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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1853
    ऋषिः - अप्रतिरथ ऐन्द्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
    58

    ब꣣लविज्ञायः꣡ स्थवि꣢꣯रः꣣ प्र꣡वी꣢रः꣣ स꣡ह꣢स्वान्वा꣣जी꣡ सह꣢꣯मान उ꣣ग्रः꣢ । अ꣣भि꣡वी꣢रो अ꣣भि꣡स꣢त्वा सहो꣣जा꣡ जैत्र꣢꣯मिन्द्र꣣ र꣢थ꣣मा꣡ ति꣢ष्ठ गो꣣वि꣢त् ॥१८५३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ब꣣लविज्ञायः꣢ । ब꣣ल । विज्ञायः꣢ । स्थ꣡वि꣢꣯रः । स्थ । वि꣣रः । प्र꣡वी꣢꣯रः । प्र । वी꣣रः । स꣡ह꣢꣯स्वान् । वा꣣जी꣢ । स꣡ह꣢꣯मानः । उ꣣ग्रः꣢ । अ꣣भि꣡वी꣢रः । अ꣣भि꣢ । वी꣢रः । अभि꣣स꣢त्वा । अ꣡भि꣢ । स꣣त्वा । सहोजाः꣢ । स꣣हः । जाः꣢ । जै꣡त्र꣢꣯म् । इ꣣न्द्र । र꣡थ꣢꣯म् । आ । ति꣣ष्ठ । गोवि꣢त् । गो꣣ । वित् ॥१८५३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः । अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित् ॥१८५३॥


    स्वर रहित पद पाठ

    बलविज्ञायः । बल । विज्ञायः । स्थविरः । स्थ । विरः । प्रवीरः । प्र । वीरः । सहस्वान् । वाजी । सहमानः । उग्रः । अभिवीरः । अभि । वीरः । अभिसत्वा । अभि । सत्वा । सहोजाः । सहः । जाः । जैत्रम् । इन्द्र । रथम् । आ । तिष्ठ । गोवित् । गो । वित् ॥१८५३॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1853
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (बलविज्ञायः) ब्रह्मबल का ज्ञाता, (स्थविरः) अनुभव में वृद्ध, (प्रवीरः) अतिशय वीर, (सहस्वान्) उत्साही, (वाजी) विज्ञानवान् (सहमानः) सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करनेवाला, (उग्रः) प्रतापी, (अभिवीरः) मन, प्राण, आदि वीरों से युक्त, (सहोजाः) बल में प्रसिद्ध, (गोवित्) विवेक की किरणों को और श्रेष्ठ वाणियों को प्राप्त तू (जैत्रम्) विजयशील (रथम्) रथ पर (आतिष्ठ) बैठ ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे स्वयं वीर तथा वीर योद्धाओं से युक्त सेनापति जयशील रथ पर चढ़कर भयङ्कर युद्ध को भी जीत लेता है, वैसे ही वेदज्ञ, ब्रह्मज्ञ, सहनशील, मन-बुद्धि-प्राण आदि वीरों से युक्त, प्रभाववान्, प्रतापी, देह-रथ के अधिष्ठाता जीवात्मा को योग्य है कि अपने प्रौढ़ मनोबल से सभी बाह्य और आन्तरिक सङ्ग्रामों को जीत लेवे ॥२॥

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    पदार्थ

    (इन्द्र) हे परमात्मन्! तू (बलविज्ञायः) समस्त देवों को विशेष जानने वाला२ अतएव (स्थविरः) शाश्वतिक (प्रवीरः) प्रकृष्टरूप से प्रेरणाप्रद (सहस्वान्) ओजस्वी—ओजप्रद (वाजी) अमृतान्न वाला अमृतान्नप्रद३ (सहमानः) सर्वसहनकर्ता—सर्वाधार (उग्रः) प्रतापी (अभिवीरः) सर्वोपरि राजमान (अभिसत्त्वा) सर्वव्यापक (सहोजाः) उपासकों में आत्मबल को प्रादुर्भूत करने वाला (गोवित्) स्तोता जनों को प्राप्त होने वाला (जैत्रं रथम्-आतिष्ठ) जितेन्द्रिय रमण करने वाले उपासक में आ विराज॥२॥

    विशेष

    ऋषिः—प्रजापतिः (इन्द्रियों का स्वामी शरीररथ से उपरत इन्द्र—परमात्मा का उपासक)॥ देवता—बृहस्पतिः (स्तुतिवाणी का रक्षक परमात्मा)॥ छन्दः—त्रिष्टुप्॥<br>

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    विषय

    विजयी रथ जैत्र रथ

    पदार्थ

    ‘प्रजापति', अर्थात् नेता को कैसा बनना चाहिए, यह इस मन्त्र में इन शब्दों में बतलाते हैं - 

    १. (बलविज्ञायः) = तू बल के कारण प्रसिद्ध—known for his vigour तथा

    । २. (गोवित्) = [गाव: - वेदवाच :] वेदवाणियों को जानने व प्राप्त करनेवाला बनकर (जैत्रं रथमातिष्ठ) = विजयशील रथ पर आरूढ़ हो । शरीर ही रथ है जो जीवन-यात्रा की पूर्ति के लिए दिया गया है। जीवन-यात्रा की पूर्ति के लिए बल व ज्ञान दोनों ही तत्त्व आवश्यक हैं । बल रजोगुण का प्रतीक है और ज्ञान सत्त्वगुण का । केवल सत्त्व व केवल रज से नहीं, अपितु दोनों के समन्वय से ही सफलता मिलनी है। इसी बात को मन्त्र में ३-४. (अभिवीरः अभिसत्वा) = इन शब्दों से पुनः = कहा है, वीरता की ओर चलनेवाला और सत्त्व की ओर चलनेवाला । सत्त्व का लक्षण ज्ञान है । एवं, वीरता व ज्ञान का अपने में समन्वय करेवाला ही विजयी बनता है। प्रारम्भ 'बलविज्ञाय:'=शक्ति से है और समाप्ति 'गोवित्=' ज्ञान से है । बल और ज्ञान क्षेत्र और ब्रह्म मिलकर हमें विजयी बनाएँगे । वीरता की ओर चलो - सत्त्वगुण की ओर लो तथा

    ५. (स्थविरः) = स्थिर मति का बनना । डाँवाँडोल व्यक्ति कभी विजयी नहीं होता । ६.(प्रवीरः) = प्रकृष्ट  वीर बनना, कायर नहीं । क्या कायर कभी जीतता है ? ७. (सहस्वान्) = सहनशील=Tolerant बनें। छोटी-छोटी बातों से क्षुब्ध हो गये तो सफल न हो पाएँगे। ८.-९. (सहमानः उग्रः) हम शत्रुओं का पराभव करनेवाले बनें, परन्तु उग्र = उदात्त बने रहें - कमीनेपन पर कभी न उतर आएँ और सबसे बड़ी बात यह कि १०. (सहौजा:) = हम एकता के बलवाले हों -  हम परस्पर मिलकर चलें। सारा विज्ञान हमारा कल्याण तभी करेगा जब हम संज्ञानवाले होंगे। 'संघ में शक्ति है', इस तत्त्व को हम कभी भूल न जाएँ। घर में पति-पत्नी का मेल होता है तो वहाँ अवश्य सफलता उपस्थित होती है । ११. वाजी = ‘Sacrifice’=त्यागवाला । त्याग के बिना विजय सम्भव नहीं – मेल भी सम्भव नहीं । एवं, प्रस्तुत मन्त्र में विजय प्राप्ति के ११ तत्त्वों का प्रतिपादन हुआ है । इनको अपनाकर हम सच्चे प्रजापति बनें ।

    भावार्थ

    हमारे जीवन का एक सिरा शक्ति हो और दूसरा ज्ञान । इनके द्वारा हम यथार्थ प्रजापति बनें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    जिस प्रकार सेनापति (बलविज्ञायः) अपने समस्त सेना सामर्थ्य को भली प्रकार जानता हुआ और साथ ही शत्रुपक्ष को भी जानता हुआ, (स्थविरः) पुराना, अनुभवी या स्थिर रूप से युद्ध के अवसर पर जमने वाला, (प्रवीरः) सब वीरों में उत्तम सामर्थ्यवान्, (सहस्वान्) शत्रु के आक्रमण को सहन करने हारा, (वाजी) ज्ञान और वेग से युक्त, (सहमानः) शत्रु पर विजय प्राप्त करता हुआ, (उग्रः) तीक्ष्णस्वभाव होकर (अभिवीरः) वीर सुभटों को साथ लिये (अभिसत्वा) सात्विक बल और तेज को धारण कर (गोवित्) अपने अश्वों को रासों से सम्भाल कर (जैत्रं रथं) विजयशील रथ पर चढ़ता है उसी प्रकार हे (इन्द्र) आत्मन् ! तू भी (बलविज्ञायः) आत्मिक बल को जान कर (स्थविरः) योगसाधनों अर्थात् मुमुक्षु मार्ग के योग्य तपः साधनों में स्थिर रूप से रह कर अथवा पुरातन, तू (प्रवीरः) उत्कृष्ट सामर्थ्यवान् होकर, (सहस्वान्) सहनशील (वाजी) ज्ञानवान्, (सहमानः) तपस्वी तितिक्षु, (उग्रः) तेजस्वी, (अभिवीरः) चारों ओर अपने सामर्थ्यवान् प्राणों को संग लिये, (अभिसत्वा) सत्व गुण में प्रतिष्ठित होकर (सहोजाः) ओजस्वी और (गोवित्) जितेन्द्रिय, वेदवाणियों को ज्ञानी या आत्मारूप गौ को प्राप्त होकर (जैत्रं रथं) मोक्षमार्ग पर विजय करने हारे रथरूप ब्रह्म पर (आ तिष्ठ) आ बैठ, उसी में स्थिर होजा।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—४ अप्रतिरथ एन्द्रः। ५ अप्रतिरथ ऐन्द्रः प्रथमयोः पायुर्भारद्वाजः चरमस्य। ६ अप्रतिरथः पायुर्भारद्वाजः प्रजापतिश्च। ७ शामो भारद्वाजः प्रथमयोः। ८ पायुर्भारद्वाजः प्रथमस्य, तृतीयस्य च। ९ जय ऐन्द्रः प्रथमस्य, गोतमो राहूगण उत्तरयोः॥ देवता—१, ३, ४ आद्योरिन्द्रः चरमस्यमस्तः। इन्द्रः। बृहस्पतिः प्रथमस्य, इन्द्र उत्तरयोः ५ अप्वा प्रथमस्य इन्द्रो मरुतो वा द्वितीयस्य इषवः चरमस्य। ६, ८ लिंगोक्ता संग्रामाशिषः। ७ इन्द्रः प्रथमयोः। ९ इन्द्र: प्रथमस्य, विश्वेदेवा उत्तरयोः॥ छन्दः—१-४,९ त्रिष्टुप्, ५, ८ त्रिष्टुप प्रथमस्य अनुष्टुवुत्तरयोः। ६, ७ पङ्क्तिः चरमस्य, अनुष्टुप् द्वयोः॥ स्वरः–१–४,९ धैवतः। ५, ८ धैवतः प्रथमस्य गान्धारः उत्तरयोः। ६, ७ पञ्चमः चरमस्य, गान्धारो द्वयोः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनरपि तमेव विषयमाह।

    पदार्थः

    हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (बलविज्ञायः) ब्रह्मबलस्य विज्ञः, (स्थविरः) अनुभववृद्धः, (प्रवीरः) प्रकृष्टो वीरः, (सहस्वान्) उत्साहवान्, (वाजी) विज्ञानवान्, (सहमानः) सुखदुःखादिद्वन्द्वानां सोढा, (उग्रः) प्रतापवान्, (अभिवीरः) अभिगता मनःप्राणादयो वीरा यस्य सः, (अभिसत्वा) अभिगतपराक्रमः, (सहोजाः) सहसा बलेन जातः प्रसिद्धः, (गोवित्) गाः विवेकरश्मीन् श्रेष्ठा वाचो वा विन्दति प्राप्नोति यः तादृशः त्वम् (जैत्रम्) जयशीलम् (रथम्) यानम् (आतिष्ठ) अधिरोह ॥२॥२

    भावार्थः

    यथा स्वयं वीरो वीरैर्योद्धृभिर्युक्तश्च सेनापतिर्जयशीलं रथमधिष्ठाय भीषणमपि समरं जयति तथैव वेदविद् ब्रह्मवित् सहनशीलो मनोबुद्धिप्राणादिभिर्वीरैर्युक्तः प्रभाववान् प्रतापी देहरथस्याधिष्ठाता जीवात्मा प्रौढेन मनोबलेन सर्वानपि बाह्यानान्तरांश्च संग्रामान् जेतुमर्हति ॥२॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O King, the knower of thy strength, firm, foremost fighter, mighty, learned, victorious, all-subduing, the possessor of nice warriors, and military intelligent employees, famous for strength, master of passion, mount thy conquering conveyance !

    Translator Comment

    See Yajur 17-37 and Pt. Jaidev Vidyalankar’s interpretation.

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    Meaning

    Indra, tactical organiser of deployable forces, venerable, strong, undisturbed and invulnerable, stout and brave, challenging, impetuous, blazing, steadfast, commander of the brave, highly intelligent, valiant, illustrious, pray ascend the chariot of victory over rebellious lands. (Rg. 10-103-5)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्द्र) હે પરમાત્મન્ ! તું (बलविज्ञायः) સમસ્ત દેવોને વિશેષ જાણનાર છે માટે (स्थविरः) શાશ્વતિક, (प्रवीरः) પ્રકૃષ્ટરૂપથી પ્રેરણાપ્રદ, (सहस्वान्) ઓજસ્વી-ઓજપ્રદ, (वाजी) અમૃતાન્નવાળા અમૃતાન્નપ્રદ, (सहमानः) સર્વ સહનકર્તા-સર્વાધાર, (उग्रः) પ્રતાપી, (अभिवीरः) સર્વોપરિ પ્રકાશમાન, (अभिसत्त्वा) સર્વવ્યાપક, (सहोजाः) ઉપાસકોમાં આત્મબળને ઉત્પન્ન કરનાર, (गोवित्) સ્તુતિ કરનારાઓને પ્રાપ્ત થનાર, (जैत्रं रथम् आतिष्ठ) જિતેન્દ્રિય રમણ કરનારા ઉપાસકોમાં આવીને વિરાજમાન થા. બેસ. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसा स्वत: वीर व वीर योद्ध्यांनी युक्तसेनापती विजयशील असून रथावर आरूढ होऊन भयंकर युद्धही जिंकतो, तसेच वेदज्ञ, ब्रह्मज्ञ, सहनशील मन-बुद्धी-प्राण इत्यादी वीरांनी युक्त, प्रभावी, प्रतापी देहरथाचा अधिष्ठाता असलेल्या जीवात्म्याने आपल्या परिपक्व मनोबलाने सर्व बाह्य व आंतरिक संग्राम जिंकावा. ॥२॥

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