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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 337
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    26

    यं꣢ वृ꣣त्रे꣡षु꣢ क्षि꣣त꣢य꣣ स्प꣡र्ध꣢माना꣣ यं꣢ यु꣣क्ते꣡षु꣢ तु꣣र꣡य꣢न्तो ह꣡व꣢न्ते । य꣡ꣳ शूर꣢꣯सातौ꣣ य꣢म꣣पा꣡मुप꣢꣯ज्म꣣न्यं꣡ विप्रा꣢꣯सो वा꣣ज꣡य꣢न्ते꣣ स꣡ इन्द्रः꣢꣯ ॥३३७

    स्वर सहित पद पाठ

    य꣢म् । वृ꣣त्रे꣡षु꣢ । क्षि꣣त꣡यः꣣ । स्प꣡र्ध꣢꣯मानाः । यम् । यु꣣क्ते꣡षु꣢ । तु꣣र꣡य꣢न्तः । ह꣡व꣢꣯न्ते । यम् । शू꣡र꣢꣯सातौ । शू꣡र꣢꣯ । सा꣣तौ । य꣢म् । अ꣣पा꣢म् । उ꣡प꣢꣯ज्मन् । उ꣡प꣢꣯ । ज्म꣣न् । य꣢म् । वि꣡प्रा꣢꣯सः । वि । प्रा꣣सः । वाज꣡य꣢न्ते । सः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥३३७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यं वृत्रेषु क्षितय स्पर्धमाना यं युक्तेषु तुरयन्तो हवन्ते । यꣳ शूरसातौ यमपामुपज्मन्यं विप्रासो वाजयन्ते स इन्द्रः ॥३३७


    स्वर रहित पद पाठ

    यम् । वृत्रेषु । क्षितयः । स्पर्धमानाः । यम् । युक्तेषु । तुरयन्तः । हवन्ते । यम् । शूरसातौ । शूर । सातौ । यम् । अपाम् । उपज्मन् । उप । ज्मन् । यम् । विप्रासः । वि । प्रासः । वाजयन्ते । सः । इन्द्रः ॥३३७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 337
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 5; मन्त्र » 6
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 11;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में इन्द्र का परिचय प्रस्तुत किया गया है।

    पदार्थ

    प्रथम—राजा के पक्ष में। (वृत्रेषु) अविद्या, भ्रष्टाचार आदियों के व्याप्त हो जाने पर (स्पर्धमानाः) उन पर विजय पाना चाहते हुए (क्षितयः) प्रजाजन (यं हवन्ते) जिस जननायक को पुकारते हैं, (युक्तेषु) किन्हीं महान् कर्मों के प्रारम्भ करने पर (तुरयन्तः) कार्यसिद्धि के लिए शीघ्रता करते हुए प्रजाजन (यं हवन्ते) जिस कार्यसाधक को पुकारते हैं, (शूरसातौ) शूरों को विजयोपलब्धि करानेवाले संग्राम में (यं हवन्ते) जिस वीर को पुकारते हैं, (अपाम्) सरोवर, नहर आदियों के (उपज्मन्) निर्माण के लिए (यं हवन्ते) जिस राष्ट्रनिर्माता को पुकारते हैं, (विप्रासः) ज्ञानी ब्राह्मण लोग (यं वाजयन्ते) जिसे अपना परामर्श देकर बलवान् करते हैं, (सः) वह दुःखविदारक, सुखप्रदाता राजा (इन्द्रः) इन्द्र कहाता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (वृत्रेषु) योगमार्ग में व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि विघ्नों के उपस्थित होने पर (स्पर्धमानाः) उन्हें जीतने की इच्छावाले योगीजन (यं हवन्ते) जिस सहायक को पुकारते हैं, (युक्तेषु) इन्द्रिय, मन, प्राण आदियों के योग में लग जाने पर (तुरयन्तः) योगसिद्धि पाने के लिए शीघ्रता करते हुए योगीजन (यं हवन्ते) जिस सिद्धिप्रदाता को पुकारते हैं, (शूरसातौ) आन्तरिक देवासुर-संग्राम के उपस्थित होने पर (यं हवन्ते) जिस विजयप्रदाता को पुकारते हैं, (अपाम्) प्राणों के (उपज्मन्) उपरले-उपरले चक्र में चंक्रमण करने के निमित्त (यं हवन्ते) जिस योगक्रियाओं में सहायक को पुकारते हैं, (यम्) और जिसकी (विप्रासः) ज्ञानी योगीजन (वाजयन्ते) अर्चना करते हैं, (सः) वह धारणा-ध्यान-समाधि से प्राप्तव्य परमेश्वर (इन्द्रः) इन्द्र कहलाता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥

    भावार्थ

    वेदों में इन्द्र नाम से जिसका बहुत स्थानों पर वर्णन है, वह विघ्नविदारक, आरम्भ किये कार्यों में सिद्धिप्रदायक, देवासुरसंग्रामों में विजयप्रदाता, जलधाराओं को प्रवाहित करानेवाला, ज्ञानीजनों की स्तुति का पात्र ब्रह्माण्ड में परमेश्वर तथा राष्ट्र में राजा है। उनकी यथायोग्य उपासना प्रार्थना और सत्कार से अभीष्ट लाभ सबको उनसे प्राप्त करने चाहिएँ ॥६॥ इस मन्त्र पर विवरणकार ने यह अपनी कल्पना से ही घड़ा हुआ इतिहास लिखा है कि इन्द्र के अत्यन्त भक्त होने के कारण इन्द्र का रूप धारण किये हुए वामदेव ऋषि को जब असुर पकड़कर मारने लगे तब वह इस मन्त्र को कह रहा है कि इन्द्र मैं नहीं हूँ, इन्द्र तो ऐसा-ऐसा है। इसी प्रकार का इतिहास ‘स जनास इन्द्रः’ इस प्रकार इन्द्र का परिचय देनेवाले, गृत्समद ऋषि से दृष्ट ऋग्वेदीय द्वितीय मण्डल के १२वें सूक्त पर गृत्समद के नाम से किन्हीं लोगों ने कल्पित कर लिया था, जो सायण के ऋग्वेदभाष्य में उद्धृत है। यह सब प्रामाणिक नहीं है, किन्तु कथाकारों का लीलाविलास है ॥

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    पदार्थ

    (वृत्रेषु) विविध पापप्रसङ्गों में (स्पर्द्धमानाः-क्षितयः) उन पापों के साथ संघर्ष करते हुए मनुष्य “क्षितयो मनुष्याः” [निघं॰ २.३] (यम्) जिसको (हवन्ते) आमन्त्रित करते हैं (युक्तेषु) युक्त—ठीक—पुण्यों के प्रसङ्गों में (तुरयन्तः) शीघ्रता करते हुए पुण्य जन “तुर-शीघ्रतायाम्” [जुहोत्यादि॰] पुकारते हैं—आमन्त्रित करते हैं (शूरसातौ यम्) शूर—पराक्रमी सौभाग्यशालीजनों की लाभ प्राप्ति में जिसको शूर—सौभाग्यशीलजन आमन्त्रित करते हैं—स्मरण करते हैं (विप्रासः) ऋषि जन “एते वै विप्रा यदृषयः” [श॰ १.४.२.८] (ज्मन्-अपाम्-उप) पृथिवी पर “ज्मा पृथिवीनाम” [निघं॰ १.१] जलों के समीप “अपां समीपे नियतो नैत्यिकं विधिमास्थितः” [मनुस्मृतौ] (यं वाजयन्ते) जिसको अर्चित करते हैं “वाजयति-अर्चति कर्मा” [निघं॰ ३.१४] (सः-इन्द्रः) वह परमात्मा ही अर्चनीय—उपास्य है।

    भावार्थ

    हम पाप प्रसङ्गों में पापों से संघर्ष करते हुए परमात्मा को आमन्त्रित करें, उससे बल माँगें, पुण्य कर्मों में शीघ्र आचरित करने के लिये पुण्य जन पर परमात्मा को स्मरण करें, सौभाग्य की प्राप्ति में परमात्मा को सौभाग्यशील आमन्त्रित करें उस परमात्मा को पाने के लिये ऋषिजन पृथिवी पर जलों स्रोतों के समीप उस की अर्चना-स्तुति करते हैं॥६॥

    विशेष

    ऋषिः—वामदेवः (वननीय उपासनीय देव वाला)॥<br>

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    विषय

    जिसे सभी पुकारते हैं

    पदार्थ

    निरुक्त [२-१०-२७] में वृत्र धन का नाम है। वृत्र जो वरा है—धन को कौन नहीं वरता? अध्यापन, याजन व प्रतिग्रह से ब्राह्मण धन को लेने में लगा है, क्षत्रिय तो अधिकारी है ही, वह तो औरों से धन ले ही लेता है। वैश्य का लक्ष्य ही धन है - शूद्र भी एक रुपये के लिए इतना परिश्रम कर रहा है। धन के बिना किसी का काम नहीं चलता, अतः (क्षितयः) = इस पृथिवी पर निवास करनेवाले [क्षि= निवास] सभी मनुष्य- विशेषतः वैश्य (स्पर्धमानाः) = परस्पर स्पर्धा करते हुए, एक दूसरे से अधिक और अधिक धन जुटा पाने की कामना करते हुए (वृत्रेषु) = धनों के निमित्त (वाजयन्तः) = धन चाहते हुए (यम) = जिसे (हवन्ते) = पुकारते हैं (सः) = वह (इन्द्रः) = प्रभु हैं- हम परमैश्वर्यशाली हैं। प्रत्येक वैश्य प्रभु-स्मरण के साथ अपने कार्य को प्रारम्भ करता है और प्रार्थना करता है कि तन्मे (भूयो भवतु माकनीयः) = मेरा व्यापार में लगा धन बढ़ता ही चले।

    (युनक्त सीराः) = हलों को जोतो - इस वेदाज्ञा को क्रियान्वित करते हुए कृषक हलों को जोतते हैं और (युक्तेषु) = हलों के जोते जाने पर (तुरयन्त:) = 'तुर - तुर' ध्वनि से बैलों को चलाते हुए (वाजयन्तः) = (अन्न की कामनावाले ये कृषक) यम्-जिसे (हवन्ते) = पुकारते हैं, (सः) = वह (इन्द्र:) = वृष्टि का अधिष्ठातृदेव इन्द्र है। कृषक का तो मन्त्र ही है कि प्रभु बरसेंगे तभी तो अन्न प्राप्त होगा।

    (शूरसातौ) = संग्रामों में (यम्) = जिसे (वाजयन्तः) = शक्ति की कामना करते हुए पुकारते हैं (सः) = वह (इन्द्रः) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभु हैं।

    अन्त में (विप्रासः) = ब्राह्मण लोग (वाजयन्तः) = त्याग की भावना को अपने में उत्पन्न करना चाहते हुए अपाम कर्मों को (उपज्मन्) = करने के समय यम्-जिसे (हवन्ते) = पुकारते हैं (स:) वह (इन्द्र:) = सब शक्तिशाली कर्मों का अधिष्ठातृदेव परमात्मा हैं। एक ब्राह्मण वस्तुतः यह समझता है कि कर्मों की शक्ति प्रभु की है, मैं तो निमित्तमात्र हूँ, अतः सब कर्मों को ब्रह्म में आहित करके चलता है। इन्द्रः

    क्या वैश्य, क्या कृषक, क्या क्षत्रिय और क्या ब्राह्मण सभी अपने-अपने धन, अन्न, बल व त्याग आदि उपादेय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए प्रभु को ही पुकारते हैं। प्रभु को न भूलनेवाला (‘वामदेव व गौतम') = उत्तम गुणोंवाला व प्रशस्त इन्द्रियोंवाला बना रहता है।

    भावार्थ

    कोई भी कर्म करते हुए हम प्रभु को न भूलें। 

    टिप्पणी

    सूचना - मन्त्र के 'वाजयन्ते' पद का अर्थ लट् के स्थान में शतृ करके 'वाजयन्तः' रूप में किया है। लोक मे 'वाजयमानाः' - होता है ।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( यं ) = जिसको ( वृत्रेषु ) = उपद्रव और विप्लवों के अवसर पर या ज्ञान के आवरण करनेहारे कारणों के उपस्थित होने पर ( क्षितय:) = देश निवासी प्रजाएं और देह की इन्द्रियां ( स्पर्द्धमानाः ) = एक दूसरे से बढ़ने की इच्छा करने हारी ( हवन्ते ) = स्तुति करती हैं, ( यं ) = जिसको ( युक्तेषु ) = संग्रामों में या योगक्रियाओं में योगरत पुरुषों के बीच ( तुर यन्तः ) = परस्पर हिंसा करते हुए या व्युत्थान दशाओं पर विक्षेपों  पर विजय करते हुए साधक ( हवन्ते ) = स्मरण करते हैं । ( यं शूरसातौ ) = जिसे शूरवीरों के संग्राम में स्मरण किया जाता है । ( यम् अपाम् ) = जिस को प्रजाओं के बीच में पुकारा जाता है और ( यम् उपज्मन् ) = जिसको भूमि पर अन्न आदि लाभ के लिये याद किया जाता है और ( यं विप्रासः ) = जिसको ज्ञान के अभिलाषी विद्वान् लोग ( वाजयन्ते ) = स्तुति करते है ( स इन्द्रः ) = वह 'इन्द्र' है ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - वामदेव:।

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - त्रिष्टुभ् । 

    स्वरः - धैवतः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेन्द्रस्य परिचयः प्रस्तूयते।

    पदार्थः

    प्रथमः—राजपरः। (वृत्रेषु) अविद्याभ्रष्टाचारादिषु व्याप्तेषु (स्पर्द्धमानाः) विजिगीषमाणाः (क्षितयः) प्रजाजनाः। क्षितय इति मनुष्यनामसु पठितम्। निघं० २।३। (यं हवन्ते) यं जननायकम् आह्वयन्ति, (युक्तेषु) आरब्धेषु केषुचिन्महत्सु कर्मसु (तुरयन्तः१) कार्यसिद्ध्यर्थं त्वरमाणाः प्रजाजनाः (यं हवन्ते) यं कार्यसाधकम् आह्वयन्ति, (शूरसातौ) शूराणां वीरक्षत्रियाणां सातिः विजयप्राप्तिर्यस्मिन् तस्मिन् संग्रामे उपस्थिते सति। शूरसातौ इति संग्रामनामसु पठितम्। निघं० २।१७। (यम् हवन्ते) यं वीरम् आह्वयन्ति, (अपाम्) कुल्यासरोवरादीनाम् (उपज्मन्२) उपज्मनि उपप्राप्तौ। उप पूर्वाज्जमतेर्गतिकर्मण एतद् रूपम्। निमित्तार्थे सप्तमी। ‘सुपां सुलुक्। अ० ७।१।३९’ इति सप्तम्या लुक्। (यं हवन्ते) यं राष्ट्रनिर्मातारम् आह्वयन्ति, (विप्रासः) ज्ञानिनो ब्राह्मणाः (यं वाजयन्ते) यं स्वपरामर्शदानेन बलिनं कुर्वन्ति। (सः) असौ दुःखविदारकः सुखप्रदो राजा (इन्द्रः) इन्द्रः प्रोच्यते ॥ अथ द्वितीयः—परमात्मपरः। (वृत्रेषु) योगमार्गे व्याधिस्त्यानसंशय- प्रमादालस्यादिषु विघ्नेषु उपस्थितेषु (स्पर्द्धमानाः) तान् विजिगीषमाणाः योगिजनाः (यं हवन्ते) यं सहायकम् आह्वयन्ति, (युक्तेषु) इन्द्रियमनः—प्राणादिषु योगयुक्तेषु सत्सु (तुरयन्तः) योगसिद्ध्यर्थं त्वरमाणाः योगिनः (यं हवन्ते) यं सिद्धिप्रदातारम् आह्वयन्ति, (शूरसातौ) आभ्यन्तरे देवासुरसंग्रामे उपस्थिते (यं हवन्ते) यं विजयप्रदातारम् आह्वयन्ति, (अपाम्) प्राणानाम्। प्राणा वा आपः। तै० ३।२।५।२, तां ब्रा० ९।९।४। आपो वै प्राणाः। श० ब्रा० ३।८।२।४ इति प्रामाण्यात्। (उपज्मन्) ऊर्ध्वोर्ध्वचक्रचङ्क्रमणनिमित्ताय (यं हवन्ते) यं योगक्रियासु सहायकम् आह्वयन्ति, (यम्) यं च (विप्रासः) ज्ञानिनो योगिजनाः (वाजयन्ते) अर्चन्ति। वाजयतिः अर्चतिकर्मा। निघं० ३।१४। (सः) असौ धारणाध्यानसमाधिलभ्यः परमेश्वरः (इन्द्रः) इन्द्रः उच्यते ॥६॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥६॥

    भावार्थः

    वेदेष्विन्द्रनाम्ना यस्य बहुशो वर्णनं वर्वर्ति स खलु विघ्नविदारकः, प्रारब्धकार्येषु सिद्धिप्रदायको, देवासुरसंग्रामेषु विजयप्रदाता, जलधाराणां प्रवाहयिता, विप्राणां स्तुतिपात्रभूतो ब्रह्माण्डे परमेश्वरो राष्ट्रे वा राजा विद्यते। तयोर्यथायोग्यमुपासनया प्रार्थनया सत्कारेण चाभीष्टलाभाः सर्वैः ताभ्यां प्राप्तव्याः ॥६॥ अत्र इन्द्रस्यातिभक्ततया इन्द्ररूपमास्थितः असुरैर्गृहीतो हन्यमानः वामदेवः आह इति विवरणकृत् स्वकल्पनाप्रसूतमितिवृत्तं प्रोवाच। तादृशमेवेतिवृत्तं गृत्समदेन ऋषिणा दृष्टस्य ऋग्वेदीयस्य ‘स जनास इन्द्रः’ इतीन्द्रपरिचयं प्रस्तुवानस्य द्वितीयमण्डलस्थद्वादशसूक्तस्य विषये गृत्समदनाम्मा कैश्चित् कल्पितमस्ति, यत् सायणीये ऋग्वेदभाष्ये समुद्धृतं विलोक्यते। तत्सर्वं न प्रामाणिकं, किन्तु कथाकाराणां लीलाविलसितमेवेति मन्तव्यम् ॥

    टिप्पणीः

    १. तुरयन्तः त्वरमाणाः हिंसन्तो वा शत्रून्—इति वि०। २. अपाम् उपज्मन्। उप पूर्वस्य अज गतिक्षेपणयोरित्यस्येदं रूपम्। आपः समीपे यस्मिन् काले आगच्छन्ति सः अपामुपज्मा वर्षाकालः तस्मिन् अपाम् उपज्मे। उदकार्थं वर्षाकाले यमाह्वयन्तीत्यभिप्रायः—इति वि०। अपाम् उपज्मन् उपगमने प्राप्तौ, वृष्ट्यर्थमित्यर्थः—इति भ०।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    He is God, Whom men in adversity, losing self-control pray. Whom the Yogis overcoming mental confusion remember through Yogic practices. Who is remembered 1>y the heroes on the battle-field. Who is invoked by His subjects, Who is remembered for growing more food. Whom the learned persons laud.

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    Meaning

    Whom people invoke and call in the struggle for light and enlightenment against darkness and evil, that is Indra. Whom they call upon and press forward when the battle is raging, for victory, or when the vision is close to the mind in communion and they yarn for the union, that is Indra. Whom the sages inspire and applaud in the contests of the veterans for scientific achievement, or when the plans for action, water and energy are ripe for the green signal, that is Indra.

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    गुजराती (1)

    पदार्थ


    પદાર્થ : (वृत्रेषु) વિવિધ પાપ પ્રસંગોમાં (स्पर्धमानाः क्षितयः) તે પાપોની સાથે સંઘર્ષ કરતા મનુષ્ય (यम्) જેને (हवन्ते) આમંત્રિત કરે છે. (युक्तेषु) યુક્ત-ઠીક-પુણ્યોના પ્રસંગોમાં (तुरयन्तः) શીઘ્રતા કરતા પુણ્યજન પુકારે છે-આમંત્રિત કરે છે (शूरसातौ यम्) શૂર-પરાક્રમી સૌભાગ્યવાન જનોના લાભ પ્રાપ્તિમાં જેને શૂર-સૌભાગ્યવાન જન આમંત્રિત કરે છે સ્મરણ કરે છે. (विप्रासः) ઋષિજનો (ज्मन् अपाम् उप) પૃથિવી પર જળની સમીપ (यम् वाजयन्ते) જેને અર્ચિત કરે છે (सः इन्द्रः)તે પરમાત્મા જ અર્ચનીય-ઉપાસ્ય છે. (૬)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : અમે પાપ પ્રસંગોમાં પાપોથી સંઘર્ષ કરતા પરમાત્માને આમંત્રિત કરીએ, તેનાથી બળ માગીએ, પુણ્ય કર્મોમા શીઘ્ર આચરિત કરવા માટે પુણ્ય જન પર પરમાત્માને સ્મરણ કરીએ, સૌભાગ્યની પ્રાપ્તિમાં પરમાત્માને સૌભાગ્યશીલ આમંત્રિત કરીએ, તે પરમાત્માને પ્રાપ્ત કરવા માટે ૠષિજનો પૃથિવી પર જળના સ્રોતોની સમીપ તેની અર્ચના-સ્તુતિ કરે છે. (૬)
     

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    وُہ ہے اِندر پرمیشور

    Lafzi Maana

    (یم ورِتریشوکھشتی یا سپردھ مانہ ہونتے) جب بُرے خیال عقلِ سلیم پر غلبہ کر لیتے ہیں تب اُپاسک لوگ ایک دوسرے سے بڑھ چڑہ کر جس کو پکارتے یا بُلاتے ہیں (یُکتشو تُر منتہ یم) اور یوگ سادھنا میں بڑھے ہوئے یوگی جن جس کو پالنے کی زبردست خواہش کرتے ہیں اور (یم شُورساتؤ) شرارتی عناصر کو دبانے کی طاقت حاصل کرنے کے لئے جس کو بُلایا جاتاہ ے اور (اپام اُپ جمن یم) آبیاری کرنے کے بعد پیداوار بڑھانے کی خواہش سے کسان لوگ جس کو پکارتے ہیں اور (وپراسہ ہم واجینتے) دانشور لوگ عقل و دانش کے حُصول سے جس کی پرارتھنا کرتے ہیں (سہ اِندر) وہ ہی اِندر ہے۔

    Tashree

    گھر کر بُدی سے اور پانے نیک عقل جس کو پُکاریں، وہ جگت کا اِندر، جس کو سب طرف سے سب پُکاریں۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    वेदात इंद्र हे नाव अनेक स्थानी आलेले आहे. तो विघ्नविदारक, प्रारंभ केलेल्या कार्यात सिद्धी प्रदायक, देवासुर संग्रामात विजयप्रदाता, जलधारा प्रवाहक, ज्ञानी जनांच्या स्तुतीचे पात्र, ब्रह्मांडात परमेश्वर व राष्ट्रात राजा असतो. त्यांची यथायोग्य उपासना-प्रार्थना व सत्कार करून सर्वांनी अभिष्ट लाभ करून घेतला पाहिजे ॥६॥

    टिप्पणी

    या मंत्रावर विवरणकाराने आपल्या कल्पनेनेच इतिहास लिहिलेला आहे. इंद्राचा अत्यंत भक्त असल्यामुळे इंद्राचे रूप धारण केलेल्या वामदेव ऋषींना असुरांनी पकडले व त्याला मारू लागले तेव्हा तो हा मंत्र म्हणून सांगतो की मी इंद्र नाही. इंद्र असा आहे - तसा आहे ॥ याच प्रकारचा इतिहास ‘स जनास इन्द्र’ या प्रकारे इंद्राचा परिचय देणारे गृत्समद ऋषीकडून दृष्ट ऋग्वेदीय द्वितीय मंडलाच्या १२ व्या सूक्तावर गृत्समदच्या नावाने काही लोकांनी कल्पित केलेला होता. जो सायण ऋग्वेद भाष्यात उद्धृत आहे. हे सर्व प्रामाणिक नाही, परंतु कथाकारांचा लीला विलास आहे.

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    विषय

    इन्द्र कोण आहे ? त्याचा परिचय -

    शब्दार्थ

    (प्रथम अर्थ) ( राजापर अर्थ) - (वृत्रेषु) अविद्या, भ्रष्टाचार, दुचाराच वाढल्यानंतर (स्पर्धमानाः) त्यावर विजय मिळविण्याकरिता (क्षितयः) प्रजाजन (यं हवन्ते) ज्या जननायकाला हाक मारतात, तसेच तेच प्रजानन (मुक्तेषु) महान कार्याचा प्रारंभ करण्यापूर्वी (तरयन्तः) कार्यसिद्धीसाठी त्वरा करीत (यं हवन्ते) ज्या कार्यसाधकाला बोलावतात त्याचप्रकारे (शूरस्तवौ) शूर ज्यात विजय प्राप्त करण्यासाठी यत्न करतात, त्या युद्धामध्ये (यं हवन्ते) वीरजन ज्या वीरश्रेष्ठाला पुकारतात (अपाम्) तसेच सरोवर, कालवे आदींच्या (उपज्मन्) निर्माणासाठी (यं हवन्ते) प्रजाजन (वा अभियंता, कृषकजन) ज्या राष्ट्र निर्मात्याला हाक मारतात, तसेच (विप्रासः) ज्ञानी ब्राह्मण (यं वाजयन्ते) ज्याला परामर्श वा मंत्रणा देऊन शक्तिशाली करतात, (सः) दुःखविदारक, सुखदाता राजा इंद्र आहे. (त्याचेच नाव वा पद इंद्र असे आहे.) ।। द्वितीय अर्थ - (परमात्मपर अर्थ) (वृत्रेषु) योग साधनेच्या मार्गात व्याधी, स्त्यान (दुर्लक्ष), संशय, प्रमाद, आलस्य आदी विघ्ने उपस्थित झाल्यानंतर (स्पर्धमानाः) त्या विघ्नांवर विजय प्राप्त करण्यासाठी इच्छा बाळगणारे योगीजन (यं हवन्ते) साह्याकरिता ज्याला हाक मारतात, तसेच (युक्तेषु) इंद्रिये, मन, प्राण आदींचा योगासी संयोग झाल्यानंतर (तुरयन्तः) योगसिद्धी प्राप्तीकरिता योगीजन (यं हवन्ते) त्या सिद्धिप्रदात्याला पुकारतात, तसेच (शूरसातौ) आंतरिक देवासुर- संग्रामामध्ये (यं हवन्ते) ज्या विजय प्रदात्याला हाक देतात आणि (अपाम्) प्राणांच्या वर-वरच्या चक्रामध्ये शिरण्यासाठी (यं हवन्ते) ज्या योग सहाय्यकास पाचारण करात आणि (यं) ज्याला (विप्रासः) विद्वान योगीजन (वाजयन्ते) ज्याची अर्चना करतात. (सः) त्या ध्यान- धारणा समाधीद्वारे प्राप्तव्य असलेला परमेश्वराला (इंद्रः) इंद्र म्हणतात. ।। ६।।

    भावार्थ

    वेदांमध्ये इंद्र नाव अनेक ठिकाणी आले आहे. तो इंद्र कोण आहे ? तो विग्नविदारक, प्रारब्ध कार्यांचा सिद्धिदायक, देवासुर- संग्रामामध्ये विजय प्रदाता, जलधारा प्रवाहित करविणारा आणि ज्ञानीजनांसाठी स्तवनीय असून ब्रह्मांडामध्ये इंद्र म्हणजे परमेश्वर आणि राष्ट्रात राजा याचे नाव इंद्र. त्याची यथोचित उपासना / प्रार्थना / सत्कार करून सर्वांनी अभीष्ट लाभ प्राप्त केले पाहिजेत. ।। ६।। या मंत्रावर भाष्य करताना विवरणकाराने कल्पनेनेच एक इतिहास - कथा रचली आहे. ती अशी की इंद्राचे परम भक्त असल्यामुळे वामदेव ऋषीने इंद्राचे रूप धारण केले. त्यालाच खरा इंद्र समजून असुरगण त्याला ठार करण्यासाठी त्याच्यावर चालून गेले. तेव्हा तो असुरांना म्हणतो - ‘मी इंद्र नाही, मी इंद्र नाही’ प्रस्तुत प्रसंगी ऋषी हा मंत्र म्हणत आहे. अशाच प्रकारचा इतिहास ऋग्वेदाच्या द्वितीय मंडलातील १२ व्या सूक्ताविषयीदेखील कल्पिला आहे. गृत्समद ऋषी ङ्गस जनास इंद्रःफ कहकर अथवा वास्तविक रूप बता रहा है। सायण आचार्यांच्या ऋग्वेद भाष्यामध्येही ही कथा उद्घृत आहे. या कथा वा हा इतिहास प्रमाणांवर आधारित नसून केवळ कथाकारांना कल्पनाविलास आहे.।।

    विशेष

    या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. ।। ६।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    போரிலே துரிதமாய் செல்லுங்கால், பகைவர்களோடு சண்டை செய்யுங்கால் அழைக்கப்படுபவனாயும், கவிகளால் போற்றப்பட்டு எங்கு வீரர்கள் லாபத்தை அடைகிறார்களோ அல்லது சலங்களின் வழியிலேயுள்ள அவனே (இந்திரன்).

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