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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 323
    ऋषिः - द्युतानो मारुतः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    24

    अ꣡व꣢ द्र꣣प्सो꣡ अ꣢ꣳशु꣣म꣡ती꣢मतिष्ठदीया꣣नः꣢ कृ꣣ष्णो꣢ द꣣श꣡भिः꣢ स꣣ह꣡स्रैः꣢ । आ꣢व꣣त्त꣢꣫मिन्द्रः꣣ श꣢च्या꣣ ध꣡म꣢न्त꣣म꣢प꣣ स्नी꣡हि꣢तिं नृ꣣म꣡णा꣢ अध꣣द्राः꣢ ॥३२३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣡व꣢꣯ । द्र꣣प्सः꣢ । अ꣣ऽशुम꣡ती꣢म् । अ꣣तिष्ठत् । ईयानः꣢ । कृ꣣ष्णः꣢ । द꣣श꣡भिः꣢ । स꣣ह꣡स्रैः꣢ । आ꣡व꣢꣯त् । तम् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । श꣡च्या꣢꣯ । ध꣡म꣢꣯न्तम् । अ꣡प꣢꣯ । स्नी꣡हि꣢꣯तिम् । नृ꣣म꣡णाः꣢ । नृ꣣ । म꣡नाः꣢꣯ । अ꣣धत् । राः꣢ ॥३२३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अव द्रप्सो अꣳशुमतीमतिष्ठदीयानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः । आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः ॥३२३॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अव । द्रप्सः । अऽशुमतीम् । अतिष्ठत् । ईयानः । कृष्णः । दशभिः । सहस्रैः । आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नीहितिम् । नृमणाः । नृ । मनाः । अधत् । राः ॥३२३॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 323
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 4; मन्त्र » 1
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 10;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में यह विषय है कि पापादि रूप असुरों से आक्रान्त जीवात्मा का कैसे उद्धार होता है।

    पदार्थ

    (द्रप्सः) जल की बूँद के समान अणुरूप जीवात्मा (अंशुमतीम्) चक्षु आदि इन्द्रिय, प्राण और मन से युक्त देहपुरी में (अव-अतिष्ठत्) स्थित होता है, अर्थात् संचित कर्मों के फल भोगने के लिए और नवीन कर्म करने के लिए परमात्मा से प्रेरित होकर देहपुरी में आता है। (कृष्णः) काला तमोगुण (दशभिः सहस्रैः) दस हजार योद्धाओं के साथ अर्थात् अपने-अपने गणों सहित अनेकों काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि रिपुओं के साथ (इयानः) उस आत्मा पर आक्रमण कर देता है। तब (धमन्तम्) तरह-तरह की पैंतरे-बाजी करते हुए अथवा साँस फेंकते हुए (तम्) सैन्यसहित उस काले तमोगुण पर (इन्द्रः) जीवात्मा का सहायक परमैश्वर्यवान् परमात्मा (शच्या) उत्कृष्ट ज्ञान वा कर्म के साथ (आवत्) झपटता है। तदनन्तर (नृमणाः) सज्जनों पर ध्यान व प्रेम रखनेवाला वह परमात्मा (स्नीहितिम्) तमोगुण की उस हिंसक सेना को (अप) भगाकर, आत्मा में (राः) सद्गुणरूप सम्पत्तियों को (अधत्) आधान कर देता है। अभिप्राय यह है कि जब-जब देहधारी जीवात्मा पर तमोगुणरूप कृष्णासुर आक्रमण करता है, तब-तब इन्द्र परमात्मा उसका उससे उद्धार कर देता है ॥१॥

    भावार्थ

    देह में स्थित जीवात्मा को काम, क्रोध आदि अनेक दानव पीड़ित करना चाहते हैं, जिनका पराजय उसे अपने पुरुषार्थ द्वारा और परमात्मा की सहायता से करना चाहिए। तभी वह आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्यों को प्राप्त कर सकता है॥१॥ इस मन्त्र पर सायण इस प्रकार ऐतिहासिक अर्थ लिखते हैं—‘‘पहले कभी कृष्ण नामक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के किनारे ठहरा हुआ था। वहाँ जंगल के मध्य में स्थित उस कृष्णासुर के पास इन्द्र बृहस्पति के साथ पहुँचा। आकर उसने उस कृष्णासुर को और उसके अनुचरों को बृहस्पति की सहायता से मार ड़ाला था।’’ यह सब वृतान्त अप्रामाणिक ही है, क्योंकि वेदों में लौकिक इतिहास नहीं है। इस इतिहास की यदि आध्यात्मिक, आधिदैविक, अधियज्ञ या अधिभूत व्याख्या की जाए तो संगति लग सकती है, जैसे हमने अपनी व्याख्या में आध्यात्मिक अर्थ की दिशा प्रपंचित की है ॥ अपनी मति से चारों वेदों का अंग्रेजी भाषा में टिप्पणीसहित अनुवाद करनेवाले ग्रिफिथ महोदय ने इस मन्त्र पर टिप्पणी में लिखा है कि यहाँ ‘कृष्ण द्रप्स’ अन्धकारावृत चन्द्रमा है, और अंशुमती अन्तरिक्ष की कोई रहस्यमय नदी है, दस हजार असुर अन्धकार-रूप दानव हैं, जिनके वध के पश्चात् चन्द्रमा अन्धकार से मुक्त हो जाता है। ग्रिफिथ का यह लेख आधिदैविक व्याख्या की ओर एक संकेत है ॥

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    पदार्थ

    (द्रप्सः-कृष्णः) अल्प—अणुपरिमाण वाला—अणु जीवात्मा “स्तोको वै द्रप्सः” [गो॰ २.२.१२] पापभावना वाला हुआ “एतद्वै पाप्मनो रूपं यत् कृष्णम्” [मै॰ २.५.६] (ईयानः) गति करता हुआ (दशभिः सहस्रैः) दस सहस्र नाडीतन्तुओं से युक्त (अंशुमतीम्) प्राणों वाली नगरी—देहपुरी को “प्राणाः वा अंशवः” [मै॰ ४.५.५] (अवातिष्ठत्) अवस्थित हुआ—प्राप्त हुआ (तं धमन्तम्) उस अर्चना करते हुए को—परमात्मा की स्तुति करते हुए को “धमति-अर्चतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] (नृमणाः-इन्द्रःशच्या-आवत्) नरों मुमुक्षुजनों में मन—कल्याण चिन्तना वाला “नरो वै देवविशः” [जै॰ १.८९] ऐश्वर्यवान् परमात्मा प्रज्ञान से उसको सुरक्षित करता है—(अध) अनन्तर इसकी (स्नीहितिम्) वध करने वाली पाप वासना को “स्नेहति वधकर्मा” [निघं॰ २.१९] ततः क्तिन् प्रत्ययः। (अधद्राः) पृथक् भगाता है—दूर करता “द्राति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] या रोन्धता है, नष्ट करता है।

    भावार्थ

    अणु—जीवात्मा पापाचरणवश हो सहस्रों नाड़ी तन्तुओं से युक्त प्राणों वाली देहपुरी को भटकता हुआ प्राप्त होता है देह धारण करता रहता है, जब यह परमात्मा की स्तुति करता है तो परमात्मा ज्ञान देकर इसकी रक्षा करता है और इसकी हानिकारक पापवासना को भी भगा देता है या नष्ट कर देता है, कारण कि वह उपासक मुमुक्षुजनों में कल्याण भावना रखने वाला है॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—द्युतानः (परमात्मप्रकाश का अपने अन्दर विस्तार करने वाला उपासक)॥ छन्दः—त्रिष्टुम्॥<br>

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    विषय

    ज्ञान - नदी से दूर

    पदार्थ

    (द्रप्स:) = [Dripping] जो व्यक्ति बारम्बार विषयसमुद्र में डूब जाता है, प्रयत्न करता है-परन्तु फिर-फिर असफल हो जाता है वह 'द्रप्स : ' है। यह 'द्रप्स' (अंशुमतीम्) = ज्ञान की किरणोंवाली, ज्ञानरूप जल की धारावाली इस नदी से (अव) = दूर ही (अतिष्ठत्) = ठहरता है। यह तो (ईयान:) = इधर-उधर भटकता ही रहता है। क्योंकि (दशभिः सहस्त्रैः) = दसों हजारों अर्थात् अनन्त वासनाओं से यह सदा (कृष्णः) = आकृष्ट होता रहता है। वासनाओं में उलझा हुआ वह ज्ञान की ओर झुकाववाला नहीं होता। इसे तो विषय ही अंशुमान्- चमकते हुए नजर आते हैं। यह उन्हीं पर लट्टू हुआ रहता है- उन्हीं का शिकार बन जाता है।

    जब कभी यह ठोकर लगने पर इनसे ऊपर उठने का निर्णय करता है तो (शच्या) = [शचीप्रज्ञा व कर्म] अपनी शक्ति व ज्ञान के अनुसार (धमन्तम्) = हाथ-पैर पटकते हुए को, आलस्य को छोड़कर तपस्वी बनते हुए (तम्) = उसे (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (आवत्) = बचाता है-इन वासनाओं के आक्रमणों से सुरक्षित करता है। जीव प्रयत्न करता है तो प्रभु भी सहायता करते हैं।

    (अध) = अब, जीव के प्रयत्न करने पर ही (नृमणः) = [नृषु मनो यस्य] अपने को आगे ले-चलनेवालों पर कृपादृष्टि करनेवाले प्रभु (स्नीहितिम्) = इन खा- जानेवाली कामादि वासनाओं को (अप-द्राः) = दूर भगा देते हैं।

    प्रभु की उपस्थिति का अभिप्राय प्रभु के ज्ञान को अपने में द्योतित करनेवाला व्यक्ति ‘द्युतान' है। इस ज्ञान को अपने में उत्पन्न करने के लिए प्राणों की साधना करता है। प्राण 'मरुत' हैं अतः ययह ‘मारुत' कहलाता है।

    भावार्थ

    विषयों में फँसे रहकर हम ज्ञान से दूर ही रहेंगे। ज्ञान प्राप्ति के लिए इनसे ऊपर उठकर हम प्राणों की साधना करें।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( द्रप्स: ) = द्रवणशील, गतिमान् ( कृष्णः ) = विलेखन संकर्षण या संन्निकर्ष करने हारा मुख्य प्राण ( दशभिः ) = अर्थों को प्रकाशित करने हारे ( सहस्रैः ) = वेगवान् प्राणों सहित ( इयानः ) = गति करता हुआ ( अंशुमतीम् ) = व्यापनशील चेतना से युक्त  चितिशक्ति  का ( अव अतिष्ठत् ) = आश्रय लेता है । ( इन्द्र ) = आत्मा ( शच्या धमन्तम् ) = अपनी शक्ति  द्वारा श्वास प्रश्वास लेते हुए ( तम् ) = उसको ( आवत् ) = प्राप्त होता है ( नृमणाः ) = सब नरों में मनन शक्ति रूप वह आत्मा ( स्नीहितं  ) = अवघात करते हुए उस प्राण को ( अप अध द्राः ) = नीचे अंगों में भी प्रेरित करता है ।

    प्राण की गति को अपान तथा अन्यान्य अधोगामी स्थानों में प्रेरण करने में आत्मा के संकल्प ही कारण है। इसको सायणादि भाष्यकारों ने कृष्णासुर को मारने की कथा गढ़ कर लगाया है, वह  असंगत है । 

    टिप्पणी

    ३२३ - 'स्नेहितीनृमणा' इति ऋ० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - तिरश्चीद्युतानो मारुतः वा ।

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - त्रिष्टुभ्।

    स्वरः -  नेवतः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पापादिरूपैरसुरैराक्रान्तस्य जीवात्मनः कथमुद्धारो भवतीत्याह।

    पदार्थः

    (द्रप्सः) जलबिन्दुः, जलबिन्दुवद् अणुरूपो जीवात्मा इत्यर्थः (अंशुमतीम्२) अंशवः चक्षुरादीन्द्रियाणि प्राणो मनश्च तद्वतीं देहपुरीम्। प्राण एवांशुः, चक्षुरेवांशुः। मनो ह वांशुः। श० ११।५।९।२। (अव-अतिष्ठत्) प्राप्नोति, संचितकर्मणां फलानि भोक्तुं, नूतनानि कर्माणि च कर्तुं परमात्मना प्रेरितः देहपुरीम् आगच्छतीति भावः। (कृष्णः) कृष्णवर्णसूचितः तमोगुणः (दशभिः सहस्रैः) दशसहस्रसंख्यकैः योद्धृभिः बहुभिः सगणैः कामक्रोधलोभमोहमदमत्सरादिरिपुभिरित्यर्थः, तम् देहाधिष्ठितम् आत्मानम् (इयानः) आक्रामन् भवति। ईङ् गतौ इत्यस्माल्लिटि ‘लिटः कानज् वा’ अ० ३।२।१०६ इति कानचि रूपम्। ततः (धमन्तम्) विविधां गतिं हिंसां वा कुर्वाणं, बहुविधम् उच्छ्वसन्तं वा। धमतिः गतिकर्मा वधकर्मा च। निघं० २।१४, २।१९। यद्वा ध्मा शब्दाग्निसंयोगयोः इति धातोः ‘पाघ्राध्मा०’ अ० ७।३।७८ इत्यनेन धमादेशे रूपम्। (तम्) ससैन्यं कृष्णं तमोगुणम् (इन्द्रः) जीवात्मनः सहायकः परमैश्वर्यवान् परमात्मा (शच्या) प्रज्ञया कर्मणा च। शचीति प्रज्ञानाम कर्मनाम च। निघं० ३।९, २।१। (आवत्) प्राप्नोति। अवतेर्गत्यर्थस्य लङि रूपम्। ततः (नृमणाः) नृषु सत्पुरुषेषु मनः ध्यानं प्रेम वा यस्य तादृशः स इन्द्रः परमात्मा (स्नीहितिम्) तस्य कृष्णाख्यस्य तमोगुणस्य हिंसित्रीं शत्रुसेनाम्। स्नेहयतिः वधकर्मा। निघं० २।१९। (अप) अपगमय्य। उपसर्गमात्रप्रयोगे योग्यक्रियाध्याहारो भवतीति वैदिकी शैली। तस्मिन्नात्मनि (राः३) रायः सद्गुणरूपसम्पत्तीः (अधत्) दधाति। दधातेर्लुङि, आकारस्य ह्रस्वत्वम् छान्दसम्। अस्मिन् मन्त्रे अवातिष्ठत्, आवत्, अधत् इति भूतकालप्रयोगः ‘छन्दसि लुङ्लङ्लिटः’ अ० ३।४।६ इति नियमेन सार्वकालिको ज्ञेयः। यदा यदा देहधारिणं जीवात्मानं तमोगुणरूपः कृष्णासुरः आक्रामति, तदा तदा इन्द्रः परमात्मा तं तस्मादुद्धरतीत्यर्थः ॥१॥

    भावार्थः

    देहाधिष्ठितं जीवात्मानं कामक्रोधादयोऽनेके दानवाः पीडयितुमागच्छन्ति, येषां पराभवस्तेन स्वपुरुषार्थद्वारा परमात्मसाहाय्येन च कर्त्तव्यः, तदैव स आध्यात्मिकानि भौतिकानि चैश्वर्याणि प्राप्तुमर्हति ॥१॥ अस्मिन् मन्त्रे ऐतिहासिकमर्थमाविष्कुर्वन् सायण एवमाह—“अत्रेतिहासमाचक्षते। पुरा किल कृष्णो नामासुरो दशसहस्रसंख्यकैरसुरैः परिवृतः सन् अंशुमतीनामधेयाया नद्यास्तीरे अतिष्ठत्। तत्र तं कृष्णम् उदकमध्ये स्थितम् इन्द्रो बृहस्पतिना सहागच्छत्। आगत्य तं कृष्णं तस्यानुचरांश्च बृहस्पतिसहायो जघानेति४।” तत्सर्वं वृत्तमप्रामाणिकमेव, वेदेषु लौकिकेतिहासस्यासद्भावात्। अस्येतिहासस्याध्यात्मिकम् आधिदैविकम् अधियज्ञम् अधिभूतं वा व्याख्यानं चेत् क्रियते तदा तु समञ्जसमेव, यथास्माभिः स्वव्याख्यानेऽध्यात्मदिक् प्रपञ्चिता ॥ चतुर्णां वेदानाम् स्वमत्याऽऽङ्ग्लभाषायां सटिप्पणमनुवादको ग्रिफिथमहोदयस्तु टिप्पण्यामेव लिखति यदत्र ‘कृष्णः द्रप्सः’ अन्धकारावृतश्चन्द्रमा वर्तते, अंशुमती चान्तरिक्षस्था काचिद् रहस्यमयी नदी। दशसहस्रसंख्यका असुराः सन्ति अन्धकारदानवाः, येषां वधमनु चन्द्रमा अन्धकारमुक्तो जायते।५ एतत्तस्य व्याहरणम् आधिदैविकीं व्याख्यां संकेतयति ॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।९६।१३, ऋषिः तिरश्चीराङ्गिरसो द्युतानो वा मारुतः। ‘अप स्नेहितीर्नृमणा अधत्तं इति पाठः। २. अंशुमती नाम नदी—इति वि०, भ०। ३. अस्माभिः ‘अधत् राः’ इति पदपाठमनुसृत्य व्याख्यातम्। सायणस्तु ‘अधद्राः’ इत्यस्य स्थाने ‘अपद्राः’ इति मत्वा व्याचष्टे—‘अपद्राः’ द्रातिः कुत्सितगतिकर्मा, सर्वस्य हिंसित्रीं तस्य सेनाम् स इन्द्रः अपगमयत् अवधीदित्यर्थः। विवरणकारस्तु ‘अव’ इत्युपसर्गम् ‘अधत्’ इत्यनेन योजयन् ‘अव अधत् आधत्ते, दधातेर्धारणार्थस्येदं रूपम्, अवरुद्धवानित्यर्थः’ इति व्याख्यातवान्। तेन ‘राः’ इति पदस्य किमपि व्याख्यानं न कृतम्। भरतस्तु ‘अध, द्राः’ इति विच्छिद्य ‘अथ तदानीम् द्राः द्रातिः कुत्सितगतिकर्मा, लुङि रूपम्’, ‘द्राः’ इति। सिप् अन्तर्गतण्यर्थः अपगमयतीत्यर्थः—इति व्याचख्यौ। ४. भरतोऽप्याह—कृष्णनामानम् असुरं च इन्द्रः जघान, तत्प्रकारोऽत्र कीर्त्यते—इति। ५. The Black Drop: the darkened Moon. Ansumatic: A mystical river of the air into which the Moon dips to recover its vanished light. Ten thousand: probably, demons of darkness; the numbers are without a substantive—Griffith.

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The black but alluring sentiment of sin, marching forth with its tern and thousands of propensities, over-powers the strength of mind. The soul with its power of knowledge and action, catches hold of that sin. Soul, the reflective power in all men, subjugates that terrible demon.

    Translator Comment

    Sayana Interprets the word Krishna as Lord Krishna of Gita. Griffith, translates Ansumati as a mystic river of the air. These interpretations are inadmissible, as the Vedas are free from historical reference.

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    Meaning

    The dark passion of pride with its ten thousand assistants and associates comes, occupies the affections and suppresses the emotive and creative streams of life, but Indra, noble leader of men, the soul, with its great thought and action, takes this bully over, controls its violence and covers it with sweetness and love. (Rg. 8-96-13)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (द्रप्सः कृष्णः) અલ્પ-અણુપરિમાણવાળા — અણુ જીવાત્મા પાપ ભાવના યુક્ત બનીને (ईयानः) ગતિ કરતો (दशभिः सहस्रैः) દશહજાર નાડી તંતુઓથી યુક્ત બનીને (अंशुमतीम्) પ્રાણોવાળી નગરીદેહપુરીને (अवातिष्ठत्) અવસ્થિત-પ્રાપ્ત થાય છે (तं धमन्तम्) તે અર્ચના કરનાર-પરમાત્માની સ્તુતિ કરનારને (नृमणाः इन्द्रः शच्या आवत्) નરો મુમુક્ષુજનોમાં મન-કલ્યાણ ચિંતનવાળા ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મા પ્રજ્ઞાનથી તેને સુરક્ષિત કરે છે, (अध) નિરંતર તેને (स्नीहितिम्) નાશ કરનારી પાપવાસનાને (अधद्राः) દૂર ભગાડે છે. પૃથક કરે છે અથવા નષ્ટ કરે છે. (૧)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : અણુ-જીવાત્મા પાપ આચરણને કારણે હજારો નાડી તંતુઓથી યુક્ત પ્રાણોવાળી દેહપુરીમાં ભટકતો પ્રાપ્ત થાય છે-દેહ ધારણ કરે છે, જ્યારે તે પરમાત્માની સ્તુતિ કરે છે, ત્યારે પરમાત્મા તેને જ્ઞાન આપીને તેની રક્ષા કરે છે અને તેની હાનિકારક પાપવાસનાને પણ ભગાડી દે છે અથવા નષ્ટ કરે છે, કારણ કે તે ઉપાસક મુમુક્ષુજનોમાં કલ્યાણની ભાવના રાખનાર છે. (૧)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    بُرے خیالات کو اِیشور دبا دیتا ہے!

    Lafzi Maana

    یوگ ابھیاس سے من میں پیدا (انشُومتی م) نیک خیالات (شُبھ چِت وِرتیاں) کو بار بار (کرشنہ درپسہ دی نہ) خیالاتِ بدآ آ کر تنگ کرتے رہتے ہیں اور چِت میں (دش بھی سہسری اواتشِٹھت) بے شمار شکلیں بنا کر آٹھہرتی ہیں (دھمنتم تم سنیہتم) سانپ کی طرح چھنکارتی ہوئیں ناش کرنے والی کالی چِت وِرتیوں و (نرمناہ اندر) بھگتوں کا پیارا بھگوان (پشچیا اپ آادت ادھ درا) اپنی خصوصی طاقت سے ہٹا کر دور بھگا دیتا ہے۔

    Tashree

    یوگ کے ابھیاس سے پیدا ہوئے جو نیک فال، روک رستہ بیچ میں وارد ہوئے آید خیال، آ گئے بھگوان رکھشا میں دِیا اُن کو نکال۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    देहात स्थित जीवात्म्याला काम, क्रोध इत्यादी अनेक दानव त्रस्त करू इच्छितात. आपल्या पुरुषार्थाने व परमेश्वराच्या साह्याने त्यांचा पराभव करावा लागतो. तेव्हाच तो आध्यात्मिक व भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त करू शकतो. ॥१॥

    टिप्पणी

    या मंत्राचा सायण ऐतिहासिक अर्थ लावतात - ‘‘पूर्वी कृष्ण नावाचा असुर दहा हजार असुरांबरोबर अंशुमती नावाच्या नदीच्या किनारी थांबला होता. तेथे जंगलाच्या मध्यभागी स्थित त्या कृष्णासुराजवळ इंद्र बृहस्पतीबरोबर पोचला. त्याने कृष्णासुर व त्याच्या अनुचरांना बृहस्पतीच्या साह्याने मारून टाकले होते.’’ हा सर्व वृत्तांत अप्रमाणिक आहे. कारण वेदामध्ये लौकिक इतिहास नाही. या इतिहासात जर आध्यात्मिक, आधिदैविक, अधियज्ञ किंवा अधिभूत व्याख्या केल्यास संगती लागू शकते. जसा आम्ही आपल्या व्याख्येत आध्यात्मिक अर्थ दर्शविलेला आहे. आपल्या बुद्धीने चारही वेदांचा इंग्रजी भाषेत अनुवाद करणाऱ्या ग्रिफिथ महाशयांनी या मंत्राच्या अर्थामध्ये लिहिलेले आहे की, ‘कृष्ण द्रस’ अंधकारावृत चंद्र आहे व अंशुमती अंतरिक्षातील एखादी रहस्यमय नदी आहे. दहा हजार असुर अंधकाररूपी दानव आहेत. ज्यांच्या वधानंतर चंद्रमा अंधकारातून मुक्त होतो. ग्रिफिथ हा लेख आधिदैविक व्याख्येकडे संकेत आहे.

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    विषय

    पाप आदी असुरांपासून त्रस्त जीवात्म्याच्या उद्धाराचा उपाय

    शब्दार्थ

    (द्रप्सः) पाण्याच्या थेंबाप्रमाणे अणुरूप सलेला आत्मा (अंशुमतीम्) चक्षु आदी इंद्रियें, प्राणशक्ती आणि मनू हे सर्व सोबत घेऊन या देहपुरीत (अव अतिष्ठत्) येऊन स्थित होतो म्हणजे जेव्हा तो आपले संचित कर्मांचे फल भोगण्यासाठी आणि नवीन कर्मे करण्यासाठी परमेश्वराच्या प्रेरणेने या शरीरात येतो, तेव्हा (कृष्णः) काळे तमोगुण आपल्या (दशमिः सहस्रैः) दह हजार योद्धांसह अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मोह, मय, मत्सर या आपल्या सहकारी तामसिक दुर्गुणांसह (शत्रुसैनिकांसह) त्या आत्म्यावर (इयावः) आक्रमण करतो. तेव्हा आत्मा (धमन्तम्) वेगवेगळे पवित्रे घेत अथवा जोराने प्र श्वास फेकत (तम्) त्या आपल्या सैन्यासह आक्रमण करीत येणाऱ्या काळ्या तमोगुणावर (आवत्) झपाट्याने तुटून पडतो. यानंतर (नृमणाः) सज्जनांकडे लक्ष देणारा आणि त्यांना प्रेम करणारा परमात्मा (स्नीहितम्) तमोगुणाच्या त्या सैन्याला (सप) पळवून लावतो आणि आत्म्यात (राः) सद्गुणरूप संपदा (अधत्) स्थापित करतो. तात्पर्य की जेव्हा देहधारी जीवात्म्यावर तमोगुणरूप कृष्ण- असुर आक्रमण करतो, त्या त्या वेळी परमात्मा त्याचे रक्षण करून संकटापासून वाचवतो.।। १।।

    भावार्थ

    या शरीरात स्थित जीवात्म्याला काम, क्रोध, आदी अनेक दानव त्रास देण्याचा प्रयत्न करतात. अशा वेळी माणसाने आपल्या पुरुषार्थाद्वारे आणि परमेश्वराच्या साह्याने त्या दानवांचा पराभव केला पाहिजे. असे केल्यानेच तो आध्यात्मिक व भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त करू शकतो. ।। १।। या मंत्रावर भाष्य करताना सायणाचार्य मंत्राचा अशा प्रकारे त्तिहासपर अर्थ करतात. ङ्गङ्घकधी एके काळी कृष्ण नावाचा एक असुर दहा हजार असुर सैनिकांसह अंशुमती नदीकाठी वास्तव्य करून होता. अरण्यात असलेल्या त्या कृष्णासुराजवळ बृहस्पतीसह इंद्र त्या ठिकाणी गेला व त्याने बृहस्पतीच्या साह्याने कृष्णासुराला व त्याच्या सैनिकांना ठार केले.फफ हे सर्व वर्णन प्रमाणाविरुद्ध आहे. कारण की वेदांमध्ये लौकिक इतिहास नाही. अशा प्रकारच्या इतिहासाचे वा कथेचे आध्यात्मिक, आधिदैविक, अधियज्ञ अथवा अधिभूत विश्लेषण वा व्याख्यान केले, तर मंत्राची थोडी फार संगती लावता येते. आम्ही वर जो अर्थ दिला आहे, त्यामध्ये आध्यात्मिक अर्थ वा व्याख्या केली असल्यामुळे तो अर्थ दिशा दिग्दर्शक मानावा. इंग्रज विद्वान ग्रिफिथ यांनी आपल्या विचाराप्रमाणे चारही वेदांचा इंग्रजीत (टीपांसह) अनुवाद केला आहे. या मंत्रावर टिप्पणी करताना ते लिहितात की येथे ङ्गकृष्ण द्रप्सफ म्हणजे अंधकाराने चंद्र हा अर्थ अपेक्षित आहे आणि अंशुमती अंतरिक्षात असलेली कोणती तरी गूढ अज्ञात नदी असावी. दहा हजार असुर म्हणजे अंधकाररूप दानव असावेत. त्यांच्या वधानंतर चंद्रमा अंधकार मुक्त होतो. ग्रिफिथचा हा लेख एका दृष्टीने सुंदर आधिदैविक व्याख्यान आहे.।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    (கருமையான) துளி (தச சகஸ்ரங்களோடு) துரிதமாய்ச்சென்று அம்சுமதியில் (சேதன நிலையத்தில்) நிலையாயுள்ள [1]பெருஞ் சப்தஞ்செய்வதான அதை (இந்திரன்) அடைகிறான். வீரமனத்துடனான மன்னன் அவன் சத்துரு சேனைகளை அழிக்கிறான்.

    FootNotes

    [1]பெருஞ் சப்தம் - கணக்கில்லாமல்

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