سندھیا کرو!

    Lafzi Maana

    ہے اُپاسک (دوشا اُواگات) شام کا وقت ہو گیا ہے، (برہدگایہ) پرمیشور کی پُوجا کے بڑے سام گان کو گا۔ سام وید کے سنگیت کو گاتے ہوئے خدا کی عبادت میں بیٹھ۔ (گامن) گانے کی کلا کو جاننے والے (آتھروں) اھرو وید کی وِدّیا کو جان کر یکسوئی سے بیٹھ کر دھیان کرنے والے! تُو ایسا سام گان گا، جو (دئیومت) دیو لوک کی طرح سب طرف روشنی پھیلا دے، (دیوم سِوتا تارم ستُوہی) دیووں کے دیو جگت پتا پرماتما کی اس طرح سے سُتتی کرتا ہوا دھیان میں مگن ہو۔

    Tashree

    شام آئی اُٹھ کے پیارے اِیش کی کر بندگی، منتر وِدّیا گان سے حاصل ہو تُجھ کو زندگی۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जसा आकाशात उदित झालेला सूर्य आपल्या किरणांनी भयंकर अंधकार असलेली रात्र हटवून सर्वत्र प्रकाश फैलावतो, तसेच माणसाच्या हृदयात प्रकट झालेला परमात्मा व राष्ट्रात राजाच्या पदावर अभिषिक्त झालेला वीर पुरुष सर्वत्र व्याप्त अधर्म अज्ञान, दुश्चरित्रता, दुराचार इत्यादी काळरात्रीला विदीर्ण करून धर्म, विद्या, सच्चरित्रता इत्यादीच्या उज्ज्वल प्रकाशाला चहुकडे पसरवितो. त्यासाठी विद्वानांनी परमात्मा व राजाची स्तुती करावी ॥३॥

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    विषय

    आता परमेश्वराची तसेच राजाची स्तुती करण्यासाठी मनुष्याला प्रेरणा केली जात आहे -

    शब्दार्थ

    (द्युमद् गामन्) विद्या आदी सद्वुणांनी संपन्न आचरण करणाऱ्या (आथर्वण) तसेच अचंचल स्वभाव असलेले हे स्थितप्रज्ञ विद्वान महोदय, पहा (दोषा उ) अज्ञान, मोह, दुर्व्यसन, दुराचार आदी दुर्गुणांचा अंधकार (आ अगात्) येत आहे वा यसरत आहे. त्यामुळे तू (बृहत्) अत्याधिक (गाय) गान कर म्हणजे सदुपदेश, शुभविचार आदींच्या साह्याने धर्मवाणीचा प्रसार कर. (देवम्) प्रकाशमय व प्रकाशदाता (सवितारम्) स्दिवधा- प्रेरक त्या ईश्वराची (अर्च) अर्चना कर अथवा (सवितारम्) अद्वित्येचा प्रेरक जो इन्द्र राजा त्याला (अर्च) उद्बोधित उत्साहित कर. या ऋचेची देवता इन्द्र असल्यामुळे इथे ‘समिता’ शब्द इन्द्राचेच विशेषण आहे, असे जाणावे. ।। ३।।

    भावार्थ

    ज्याप्रमाणे आकाशात उगवलेला सूर्य आपल्या तेजस्वी किरणांनी घोर अंधाऱ्या रात्रीला नष्ट करून सर्वत्र प्रकाश विस्तारितो, तद्वत मनुष्यांच्या हृदयात अवस्थित परमेश्वर आणि राष्ट्रात राजा पदावर अभिषिक्त वीर पुरुष अधर्म, अज्ञान, दुश्चारित्र, दुराचार आदी दुर्गुणरूप अंधकाराला छिन्न- भिन्न करून धर्म, विद्या, सच्चारित्र्य आदींचा उज्ज्वल प्रकाश सर्वत्र फैलावतो. त्यामुळे विद्वजनांचे कर्तव्य आहे की त्यांनी परमेश्वराचे व राजाचे गुणवर्णन वारंवार करीत रहावे. ।। ३।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    தோஷத்தை துரத்தும் சவிதா வந்துள்ளாள். [1](அதர்வமகனே) பெரிய தோத்திரத்தை கானஞ்செய்யவும், சோதிமயமான தோத்திரத்தை செய்யவும். (சவிதாவான தேவரைத்துதிசெய்யவும்).

    FootNotes

    [1].அதர்வமகனே - அமுதமகனே

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