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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 27
ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
64
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥२७॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣ग्निः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣कु꣢त् । प꣡तिः꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣣य꣢म् । अ꣣पां꣢ । रे꣡ताँ꣢꣯सि । जि꣣न्वति ॥२७॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति ॥२७॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्निः । मूर्धा । दिवः । ककुत् । पतिः । पृथिव्याः । अयम् । अपां । रेताँसि । जिन्वति ॥२७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 27
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 7
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 7
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
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भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
अब सूर्य के दृष्टान्त से परमात्मा की महिमा का वर्णन करते हैं।
पदार्थ
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (अग्निः) सबका अग्रनेता परमेश्वर (मूर्द्धा) शरीर में मूर्द्धा के समान जगत् का शिरोमणि है, (दिवः) प्रकाशमान द्युलोक का (ककुत्) सर्वोन्नत स्वामी है, और (पृथिव्याः) पृथिवी का (पतिः) पालक है। (अयम्) यह परमेश्वर (अपाम्) अन्तरिक्ष के (रेतांसि) जलों को (जिन्वति) वर्षा द्वारा भूमि पर पहुँचाता है ॥ द्वितीय—सूर्य के पक्ष में। (अग्निः) प्रकाशक सूर्यरूप अग्नि (मूर्द्धा) त्रिलोकी का सिर-सदृश, (दिवः) द्युलोकरूपी बैल का (ककुत्) कुब्ब-सदृश और (पृथिव्याः) भूमि का (पतिः) पालनकर्त्ता स्वामी है। यह (अपाम्) अन्तरिक्ष के (रेतांसि) जलों को (जिन्वति) भूमि पर प्रेरित करता है, बरसाता है ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर सूर्य के समान है, यह उपमाध्वनि है। मूर्द्धा के समान, ककुत् के समान, इस प्रकार लुप्तोपमा है, अथवा अग्नि में मूर्द्धत्व तथा ककुत्त्व का आरोप होने से रूपकालङ्कार है। अग्नि में ककुत्त्व का आरोप शाब्द तथा द्युलोक में वृषभत्व का आरोप आर्थ है, अतः एकदेशविवर्ती रूपक है ॥७॥
भावार्थ
जैसे सूर्य सौरलोक का मूर्धातुल्य, द्युलोक का कुब्ब-तुल्य और भूमि का पालनकर्त्ता है, वैसे ही हमारे द्वारा उपासना किया जाता हुआ यह परमेश्वर सकल ब्रह्माण्ड का शिरोमणि है, उज्ज्वल नाना नक्षत्रों से जटित द्युलोक का अधिपति है और विविध पर्वत, नदी, नद, सागर, सरोवर, लता, वृक्ष, पत्र, पुष्प आदि की शोभा से युक्त भूमण्डल का पालक है। वही सूर्य के समान आकाश में स्थित मेघजलों को भूमि पर बरसाता है। अतः वह सबका धन्यवाद-योग्य है ॥७॥
पदार्थ
(अयम्-अग्निः-मूर्धा) यह परमात्माग्नि लोकत्रय—पृथिवी अन्तरिक्ष द्युलोक की अग्नियों में मूर्धारूप है उनके ऊपर शासक है और उनका भी प्रकाशक है, अपितु (दिवः ककुत्) द्युलोक का उच्च भाग जो प्रकाशक सूर्य है वह गौण है यह परमात्मा ही उच्च प्रकाशक है “योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म्। खं ब्रह्म” [यजुः॰ ४०.१७] सूर्य में जो प्रकाशक पुरुष है सो वह ओ३म् व्यपाक ब्रह्म है। एवं (पृथिव्याः पतिः) पृथिवी पर जो भौतिक अग्नि है वह गौण है यही परमात्मा अग्नि-अग्रणेता है “तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” [मुण्डक॰ २.१०] उस परमात्मा के प्रकाशमान होने से सब प्रकाशमान होता है उसी की ज्योति से सब चमकता है (अपां रेतांसि जिन्वति) और जो अन्तरिक्ष के “आपः-अन्तरिक्षम्” [निघं॰ १.३] जलों को “रेतः-उदकनाम” [निघं॰ १.१२] प्रेरित करती है विद्युत् अग्नि सो वह भी गौण प्रेरक है वह भी यह परमात्मा ही है प्रेरक है।
भावार्थ
संसार में प्रकाश और ताप गुणों का आधार अग्नितत्त्व है, वह पृथिवी पर अग्नि नाम से, अन्तरिक्ष में विद्युत् नाम से और द्युलोक में सूर्य नाम से है, परन्तु इन तीनों अग्नियों का प्रकाशक और तापप्रद तीनों लोकों में वर्तमान परमात्मा ही है उसे ही सब ज्योतियों का ज्योति, अग्नियों का अग्नि मान और जानकर उसकी उपासना करें इन जड़ अग्नियों की नहीं॥७॥
विशेष
ऋषिः—विरूपः (परमात्मा को विविध प्रकार से रूपित निरूपित करने वाला उपासक)॥<br>
विषय
शिखर पर
पदार्थ
(अग्निः )= जीवन तो वह है जो अपने को आगे ले-चलता है [अग्रे नयति ] । आगे कहाँ तक? (मूर्धा)=शिखर तक, जो चोटी पर पहुँचकर ही दम लेता है। उनकी सारी साधना शिखर पर पहुँचने के लिए होती है। किसके शिखर पर ? (दिवः ककुत्)= ज्ञान के शिखर पर। वह व्यक्ति ज्ञानरूप पर्वत के शिखर पर पहुँचने का प्रयत्न करता है। मनुष्य का लक्ष्य वस्तुतः यही होना चाहिए कि वह अपने ज्ञान को चरम सीमा तक ले चले ।
ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही (पतिः पृथिव्याः अयम्)= यह इस पार्थिव शरीर का पति बना है। जो भी इस (पार्थिव)= भौतिक शरीर की भौतिक वासनाओं को संयम में रखता है, वही अपने ज्ञान को बढ़ाने में समर्थ होता है। संयम के अभाव में ज्ञान - वृद्धि सम्भव नहीं। किसी
इस संयम-यज्ञ की सिद्धि के लिए वह (अपां रेतांसि जिन्वति)= जल - देवता के अंशावतार ['आप: रेतो भूत्वा' - ऐतरेय] अर्थात् वीर्य का अपव्यय नहीं करता - ब्रह्मचर्य का धारण करता है। यही तो ब्रह्म की ओर जाने का मार्ग है। यह व्यक्ति सांसारिक व्यवहारों की सिद्धि के लिए धनादि का अर्जन करता हुआ इस ज्ञान के शिखर पर पहुँचनेरूप महान् लक्ष्य को कभी नहीं भूलता। इसका जीवन अन्य मनुष्यों के जीवन से एक विशेषता लिये हुए होता है, क्योंकि इसका जीवन विशिष्ट रूपवाला होता है, अतः यह 'विरूप' कहलाता है। यही इस मन्त्र का ऋषि है।
भावार्थ
मानव जीवन का लक्ष्य ज्ञान-पर्वत के शिखर पर पहुँचना है-इसी के लिए उसे संयमी बनना है।
पदार्थ
शब्दार्थ = ( अयम् अग्निः ) = यह प्रकाशमान जगदीश्वर ( मूर्द्धा ) = सर्वोत्तम है ( दिवः ककुत्) = प्रकाश की टाट है। जैसे बैल की टाट= कोहान-सा ऊँची होती हैं ऐसे ही परमेश्वर का प्रकाश अन्य सब प्रकाशों से श्रेष्ठ है ( पृथिव्याः पतिः ) = पृथिवी आदि सब लोकों का पालक है । ( अपाम् ) = कर्मों के ( रेतांसि ) = बीजों को ( जिन्वति ) = जानता है।
भावार्थ
भावार्थ = आप परम पिताजी सबसे ऊँचे, सबसे श्रेष्ठ प्रकाशस्वरूप, सबके कर्मों के साक्षी और फलप्रदाता हैं। ऐसे आप जगत्पिता प्रभु को सदा अति समीपवर्ती जान, हम सबको पापों से रहित होना, सदाचार और आपकी भक्ति में सदा तत्पर रहना चाहिये ।
विषय
परमेश्वर की स्तुति
भावार्थ
भा० = ( अयम् ) = यह ( अग्निः ) = अग्नि ( मूर्धा ) = सब का शिरोमणि, ( दिवः ककुत् ) = द्यौलोक या सूर्य के ककुद् भाग के समान उत्तम, वहन करने वाला, आश्रय और (पृथिव्याः पतिः ) = पृथिवी का पति स्वामी है । वही ( अपाम् ) = सब लोकों के ( रेतांसि ) = बीजभूत समस्त स्थावर और जंगम प्राणियों को ( जिन्वति ) = तृप्त करता है, जीवन देता है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - विरूप:।
छन्द: - गायत्री।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ सूर्यदृष्टान्तेन परमात्मनो महिमानं वर्णयन्नाह।
पदार्थः
प्रथमः—परमात्मपरः। (अग्निः) सर्वाग्रणीः परमेश्वरः (मूर्द्धा२) शरीरे मूर्द्धवत् जगतः शिरोमणिभूतः, (दिवः) प्रकाशमयस्य द्युलोकस्य (ककुत्३) सर्वोन्नतः स्वामी, किञ्च (पृथिव्याः) भूमेः (पतिः) पालकः वर्त्तते। (अयम्) एष परमेश्वरः (अपाम्४) अन्तरिक्षस्य। आप इत्यन्तरिक्षनाम। निघं० १।३। (रेतांसि) जलानि। रेत इत्युदकनाम। निघं० १।१२। (जिन्वति) प्रेरयति, वृष्ट्या भूलोकं प्रापयतीत्यर्थः। जिन्वतिः गतिकर्मा। निघं० २।१४ ॥ अथ द्वितीयः—सूर्याग्निपरः। (अग्निः) प्रकाशकः सूर्याग्निः (मूर्द्धा) त्रिलोक्याः शिर इव, (दिवः) द्युलोकरूपस्य वृषभस्य (ककुत्) ककुदिव, (पृथिव्याः) भूमेश्च (पतिः) पालकः स्वामी वर्त्तते। अयम् (अपाम्) अन्तरिक्षस्य (रेतांसि) उदकानि (जिन्वति) भूमौ प्रेरयति ॥७॥ अत्र श्लेषालङ्कारः। परमेश्वरः सूर्य इवेत्युपमाध्वनिः। मूर्द्धेव ककुदिव इति लुप्तोपमम्। यद्वा अग्नौ मूर्ध्नः ककुदश्चारोपाद् रूपकालङ्कारः। अग्नौ ककुत्त्वारोपः शब्दः, दिवि वृषभत्वारोप आर्थः, तेनैकदेशविवर्त्ति रूपकम् ॥७॥५
भावार्थः
यथा सूर्यः सौरजगतो मूर्धेव, द्युलोकस्य ककुदिव, भूमेश्च पालकोऽस्ति तथैवाऽस्माभिरुपास्यमानोऽयं परमेश्वरः सकलब्रह्माण्डस्य शिरोमणिः, प्रोज्ज्वलन्नानानक्षत्रजालजटितस्य द्युलोकस्याधिपतिः, विविधपर्वतनदीनदसागरसरोवरलताविटपिपत्र- पुष्पादिसुषमासमन्वितस्य भूमण्डलस्य पालकश्चाऽस्ति। स एव सूर्यवदन्तरिक्षस्थानि मेघजलानि भूमौ वर्षयति। अतः स सर्वेषां धन्यवादार्हः ॥७॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।४४।१६, य० ३।१२, १५।२०, साम० १५३२। २. अग्निः मूर्धा। लुप्तोपममिह द्रष्टव्यम् मूर्धानमिव। यादृशं मनुष्याणां शिरः सर्वाङ्गानां प्रधानं तादृशः प्रधानः स्वामीत्यर्थः—इति वि०। मूर्द्धा धारकः—इति भ०। ३. ककुत् एतदपि लुप्तोपमम्। ककुदमिव। यथा बलीवर्दस्य ककुदं प्रधानं तादृशः प्रधानः—इति वि०। दिवः ककुत् उच्छ्रितः—इति भ०। ४. अपां रेतांसि। आप इत्यन्तरिक्षनाम, रेत इत्युदकनाम। अन्तरिक्षस्य सारभूतानि उदकानि, अथवा अपां वीर्याणि वृष्ट्यादीनि जिन्वति तर्पयति प्रीणयति—इति भ०। अपां रेतांसि स्थावरजङ्गमात्मकानि भूतानि जिन्वति प्रीणयति—इति सा०। ५. दयानन्दर्षिणा मन्त्रोऽयं य० ३।१२ इत्यत्र श्लेषेण परमेश्वरपक्षे भौतिकाग्निपक्षे च व्याख्यातः, य० १५।२० इत्यत्र च भौतिकाग्निपक्षे।
इंग्लिश (4)
Meaning
The self-same God is the Head of all, Pre-eminent like the Sun, the Master of Earth, and the Knower of the seeds of deeds.
Translator Comment
Griffith translates Apam as waters, whereas it means action. Pt. Jaidev Vidyalankar translates the latter half of the verse as ‘God grants life to the animate and inanimate creation of all the worlds.
Meaning
This Agni is the highest lord and master of all on top of heaven and earth and gives energy and sustenance to the seeds of life in the waters of the universe. (Rg. 8- 44-16)
Translation
Omniscient God is like the Head of heaven. He is also the Lord of the earth He quickens the waters’ seed i. e. causes the rain to flow through lightning and feeds all creatures in all worlds. He is the Prime Mover of the inert matter. He is the Giver of the fruits of all actions,
Translation
The fire-divine is the head (of Nature’s bounties), the summit of the heaven, the lord of the earth, it sustains the seed of aquatic life. (Cf. S. 1532; Rv VIII.44.16)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अयम् अग्निः मूर्धा) એ પરમાત્મા અગ્નિ લોકત્રય - પૃથિવી, અન્તરિક્ષ અને દ્યુલોકની અગ્નિઓમાં મૂર્ધા = શીર્ષરૂપ છે, તેનો શાસક છે અને તેનો પણ પ્રકાશક છે ; (दिवः ककुत्) દ્યુલોકના મૂર્ધ ઊંચ ભાગનો પ્રકાશક જે સૂર્ય છે, તે ગૌણ છે, તેનો પરમાત્મા જ ઉંચ્ચ પ્રકાશક છે; સૂર્યમાં જે પ્રકાશક પુરુષ છે, તે ‘ओ३म्’ વ્યાપક બ્રહ્મ છે.
(पृथिव्याः पतिः) પૃથિવી પર જે ભૌતિક અગ્નિ છે, તે ગૌણ છે, એ જ પરમાત્મા અગ્નિ-અગ્રણી છે ‘‘तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (મુંડક-૨.૧૦) - “તે પરમાત્માના પ્રકાશથી સર્વ પ્રકાશમાન બને છે, તેની જ જ્યોતિથી સર્વ પ્રકાશિત થાય છે.
(अपां रेतांसि जिन्वति) અને જે અંતરિક્ષના "आपः अन्तरिक्षम्’’ (निघं० १.३) જળને "रेतः उदकनाम'' (निघं૦ १.१२) પ્રેરિત કરનારી વિદ્યુરૂપ અગ્નિ છે, તે પણ ગૌણ પ્રેરક છે, તેનો પ્રેરક પણ પરમાત્મા જ છે. (૭)
भावार्थ
ભાવાર્થ : સંસારમાં પ્રકાશ અને તાપ ગુણોનો આધાર અગ્નિતત્ત્વ છે, તે પૃથિવી પર અગ્નિ નામથી, અન્તરિક્ષમાં વિદ્યુત્ નામથી અને ધુલોકમાં સૂર્ય નામથી પ્રસિદ્ધ છે; પરન્તુ તે ત્રણેય અગ્નિઓનો પ્રકાશક અને તાપપ્રદ ત્રણેય લોકોમાં વિદ્યમાન પરમાત્મા જ છે, તેને જ સર્વ જ્યોતિની જ્યોતિ, અગ્નિઓનો અગ્નિ માનીને તથા જાણીને તેની ઉપાસના કરવી જોઈએ પરંતુ જડ અગ્નિઓની ન કરવી જોઈએ. (૭)
उर्दू (1)
Mazmoon
دُنیا کے بیج کو بوبے والا
Lafzi Maana
(ایّم اگنی موُردھا) دُنیا کے اندھکار کو مٹانے والی یہ روشن آگ سنسار کا شرومنی یا ہیڈ ہے (دِواککُہ) دئیو لو کی سب سے اونچی چوٹی گیان شِکھر (پِرتھوّیاپتی) پرتھوی کا سوامی پالک (ایام ریتانسی) سب لوکوں کے بیج روُپ سے جان کر سب کو کرم پھل سے ترپت کرتا اور جڑ چیتن سنسار کو جنم دیتا ہے۔
Tashree
تشریح: وہ مُجسم اگنی مالکِ ارض وسما ہے، جو مادی دُنیا کو اپنی روشنی سے پُرنور کرتا رہتا ہے۔ (1) زمینی آگ جو لکڑی وغیرہ سے جلائی جاتی ہے (3) آسمانی آگ (خلا میں) بجلی اور (3) دئیو لوک کی آگ سوُرج۔ یہ تینوں اُسی کی دی ہوئی آگ سے روشن ہیں (کٹھ اُپنشد اور یجر وید آخری منتر) وہی مادی دُنیا کو پیدا کر کے سب کو کرم پھل دینے سے زندگی بخشتا ہے۔
बंगाली (1)
পদার্থ
অগ্নির্মূর্দ্ধা দিবঃ ককুৎপতিঃ পৃথিব্যা অয়ম্।
অপাং রেতাংসি জিন্বতি।।৮।।
(সাম ২৭)
পদার্থঃ (অয়ম্ অগ্নিঃ) এই প্রকাশমান জগদীশ্বরই (মূর্দ্ধা) সর্বশ্রেষ্ঠ (দিবঃ ককুৎ) প্রকাশের উৎস। পরমেশ্বরই (পৃথিব্যাঃ পতিঃ) পৃথিবী আদি সব লোক লোকান্তরের পালক। পরমেশ্বর সকল (অপাম্) কর্মের (রেতাংসি) উৎসরূপ বীজকে (জিন্বতি) জানেন।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ হে ঈশ্বর! তুমিই পরম পিতা, সর্বোত্তম, সর্বশ্রেষ্ঠ, প্রকাশ স্বরূপ, সকলের কর্মের সাক্ষী এবং কর্মফল প্রদাতা। এইরূপ জগৎপিতা জগদীশ্বরকে সদা সমীপবর্তী জেনে আমাদের সবার পাপ রহিত হওয়া, সদাচারী হওয়া এবং তাঁর প্রতি ভক্তিতে সদা তৎপর থাকা উচিত ।।৮।।
मराठी (2)
भावार्थ
जसा सूर्य सौरलोकाच्या मस्तकाप्रमाणे, द्यूलोकाचे पोक (कुबड) असल्याप्रमाणे व भूमीचा पालनकर्ता आहे. तसेच आमच्या द्वारे उपासना केलेला परमेश्वर संपूर्ण ब्रह्मांडाचा शिरोमणी आहे. उज्ज्वल नक्षत्रांनी जडित द्यूलोकाचा अधिपती आहे व विविध पर्वत, नदी, नद, सागर, सरोवर, लता, वृक्ष, पत्र, पुष्प इत्यादी शोभिवंत भूमंडळाचा पालक आहे. तोच सूर्याप्रमाणे आकाशस्थित मेघजलाची भूमीवर बरसात करतो. त्यामुळे सर्वांनी धन्यवाद करावे, असा तो आहे. ॥७॥
विषय
आता सूर्याच्या उदाहरणावरून परमेश्वराच्या महिमेचे वर्णन करीत आहेत. -
शब्दार्थ
प्रथम अर्थ (परमात्मपरक) (अग्नि:) सर्वांचा अग्रनेता परमेश्वर (मूर्द्धा) शरीरात मूर्ध्दा जशी सर्वोच्च तसा शिरोमणीआहे. तो (दिव:) प्रकाशमान द्युलोका (ककुत्) सर्वोततम (पर्वताच्या सर्वोच्च शिखराप्रमाणे) सर्वोत्तम स्वामी आहे. आणि (पृथिव्या:) भूमीचा (पति:) पालनकर्ता स्वामी आहे. तो (अपाम्) अंतरिक्षातील (रेतांसि) जल (जिन्वति) भूमीवर आणतो, वृष्टी करतो. द्वितीय अर्थ : (सूर्यपरक) (अग्नि:) प्रकाशक सूर्यरूप अग्नी (मूर्द्धा) त्रिलोकीत शिराप्रमाणे आहे. (दिवा) द्युलोकरूप बैलाच्या (ककुत्) प्रमाणे आहे आणि (पृथिव्या:) भूमीचा (पति:) पालनकर्ता स्वामी आहे. तो (अपाम्) अंतरिक्षातील (रेतांसि) जल (जिन्वति) भूमीवर बरसण्यासाठी प्रेरित करतो वा पाऊस पाडतो. ।।७।। या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. परमेश्वर सूर्यासमान आहे, या कथनात उपमाध्वनी आहे. मूर्द्धासम आणि ककुत्सम, मूर्द्धा आणि ककुत् येथे लुप्तोपमा आहे. अथवा या ठिकाणी अग्नीत मूर्द्धत्व आणि ककुत्वाचा आरोप असल्यामुळे येथे रूपक अलंकारही होत आहे. अग्नीवर ककुत्वाचा आरोप शाब्द म्हणजे विशिष्ट शब्दावर आधारित शाब्द रूपक असून द्युतोकावर वृषभत्वाचा आरोप असल्यामुळे येथे एकादेशवर्ती रूपकही मानता येतो. ।।७।।
भावार्थ
जसा सूर्य सौरलोकाच्या मूर्द्धेप्रमाणे द्युलोकाच्या कुबजप्रमाणे (कुब्बड) आणि भूमीचा पालनकर्ता आहे, तद्वत आम्ही ज्या ईश्वराचीउपासना करतो, तो परमेश्वर सकळ ब्रह्मांडाचा शिरोमणी आहे, नाना उज्ज्वल नक्षत्रांनी सजलेल्या द्युलोकांचा अधिपती आहे आणि विविध पर्वत, नदी, नद, सागर, सरोवर, लता, वृक्ष, पत्र, पुष्प आदींनी सुशोभित या भूमंडळाचा पालक आहे. तो परमेश्वरच सूर्याप्रमाणे आकाशस्थित मेघजलाला पृथ्वीवर आणतो. म्हणून त्याला सर्वांनी धन्यवाद दिले पाहिजेत. ।।७।।
तमिल (1)
Word Meaning
(அக்னி) தலைவனாகும், சோதியுலகத்தின் உயர்ந்த நிலையாவான். (பூமியின்) தலைவன். அவன் சகல (சலம் ரேதசுகளை) திருப்தியாக்குகிறான்.
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