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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1798
    ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - इन्द्रः छन्दः - विराडनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
    22

    श्रु꣣धी꣡ हवं꣢꣯ विपिपा꣣न꣢꣫स्याद्रे꣣र्बो꣢धा꣣ वि꣢प्र꣣स्या꣡र्च꣢तो मनी꣣षा꣢म् । कृ꣣ष्वा꣢꣫ दुवा꣣ꣳस्य꣡न्त꣢मा꣣ स꣢चे꣣मा꣢ ॥१७९८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    श्रु꣣धि꣢ । ह꣡व꣢꣯म् । वि꣡पिपान꣡स्य꣢ । वि꣢ । पिपान꣡स्य꣢ । अ꣡द्रेः꣢꣯ । अ । द्रेः꣣ । बो꣡ध꣢꣯ । वि꣡प्र꣢꣯स्य । वि । प्र꣣स्य । अ꣡र्च꣢꣯तः । म꣣नीषा꣢म् । कृ꣣ष्व꣢ । दु꣡वा꣢꣯ꣳसि । अ꣡न्त꣢꣯मा । स꣡चा꣢꣯ । इ꣣मा꣢ ॥१७९८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम् । कृष्वा दुवाꣳस्यन्तमा सचेमा ॥१७९८॥


    स्वर रहित पद पाठ

    श्रुधि । हवम् । विपिपानस्य । वि । पिपानस्य । अद्रेः । अ । द्रेः । बोध । विप्रस्य । वि । प्रस्य । अर्चतः । मनीषाम् । कृष्व । दुवाꣳसि । अन्तमा । सचा । इमा ॥१७९८॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1798
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में उपास्य-उपासक का विषय वर्णित है।

    पदार्थ

    हे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (विपिपानस्य) जिसने विशेषरूप से ज्ञान-रस और कर्म-रस का पान कर लिया है, ऐसे (अद्रेः) अविनाशी जीवात्मा की (हवम्) प्रार्थना को (श्रुधि) सुनो, (अर्चतः) पूजक (विप्रस्य) मेधावी विद्वान् की (मनीषाम्) स्तुति को (बोध) जानो। आगे स्तोता को सम्बोधन करते हैं—हे स्तोता ! तू (सचा) अन्य स्तोताओं के साथ मिलकर (इमा) इन (अन्तमा) निकटतम (दुवांसि) पूजाओं को (कृष्व) इन्द्र जगदीश्वर के लिए कर ॥१॥

    भावार्थ

    हार्दिक निश्छल उपासनाओं को ही परमेश्वर स्वीकार करता है, छल-छिद्रों से युक्त, बनावटी उपासनाओं को नहीं ॥१॥

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    पदार्थ

    (विपिपानस्य) विशेष अध्यात्मरस पान करने वाले—(अद्रे) श्लोककृत्४ स्तुतिकर्ता के (हवं श्रुधि) आमन्त्रण को सुन—स्वीकार कर (अर्चतः-विप्रस्य) अर्चना करते हुए मेधावी५ विद्वान् के मनोभाव को सुन (बोध) जान (इमा दुवांसि-अन्तमा सचा कृष्व) मेरे इन नम्र वचनों६ या अर्चनीय कथनों या अभीष्टों७ को समीप—साथ देने वाले कर॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला उपासक)॥ देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥ छन्दः—विराट्॥<br>

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    विषय

    वसिष्ठ की प्रभु-अर्चना

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! आप (हवम्) = पुकार को (श्रुधी) = सुनिए । किसकी ? [क] (विपिपानस्य) = जो आपके दर्शन का अत्यन्त प्यासा है । [ख] (अद्रेः) = जो आपके दर्शन के दृढ़ निश्चय से हटाया नहीं जा सकता । वस्तुत: वसिष्ठ प्रभु-दर्शन के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित है। वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि आप मेरी पुकार सुनिए और मुझे दर्शन दीजिए। जैसे प्यासे को सिवाय पानी के और कुछ नहीं रुचता इसी प्रकार मेरा सन्तोष आपके दर्शन के सिवाय किसी भी और वस्तु से नहीं हो सकता । मुझे इस दर्शन के दृढ़ निश्चय से 'सन्तान-सम्पत्ति - आमोद, प्रमोद व दीर्घजीवन' आदि का कोई भी प्रलोभन पृथक् नहीं कर सकता। मैं अपने इस निश्चय पर चट्टान की भाँति दृढ़ हूँ — अद्रि हूँ।

    २. (विप्रस्य) = विशेषरूप से अपने पूरण [प्रा-पूरणे] के लिए प्रयत्नशील और इसीलिए (अर्चतः) = आपकी अर्चना करते हुए मेरी (मनीषाम्) = बुद्धि को (बोध) = आप ज्ञान के प्रकाशवाला कीजिए ।

    हे प्रभो! आप अपने प्रिय का कल्याण करने के लिए उसकी बुद्धि को ही तो सुन्दर बना देते हैं। मैं भी आपका भक्त हूँ- आपकी अर्चना में लगा हूँ। आपकी अर्चना द्वारा अपनी न्यूनताओं को दूर करना चाहता हूँ। आप मेरी बुद्धि को बोधमय कीजिए- मुझे प्रकाश दिखाइए, जिससे मैं ठीक मार्ग का ही आक्रमण करूँ ।

    ३. (कृष्वा दुवांसि) = [दुवस्= Wealth] आप मुझे धन प्राप्त कराइए । हे प्रभो ! मैं क्यों इस धनार्जन में अपना समय नष्ट करूँ। मेरे लिए आवश्यक धन तो आपने ही प्राप्त कराना है। मेरा समय तो जीवन को पवित्र बनाने में, बुद्धि को प्रकाशमय करने में और आपकी आज्ञानुसार लोकहित में व्यतीत हो । यह प्राकृतिक शरीर आपका दिया हुआ है, इसका पोषण तो आपको ही करना है। 

    ४. हम तो इस धन के धन्धे में न उलझकर आपको पाने के लिए ही प्रयत्नशील हों और (अन्तम्) = आपकी समीपता को (आ सचेम) = सर्वथा सेवन करनेवाले बनें ।

    भावार्थ

    १. मेरी प्रभु- दर्शन की प्यास अत्यन्त तीव्र हो, २. मैं प्रभु - दर्शन के दृढ़ निश्चय से किसी भी प्रकार विदीर्ण [पृथक्] न किया जा सकूँ, ३. मुझमें अपने जीवन की पूर्णता के लिए सतत प्रयत्न हो, ४. इसीलिए मैं प्रभु का अर्चन करूँ, ५. प्रकाश को देखने का प्रयत्न करूँ, ६. धन को धन्धा न बनाकर प्रभु पर विश्वास से चलूँ; और ७. अन्त में प्रभु के सामीप्य का अनुभव करूँ । वसिष्ठ की आराधना इससे भिन्न हो ही कैसे सकती है ?
     

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! (विपिपानस्य) आनन्दरस का पान करने हारे (अद्रेः) आदरणीय और ज्ञानी, एवं पर्वत के समान दृढ़, काम क्रोध आदि से दीर्ण न होने वाले योगाभ्यासी के (हवं) पुकार को (श्रुधि) श्रवण कर (अर्चतः) स्तुति करते हुए (विप्रस्य) मेघावी विद्वान् पुरुष की (मनीषाम्) मन की गति, या स्तुति को (बोध) आप जानते हो। और (सचा) आप सहायक रूप से (इमा) इन (दुवांसि) शुभ कामनाओं को (अन्तमा) हृदयंगम (कृष्व) कीजिये।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ नृमेधः। ३ प्रियमेधः। ४ दीर्घतमा औचथ्यः। ५ वामदेवः। ६ प्रस्कण्वः काण्वः। ७ बृहदुक्थो वामदेव्यः। ८ विन्दुः पूतदक्षो वा। ९ जमदग्निर्भागिवः। १० सुकक्षः। ११–१३ वसिष्ठः। १४ सुदाः पैजवनः। १५,१७ मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः। १६ नीपातिथिः काण्वः। १७ जमदग्निः। १८ परुच्छेपो देवोदासिः। २ एतत्साम॥ देवता:—१, १७ पत्रमानः सोमः । ३, ७ १०-१६ इन्द्रः। ४, ५-१८ अग्निः। ६ अग्निरश्विानवुषाः। १८ मरुतः ९ सूर्यः। ३ एतत्साम॥ छन्द:—१, ८, १०, १५ गायत्री। ३ अनुष्टुप् प्रथमस्य गायत्री उत्तरयोः। ४ उष्णिक्। ११ भुरिगनुष्टुप्। १३ विराडनुष्टुप्। १४ शक्वरी। १६ अनुष्टुप। १७ द्विपदा गायत्री। १८ अत्यष्टिः। २ एतत्साम । स्वर:—१, ८, १०, १५, १७ षड्जः। ३ गान्धारः प्रथमस्य, षड्ज उत्तरयोः ४ ऋषभः। ११, १३, १६, १८ गान्धारः। ५ पञ्चमः। ६, ८, १२ मध्यमः ७,१४ धैवतः। २ एतत्साम॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथोपास्योपासकविषयमाह।

    पदार्थः

    हे इन्द्र जगदीश्वर ! त्वम् (विपिपानस्य) ज्ञानकर्मरसं विशेषेण पीतवतः (अद्रेः) अविनश्वरस्य जीवात्मनः (हवम्) आह्वानम् (श्रुधि) शृणु, (अर्चतः) पूजकस्य (विप्रस्य) मेधाविनो विदुषः (मनीषाम्) स्तुतिम् (बोध) बुध्यस्व। सम्प्रति स्तोता सम्बोध्यते—हे स्तोतः ! त्वम् (सचा) अन्यैः स्तोतृभिः सह (इमा) इमानि (अन्तमा) अन्तमानि अन्तिकतमानि (दुवांसि) परिचरणानि (इन्द्राय) जगदीश्वराय (कृष्व) कुरु। [विपिपानस्य विपूर्वः पा पाने, लिटः कानच्। अद्रेः, न दीर्यते इत्यद्रिः तस्य। ‘अन्तमा, इमा’ अत्र ‘शेश्छन्दसि बहुलम्’। अ० ६।१।७० इत्यनेन शसः शेर्लोपः। कृष्व, डुकृञ् करणे लोटि विकरणाभावश्छान्दसः। संहितायां ‘द्व्यचोऽतस्तिङः’ अ० ६।३।१३५ इति दीर्घः] ॥१॥२

    भावार्थः

    हार्दिकानि निश्छलान्येवोपासनानि परमेश्वरः स्वीकरोति, छलछिद्रोपेतानि कृत्रिमाणि न ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, accept the call of a venerable, learned Yogi, firm like a rock. Thou knowest the state of the mind of a learned person who lauds Thee. As a friend, residing in the intellect, receive these adulations!

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    Meaning

    Listen to the cloud shower of exhortation from the vibrant sage, joyous participant in the congregation, know the thought and will of the wise scholar in adoration of your honour, and honour these prayers, most sincere and intimate, in action. (Rg. 7-22-4)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (विपिपानस्य) વિશેષ અધ્યાત્મરસ પાન કરનાર, (अद्रे) શ્લોકકૃત સ્તુતિકર્તાનાં (हवं श्रुधि) આમંત્રણને સાંભળ-સ્વીકાર કર. (अर्चतः विप्रस्य) અર્ચના કરતાં મેધાવી વિદ્વાનના મનોભાવને સાંભળ (बोध) જાણ (इमा दुवांसि अन्तमा सचा कृष्व) મારા એ નમ્ર વચનો અર્થાત્ અર્ચનીય કથનો અથવા અભીષ્ટોની સમીપ-સાથ આપનાર કર. (૧)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वर हार्दिक निश्छल उपासनांचाच स्वीकार करतो, छल-छिद्रांनी युक्त, बनावटी (नकली) उपासनेने नाही. ॥१॥

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