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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 318
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
29
इ꣢न्द्रं꣣ न꣡रो꣢ ने꣣म꣡धि꣢ता हवन्ते꣣ य꣡त्पार्या꣢꣯ यु꣣न꣡ज꣢ते꣣ धि꣢य꣣स्ताः꣢ । शू꣢रो꣣ नृ꣡षा꣢ता꣣ श्र꣡व꣢सश्च꣣ का꣢म꣣ आ꣡ गोम꣢꣯ति व्र꣣जे꣡ भ꣢जा꣣ त्वं꣡ नः꣢ ॥३१८॥
स्वर सहित पद पाठइ꣡न्द्र꣢꣯म् । न꣡रः꣢꣯ । ने꣣म꣡धि꣢ता । ने꣣म꣢ । धि꣣ता । हवन्ते । य꣢त् । पा꣡र्याः꣢ । यु꣣न꣡ज꣢ते । धि꣡यः꣢꣯ । ताः । शू꣡रः꣢꣯ । नृ꣡षा꣢꣯ता । नृ । सा꣣ता । श्र꣡व꣢꣯सः । च । ꣣ का꣡मे꣢꣯ । आ । गो꣡म꣢꣯ति । व्र꣣जे꣢ । भ꣣ज । त्व꣢म् । नः꣣ ॥३१८॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत्पार्या युनजते धियस्ताः । शूरो नृषाता श्रवसश्च काम आ गोमति व्रजे भजा त्वं नः ॥३१८॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्द्रम् । नरः । नेमधिता । नेम । धिता । हवन्ते । यत् । पार्याः । युनजते । धियः । ताः । शूरः । नृषाता । नृ । साता । श्रवसः । च । कामे । आ । गोमति । व्रजे । भज । त्वम् । नः ॥३१८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 318
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 9;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 9;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।
पदार्थ
(इन्द्रम्) वीर परमात्मा वा राजा को (नरः) प्रजाजन (नेमधिता) आन्तरिक वा बाह्य संग्राम में और यज्ञ में (हवन्ते) सहायतार्थ पुकारते हैं। (पार्याः) पार होने योग्य वे, आन्तरिक और बाह्य विघ्नों को पार करने के लिए (यत्) जिस साधन का (युनजते) उपयोग करते हैं (ताः) वे (धियः) बुद्धियाँ और कर्म हैं, अर्थात् बुद्धि और कर्म का अवलम्बन करके वे सब शत्रुओं और विघ्नों को पार करते हैं। हे परमात्मन् वा राजन् ! (शूरः) शूरवीर (त्वम्) आप (नृषाता) संग्राम में (यशसः च) और यश की (कामे) अभिलाषा-पूर्ति में, और (गोमति व्रजे) प्रशस्त भूमि, वाणी, इन्द्रिय, दुधार गायों आदि के समूह में (नः) हमें (आ भज) भागी बनाइए, अर्थात् आप हमारी यशस्वी होने की कामना को पूर्ण कीजिए तथा हमें पृथिवी का राज्य, वाणी का बल, इन्द्रियों का बल और उत्तम जाति की गायें आदि प्राप्त कराइए ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥६॥
भावार्थ
परमात्मा की कृपा, राजा की सहायता एवं अपने बुद्धिकौशल तथा पुरुषार्थ से शत्रु-विजय, परम कीर्ति, भूमण्डल का साम्राज्य आदि सब अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं ॥६॥
पदार्थ
(नरः) देव जन—मुमुक्षु जन “नरो ह वै देवविशः” [जै॰ १.८९] (नेमधिता) शुभ-अशुभ वर्गों की स्थिति—संग्राम प्रवृत्ति में “नेमोऽर्द्धनाम” “त्वो नेम इत्यर्द्धस्य” [निरु॰ ३.२०] “नेमधिता संग्रामनाम” [निघं॰ २.१७] (इन्द्रं हवन्ते) परमात्मा को आहूत करते हैं—आमन्त्रित करते हैं (तत्) ‘यतः’ (ताः-पार्थाः-धियः-युनजते) उन विरुद्ध—प्रवृत्ति संग्रामों में अशुभ प्रवृत्तियों से पार करने वाली या अशुभ प्रवृत्तियों को परे फेंकने वाली योगक्रियाओं को युक्त करते हैं (त्वम्) तू (शूरः) विक्रमी (नृषाता) देवश्रेणि के मनुष्यों—मुमुक्षुओं का स्वभोग का सम्भागी बनने वाला (च) और (श्रवसः कामः) यशस्वी जन को चाहने वाला “श्रवः-श्रवणीयं यशः” [निरु॰ ११.९] (नः-गोमति व्रजे-आभज) स्तोता वाले व्रज—“गौः स्तोतृनाम” [निघं॰ ३.१६] छन्दोमय—मन्त्रभाग में “छन्दाꣳसि वै व्रजो॰” [मै॰ ४.१.१०] समन्तरूप से भागी बना।
भावार्थ
देवजन आगे विभक्त हुए देवासुर संग्राम के अवसर पर परमात्मा को आमन्त्रित करें तब वे असुर वृत्तियों परे फेंक डालने वाली अपनी देववृत्तियों से युक्त होते हैं वह विक्रमी मुक्त आत्माओं को अपने आनन्द का भागी बनाने वाला उन यशस्वी मुक्तात्माओं को चाहता है वह उनके स्तोतृसदन में उन्हें सुख भाक् भी बनाता है॥६॥
विशेष
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला)॥<br>
विषय
संग्राम में विजयी बनेंगे
पदार्थ
नेमधिता शब्द निरुक्त में [ २, १६, १३] संग्राम वाचक है। (नेम) = आधे एक ओर और आधे दूसरी ओर (धिता) = रक्खे होते हैं, सम्भवतः इसलिए यह शब्द संग्राम के लिए प्रयुक्त हुआ है। कुछ दैवी वृत्तियाँ एक ओर हैं, और दूसरी आसुर वृत्तियाँ दूसरी ओर । एवं इनका भी यह दैवासुर संग्राम शाश्वतकाल से मानव हृदयस्थली में चला आ रहा है। जो (नरः) = [नृ नये] अपने को आगे ले-चलन की वृत्तिवाले लोग होते हैं वे इस संग्राम में (इन्द्रं हवन्ते) = प्रभु को पुकारते हैं। प्रभु की सहायता से ही तो उन्हें विजय प्राप्त होगी। वासनाएँ तो बड़ी प्रबल हैं। इन्हें जीतना अत्यन्त दुष्कर है। परन्तु (यत्) = जब ये नर (ताः पार्या: धियः युनजते) = उन शत्रुओं से पार होने के निश्चयवाली बुद्धियों को अपने में युक्त करते हैं, अर्थात् इनसे पार पाने का निश्चय कर लेते हैं तो वे प्रभु को पुकारते हैं। ये प्रभु ही वस्तुतः (शूरः) = इन वासनाओं को शीर्ण करनेवाले हैं। ('नृ-षाता') वे ही नरों को विजय-लाभ करानेवाले हैं। इस विजय के द्वारा (श्रवसः च कामः:) = प्रभु हमारा यश चाहते हैं। करते तो सब प्रभु ही हैं, पर जीव को निमित्तमात्र बना उसे वे यशस्वी बनाते हैं।
एक ज्ञानी भक्त इस तत्त्व को समझता है और प्रभु से प्रार्थना करता है कि इस प्रकार वासनाओं को समाप्त करके (नः) = हमें त्वम् - आप (गोमति व्रजे) = प्रशस्त गौओंवाले बाड़े में (आभज) = भागी बनाइए, अर्थात् आपकी कृपा से हमारी इन्दियरूप गौवें वासना क्षेत्रों में चरने न जाकर संयम के बाड़े में निरुद्ध रहें ।
यह इन्द्रियों को संयम के बाड़े में निरुद्ध करनेवाला व्यकित ‘वसिष्ठ' है। बाह्य शत्रुओं को वश में करने की अपेक्षा इन आन्तर शत्रुओं को वश में करना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है–यही वसिष्ठ बनना है। इस वसिष्ठ बनने के लिए ही यह [मैत्रावरुणि] =प्राणापान की साधना करनेवाला बना था।
भावार्थ
प्रभु - स्मरण के साथ दृढ़ निश्चय से हम वासनाओं से युद्ध करेंगे तो प्रभु अवश्य हमें विजय प्राप्त करायेंगे।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( यत् ) = क्योंकि आत्मा ( पार्या: ) = व्यापार, चेष्टा करने वाले या भरणपोषण करने में समर्थ ( धियः ) = ज्ञान और कर्मों की ( युनजते ) = आयोजना, प्रबन्ध करता है इसलिये ( नरः ) = विद्वान् लोग ( इन्द्रम् ) = ऐश्वर्यवान् राजा के समान परमेश्वर या आत्मा को ( नेमधिता ) = संग्राम, यज्ञ, व्यवस्था की स्थापना के अवसर पर ( हवन्ते ) = उसको बुलाते या स्मरण करते हैं।( शूरः) = शूरवीर ( नृषाता ) = मनुष्यों का उचित विभाग करने हारा ( चकमे ) = कामना करने वाले ( गोमतिं व्रजे ) = हमारे अभिलषित गोओं के बाड़े के समान इन्द्रियों से सम्पन्न ब्रज, गोष्ठ या देह में ( त्वं ) = तू ( नः ) = हमें ( श्रवस: ) = अन्न वल आदि ( भज ) = प्राप्त करा ।
टिप्पणी
३१८ - 'शवसश्चकान' इति पाठभेदः, ऋ० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - वसिष्ठ:।
देवता - इन्द्रः।
छन्दः - त्रिष्टुभ् ।
स्वरः - नेवतः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमात्मा राजा च प्रार्थ्यते।
पदार्थः
(इन्द्रम्) वीरं परमात्मानं राजानं वा (नरः) प्रजाजनाः (नेमधिता२) नेमधितौ आन्तरिके बाह्ये च संग्रामे यज्ञे वा। नेमधितिरिति संग्रामनाम। निघं० २।१७। ततः सप्तम्येकवचने ‘सुपां सुलुक्०’ अ० ७।१।३९ इति विभक्तेर्डादेशे तस्य डित्वात् टेर्लोपे रूपम्। (हवन्ते) आह्वयन्ति। (पार्याः३) पारयितव्याः ते, आन्तरिकान् बाह्याँश्च विघ्नान् पारयितुं (यत्) यत् साधनम् (युनजते) उपयुञ्जते ‘श्नसोरल्लोपः। अ० ६।४।१११’ इत्यल्लोपो न भवति छान्दसत्वात्। (ताः धियः) तत् प्रज्ञाः क्रियाश्च भवन्ति। ताः प्रज्ञाः क्रियाश्चावलम्ब्य ते समस्तान् शत्रून् विघ्नादींश्च पारयन्तीत्यर्थः। धीरिति प्रज्ञानामसु कर्मनामसु च पठितम्। निघं० ३।९, २।१। साम्प्रतं प्रत्यक्षकृतमाह। हे परमात्मन् राजन् वा ! (शूरः) पराक्रमशीलः (त्वम् नृषाता४) नृणां पौरुषवतां वीराणां सातिः विजयो यस्मिन् तस्मिन् नृषातौ संग्रामे, तत्र सहायतार्थमिति भावः। नृषातिशब्दात् सप्तम्येकवचने विभक्तेर्डाऽऽदेशः। बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वम्। (श्रवसः च) यशसः च (कामे५) अभिलाषपूर्तौ (गोमति) गावः प्रशस्ताः पृथिवी-वाग्-इन्द्रिय-धेन्वादयः तद्वति तद्युक्ते (व्रजे) समूहे गोष्ठे वा (नः) अस्मान् (आ भज) भागिनः कुरु। अस्माकं यशःकामनां प्रपूरय, अस्मान् पृथिवीराज्यवाग्बलेन्द्रियबलप्रशस्तधेन्वादींश्च प्रापयेत्यर्थः ॥६॥६ अत्र अर्थश्लेषालङ्कारः ॥६॥
भावार्थः
परमात्मनः कृपया, नृपतेः साहाय्येन, स्वकीयबुद्धिकौशलेन, पुरुषार्थेन च शत्रुविजयः, परा कीर्तिः, भूमण्डलसाम्राज्यादिकं च सर्वमपि समीहितं वस्तु प्राप्तुं शक्यम् ॥६॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ७।२७।१ ‘श्रवसश्च काम’ इत्यत्र ‘शवसश्चकान’ इति पाठः। २. नेमधिता नेमधितौ संग्रामे यज्ञे वा—इति भ०। ३. पार्याः पालयितव्याः प्राप्तव्याः—इति वि०। पार्याः पारप्राप्तिनिमित्तभूताः—इति भ०। पार्याः युद्धे भरणनिमित्तभूताः—इति सा०। पार्याः पालनीयाः इति ऋ० ७।२७।१ भाष्ये द०। सर्वैरेव पार्याः इति धियः इत्यस्य विशेषणं स्वीकृतम्। ४. नृषाता, नरो मनुष्याः ऋत्विग्लक्षणाः ते सन्यन्ते संभज्यन्ते यत्र स नृषातिर्यज्ञः। वन षण सम्भक्तौ इत्यस्येदं रूपम्—इति वि०। नृषाता नृसातौ नृणां सातौ लाभे—इति भ०। नृषाता, नृणां सम्भक्ता—इति सा०। नरः सीदन्ति यस्मिंस्तस्मिन् नृसातौ—इति ऋ० ७।२७।१ भाष्ये द०। ५. सायणः ‘च कामे’ इत्यस्य स्थाने ‘चकाने’ इत्येकं पदं मत्वा व्याख्याति—‘चकाने चकामे काम्यमाने सति’ इति। ६. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिणाऽयं मन्त्रः ‘कीदृशो राजा कमनीयोऽस्तीति’ विषये व्याख्यातः।
इंग्लिश (2)
Meaning
In life’s struggle men invoke God, and utilise His powers of deliberation and action. The Valiant God is the Suppressor of hostile passions, the Distributor of knowledge to mankind, and is Resplendent with knowledge. O God, in the cloud of ignorance, be our companion!
Meaning
Leading people call upon Indra, lord ruler of the world, in their serious struggles of life and pray for those concentrative faculties of mind and intelligence by which they can join the divine presence and win their goal. The lord is the brave, generous and fearless leader of humanity in their corporate life, lover of strength and inspirer of heroic souls. O lord, give us the grace of your divine presence and lead us in our development of lands and cows and in our plans of education, enlightenment and our vision of the divine Word. (Rg. 7-27-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (नरः) દેવજન-મુમુક્ષુજન (नेमधिता) શુભ-અશુભ વર્ગોની સ્થિતિ-સંગ્રામની પ્રવૃત્તિમાં (इन्द्र हवन्ते) પરમાત્માને આહુત કરે છે-આમંત્રિત કરે છે (तत्) ત્યારે (ताः पार्थाः धियः युनजते) તેની વિરુદ્ધ પ્રવૃત્તિ સંગ્રામોમાં અશુભ પ્રવૃત્તિઓને પાર કરનારી અથવા અશુભ પ્રવૃત્તિઓને દૂર ફેંકનારી યોગ ક્રિયાઓને યુક્ત કરે છે. (त्वम्) તું (शूरः) વિક્રમી (नृषाता) દેવ શ્રેણીના મનુષ્યો-મુમુક્ષુઓના સર્વભોગના સંભાગી બનનાર (च) અને (श्रवसः कामः) યશસ્વીજનને ચાહનાર (न गोमतिः व्रजे आभज) સ્તોતાવાળા છંદોમય-મંત્રભાગમાં સમગ્રરૂપથી ભાગી બને છે. (૬)
भावार्थ
ભાવાર્થ : દેવજન આગળ વિભક્ત થયેલા દેવાસુર સંગ્રામના અવસર પરમાત્માને આમંત્રિત કરે, ત્યારે તે અસુર વૃત્તિઓને દૂર ફેંકનારી પોતાની દેવવૃત્તિઓથી યુક્ત બને છે. તે વિક્રમી મુક્ત આત્માઓને પોતાના આનંદના ભાગી બનાવનાર તે યશસ્વી મુક્તાત્માઓને ચાહે છે. તે તેના સ્તોતૃગૃહમાં તેને સુખ ભાગી પણ બનાવે છે. (૬)
उर्दू (1)
Mazmoon
نیکی اور بدی کے جھگڑے میں بھگوان سہائی
Lafzi Maana
(نیم دھتا) اندر ہی اندر جب نیکی اور بدی کا سنگرام چل رہا ہو تو (نرہ اندرم ہونتے) اپنے کو راہِ راست پر لے جانے والا آدمی بھگوان کو پکارتا ہے، (یت پار یاہ تاہ دِھیہ یُنجتے) جب کہ بُرائیوں کو یوگی جن یوگ کے ذریعے پار کر لیتے ہیں، کب؟ جب اُپاسکوں میں (شردسہ کامے) یش کی کامنا جاگ جائے، تب (نرشاتا شُور) اپنے بھگتوں کو طاقت دینے میں شُور پرمیشور! (نہ) آپ ہمیں (گومتی ورجے آبھیج) بھگت جنوں میں آگے کیجئے۔
Tashree
جھگڑا یہ نیکی بدی کا چلتا اندر آدمی کے، کامنا سے یش کی یوگی جَن میں اُسکے پار ہوتے۔
मराठी (2)
भावार्थ
परमेश्वराची कृपा, राजाचे साह्य व आपले बुद्धिकौशल्य आणि पुरुषार्थाने शत्रु-विजय, परम कीर्ती, भूमंडलाचे साम्राज्य इत्यादी सर्व अभीष्ट वस्तू प्राप्त करू शकता येतात ॥६॥
विषय
परमेश्वर आणि नृपतीला प्रार्थना -
शब्दार्थ
(इन्द्रम्) वीर परमेश्वराला वा राजाला (नरः) उपासक /प्रजानन (नेमधिता) आंतरिक /बाह्य संग्रामामध्ये आणि यज्ञामध्ये (हवन्ते) साह्यासाठी हाक मारतात. (पार्याः) पार होण्यासाठी (युद्धात विजय प्राप्तीसाठी) ते लोक आंतरिक व बाह्य बाधा पार करण्यासाठी (यत्) ज्या साधनांचा (युनजते) उपयोग करतात, (ताः) ती साधने आहेत (धियः) बुद्धी आणि कर्म म्हणजे बुद्धी आणि कर्माचे अवलंब करून ते लोक सर्व शत्रूंना आणि विघ्नांना परास्त करतात. हे परमेश्वर /राजा, (शूरः) शूरवीर से आपण (नृषाताः) संग्रामामध्ये (यशसःच) यशाच्या आणि (कामे) अभिलाषांच्या पूर्ततेसाठी तसेच (गोमति व्रजे) प्रशस्त भूमी, वाणी, इंद्रिये, दुधदुभत्या गायी आदींविषयी (नः) आम्हाला (आभज्) समृद्ध करा. अर्थात आम्ही विसफल होण्यासाठी तुम्ही आमच्या सर्व कामना पूर्ण करा तसेच पृथ्वीचे राज्य, वाणीचे बळ, इंद्रियांची शक्ती आणि उत्तम जातीच्या गायी आम्हाला द्या. ।। ६।।
भावार्थ
परमेश्वराची कृपा आणि राजाकडून होणारे साह्य याद्वारे आपापल्या बुद्धि कौशल्य व पुरुषार्थाने सर्व जण विजय प्राप्त करू शकतात. कीर्ती व भूमंडल- साम्राज्य तसेच इतरही इच्छित वस्तू प्राप्त करू शकतात. ।। ६।।
विशेष
या मंत्रात अर्थश्लेष अलंकार आहे. ।। ६।।
तमिल (1)
Word Meaning
காக்கப்படும் செயல்களைச் செய்ய மனிதர்கள் இந்திரனை யுத்தத்தில் அழைக்கிறார்கள். (இந்திரனே!) (சூரனே!) மனிதர்களால் (பஜிக்கப்படுபவனே!) விருப்பத்தில் (பசுக்களின்) நிலயங்களின் பாகத்தை எங்களுக்கு அளிக்கவும்.
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