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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1777
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - अग्निः छन्दः - पदपङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
    54

    अ꣢ग्ने꣣ त꣢म꣣द्या꣢श्वं꣣ न꣢꣫ स्तोमैः꣣ क्र꣢तुं꣣ न꣢ भ꣣द्र꣡ꣳ हृ꣢दि꣣स्पृ꣡श꣢म् । ऋ꣣ध्या꣡मा꣢ त꣣ ओ꣡हैः꣢ ॥१७७७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣡ग्ने꣢꣯ । तम् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । स्तो꣡मैः꣢꣯ । क्र꣡तु꣢꣯म् । न । भ꣣द्र꣢म् । हृ꣣दिस्पृ꣡श꣢म् । हृ꣣दि । स्पृ꣣श꣢म् । ऋ꣣ध्या꣡म꣢ । ते । ओ꣡हैः꣢꣯ ॥१७७७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रꣳ हृदिस्पृशम् । ऋध्यामा त ओहैः ॥१७७७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने । तम् । अद्य । अ । द्य । अश्वम् । न । स्तोमैः । क्रतुम् । न । भद्रम् । हृदिस्पृशम् । हृदि । स्पृशम् । ऋध्याम । ते । ओहैः ॥१७७७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1777
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम ऋचा पूर्वाचिक में ४३४ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की अर्चना के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहा जा रहा है।

    पदार्थ

    हे (अग्ने) जीवननायक परमेश्वर ! (अद्य) आज (अश्वं न) व्यापक सूर्य के समान प्रकाशमान और (क्रतुं न) यज्ञ-कर्म के समान (भद्रम्) भद्र, (हदिस्पृशम्) हृदय में निवास करनेवाले (तम्) उस शरीरवर्ती अपने अन्तरात्मा को (ते ओहैः) तेरे द्वारा प्रेरित (स्तोमैः) वेदमन्त्रों से, हम (ऋध्याम) बढ़ायें, उद्बोधन दें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

    भावार्थ

    जो तेजस्वी और कर्मण्य जीवात्मा सबके ह्रदय में स्थित है,उसे उद्बोधक वेदमन्त्रों से अधिकाधिक उद्बोधन देना चाहिए तथा गुणगरिमा से बढ़ाना चाहिए ॥१॥

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    टिप्पणी

    (देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या ४३४)

    विशेष

    ऋषिः—वामदेवः (वननीय परमात्मदेव जिसका है ऐसा उपासक)॥ देवता—अग्निः (ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥<br>

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    विषय

    व्यापकता व क्रियाशीलता

    पदार्थ

    प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि वामदेव कहता है कि (अग्ने) = हे सर्वोन्नतियों के साधक अग्रेणी प्रभो! (अश्वं न) = व्यापकता के अनुसार और (क्रतुं न) = संकल्प व क्रियाशीलता के अनुसार (भद्रम्) = कल्याण करनेवाले (तम्) = उन आपको (अद्य) = आज (स्तोमैः) = स्तुतियों से हम (ऋध्याम) = बढ़ाते हैं। मनुष्य की मनोवृत्ति जितनी व्यापक होगी, जितना वह क्रियाशील होगा उतना ही उसका कल्याण होगा। ‘व्यापकता व क्रियाशीलता' इन दो तत्त्वों का अपनाना नितान्त आवश्यक है । हे प्रभो ! आप तो (हृदिस्पृशम्) = प्रतिक्षण मेरे हृदय को छूनेवाले हो । मैं अच्छा कर्म करूँ तो उत्साह, बुरा करूँ तो 'भय शंका व लज्जा' के देनेवाले हो । आपसे निरन्तर प्रेरणा प्राप्त करता हुआ मैं अपने जीवन में अधिकाधिक व्यापक मनोवृत्तिवाला तथा क्रियाशील बनूँ । =

    मैं उन स्तोमों से आपका स्तवन करूँ जो (ते ओहैः) = आपको प्राप्त करानेवाले हैं। आपकी स्तुतियों से मेरे हृदय में भी एक प्रेरणा उत्पन्न होती है- -आप 'हृदिस्पृक्' तो हैं ही । उन प्रेरणाओं से प्रेरित होकर मैं जिस मार्ग पर चलता हूँ वह मार्ग मुझे आपके अधिक और अधिक समीप प्राप्त कराता है। मैं भी आपके समान ‘दयालु व न्यायकारी' बनने का प्रयत्न करता हूँ और जितने अंश में बन पाता हूँ उतना आपके समीप हो जाता हूँ।

    ‘आपकी प्रत्येक क्रिया किस प्रकार व्यापक है' यह विचार करता हुआ मैं भी अपनी क्रियाओं में व्यापकता लाने का प्रयत्न करता हूँ और जिस प्रकार आप स्वाभाविक रूप से क्रियाशील हैं उसी प्रकार मैं भी अपनी क्रियाओं में स्वाभाविकता लाने का प्रयत्न करता हूँ – क्रिया मेरा स्वभाव हो जाता है। अकर्मण्यता मेरे पास नहीं फटकती। अकर्मण्यता में पनपनेवाले अवगुणों को समाप्त कर मैं अपने को ‘वामदेव'= सुन्दर दिव्य गुणोंवाला बना पाता हूँ ।
     

    भावार्थ

    मेरी मनोवृत्ति व्यापक हो, मेरे हाथ सदा सुकर्मों में व्याप्त हों ।
     

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    व्याख्या देखो अविकल सं० [ ४३४ ] पृ० २२०।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ नृमेधः। ३ प्रियमेधः। ४ दीर्घतमा औचथ्यः। ५ वामदेवः। ६ प्रस्कण्वः काण्वः। ७ बृहदुक्थो वामदेव्यः। ८ विन्दुः पूतदक्षो वा। ९ जमदग्निर्भागिवः। १० सुकक्षः। ११–१३ वसिष्ठः। १४ सुदाः पैजवनः। १५,१७ मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः। १६ नीपातिथिः काण्वः। १७ जमदग्निः। १८ परुच्छेपो देवोदासिः। २ एतत्साम॥ देवता:—१, १७ पत्रमानः सोमः । ३, ७ १०-१६ इन्द्रः। ४, ५-१८ अग्निः। ६ अग्निरश्विानवुषाः। १८ मरुतः ९ सूर्यः। ३ एतत्साम॥ छन्द:—१, ८, १०, १५ गायत्री। ३ अनुष्टुप् प्रथमस्य गायत्री उत्तरयोः। ४ उष्णिक्। ११ भुरिगनुष्टुप्। १३ विराडनुष्टुप्। १४ शक्वरी। १६ अनुष्टुप। १७ द्विपदा गायत्री। १८ अत्यष्टिः। २ एतत्साम । स्वर:—१, ८, १०, १५, १७ षड्जः। ३ गान्धारः प्रथमस्य, षड्ज उत्तरयोः ४ ऋषभः। ११, १३, १६, १८ गान्धारः। ५ पञ्चमः। ६, ८, १२ मध्यमः ७,१४ धैवतः। २ एतत्साम॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ४३४ क्रमाङ्के परमेश्वरार्चनविषये व्याख्याता। अत्र जीवात्मविषय उच्यते।

    पदार्थः

    हे (अग्ने) जीवननायक परमेश ! (अद्य) अस्मिन् दिने (अश्वं न) व्यापकं सूर्यमिव प्रकाशमानम्, (क्रतुं न) यज्ञ-कर्म इव च (भद्रम्) कल्याणकरम्, (हृदिस्पृशम्) हृदयनिवासिनम् (तम्) शरीरवर्तिनं स्वान्तरात्मानम् (ते ओहैः) त्वया प्रेरितैः (स्तोमैः) वेदमन्त्रैः (ऋध्याम) वर्धयेम, उद्बोधयेम। [ऋधु वृद्धौ, दिवादिः स्वादिश्च] ॥१॥२ अत्रोपमालङ्कारः ॥१॥

    भावार्थः

    यस्तेजस्वी कर्मण्यश्च जीवात्मा सर्वेषां हृदि सन्निविष्टः स उद्बोधकैर्वेदमन्त्रैरधिकाधिकमुद्बोधनीयो गुणगरिम्णा वर्धनीयश्च ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O fire, we kindle thee this day with hymns that extol thee, that carries the oblations, to heaven, as a horse carries us to our destination, is-, serviceable like a Yajna (sacrifice), and deer to our hearts.

    Translator Comment

    See verse 434.

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    Meaning

    Agni, mighty power of light and motion, with songs of praise and prayer and with holy acts of service offered in homage to you today, we augment, celebrate and glorify you, fast as natures waves of energy, bright as intelligence and blissful as yajna, and dear as love closest to the heart. (Rg. 4-10-1)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अग्ने) પ્રકાશસ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! (अद्य) આજ શીઘ્ર-અત્યારે જ (तम्) તે પ્રસિદ્ધ તું, (अश्वं न) ઘોડાની સમાન સંસારવહન કર્તા, (हृदिस्पृशम्) હૃદયંગમને (क्रतुं न भद्रं) તથા યજ્ઞની સમાન કલ્યાણકર ભજનીયને (ओहैः स्तोमैः) સમગ્ર રૂપથી યાદ કરાવનાર સ્તુતિ સમૂહો દ્વારા (ते ऋध्याम्) અમે તારા ઉપાસકો અમારી અંદર સાધીએ-ધારણ કરીએ. (૮)
     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : ઘોડાની સમાન સંસારવહન કર્તા અને યજ્ઞની સમાન કલ્યાણકારી, ભજનીય હૃદયથી સ્પર્શ થઈ શકે અને જાણી શકાય એવા = હૃદયંગમ પરમાત્માને સ્મરણીય સ્તુતિ મંત્રો દ્વારા અમારા હૃદયમાં સાધીએ-ધારણ કરીએ. (૮)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो तेजस्वी व कर्मण्य जीवात्मा सर्वांच्या हृदयात स्थित आहे, त्याला उद्बोधक वेदमंत्रांनी अधिकाधिक उद्बोधन दिले पाहिजे व गुणगौरव वाढविला पाहिजे. ॥१॥

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