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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 361
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    28

    क꣣श्यप꣡स्य꣢ स्व꣣र्वि꣢दो꣣ या꣢वा꣣हुः꣢ स꣣यु꣢जा꣣वि꣡ति꣢ । य꣢यो꣣र्वि꣢श्व꣣म꣡पि꣢ व्र꣣तं꣢ य꣣ज्ञं꣡ धी꣢꣯रा नि꣣चा꣡य्य꣢ ॥३६१

    स्वर सहित पद पाठ

    क꣣श्य꣡प꣢स्य । स्व꣣र्वि꣡दः꣢ । स्वः꣣ । वि꣡दः꣢꣯ । यौ꣢ । आ꣣हुः꣢ । स꣣यु꣡जौ꣢ । स꣣ । यु꣡जौ꣢꣯ । इ꣡ति꣢꣯ । य꣡योः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯म् । अ꣡पि꣢꣯ । व्र꣣त꣢म् । य꣣ज्ञ꣢म् । धी꣡राः꣢꣯ । नि꣣चा꣡य्य꣢ । नि꣣ । चा꣡य्य꣢꣯ ॥३६१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कश्यपस्य स्वर्विदो यावाहुः सयुजाविति । ययोर्विश्वमपि व्रतं यज्ञं धीरा निचाय्य ॥३६१


    स्वर रहित पद पाठ

    कश्यपस्य । स्वर्विदः । स्वः । विदः । यौ । आहुः । सयुजौ । स । युजौ । इति । ययोः । विश्वम् । अपि । व्रतम् । यज्ञम् । धीराः । निचाय्य । नि । चाय्य ॥३६१॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 361
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 2
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में इन्द्र के सहयोगियों के विषय में कहा गया है।

    पदार्थ

    प्रथम—ब्रह्माण्ड के पक्ष में। विद्वान् लोग (यौ) जिन अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व को (स्वर्विदः) प्रकाश वा आनन्द को प्राप्त करानेवाले (कश्यपस्य) सर्वद्रष्टा इन्द्र जगदीश्वर के (सयुजौ इति) सहयोगी (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिनके (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) कर्म को (यज्ञम् आहुः) यज्ञरूप कहते हैं (तौ) उन अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व को (निचाय्य) जानकर, हे मनुष्यो ! तुम (धीराः) पण्डित बनो ॥ इस मन्त्र का देवता इन्द्र होने से ‘कश्यप’ यहाँ इन्द्र का नाम है। वेद में उस इन्द्र के प्रधान सहचारी अग्नि और सोम हैं, क्योंकि अग्नि और सोम के साथ बहुत-से स्थलों में उसका वर्णन मिलता है ॥ जैसे ‘इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम्। ऋ० १।२१।६’, ‘इन्द्रा॑ग्नी वृत्रहणा जु॒षेथा॑म् ऋ० ७।९३।१’ में अग्नि इन्द्र का सहचारी है और ‘इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒स्माँ अ॑विष्टम् ऋ० २।३०।६’, ‘इन्द्रा॑सोमा॒ तप॑तं॒ रक्ष॑ उ॒ब्जत॒म् अथ० ८।४।१’ में सोम इन्द्र कासहचारी है। एक मन्त्र में इन्द्र, अग्नि और सोम तीनों एक साथ मिलते हैं—‘ य॒शा इन्द्रो य॒शा अ॒ग्निर्य॒शाः सोमो॑ अजायत अथ० ६।५८।३। निरुक्त में भी इन्द्र के सहचारी देवों में सर्वप्रथम अग्नि और सोम ही परिगणित हैं (निरु० ७।१०)। यह जगत् अग्नि और सोम से (आग्नेय तत्त्व और सौम्य तत्त्व) से ही बना है। वे ही प्रश्नोपनिषद् में रयि और प्राण नाम से वर्णित किये गये हैं। वहाँ कहा गया है कि कबन्धी कात्यायन ने भगवान् पिप्पलाद के पास जाकर प्रश्न किया कि भगवन्, ये प्रजाएँ कहाँ से उत्पन्न हो गई हैं? उसे उन्होंने उत्तर दिया कि प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न करने की कामना से तप किया और तप करके रयि और प्राण के जोड़े को पैदा किया, इस विचार से कि ये दोनों मिलकर बहुत-सी प्रजाओं को उत्पन्न कर देंगे। वहीं पर प्राण और रयि को सूर्य-चन्द्र, उत्तरायण-दक्षिणायन, शुक्ल-कृष्ण पक्ष तथा अहोरात्र के रूप में वर्णित किया है। शतपथब्राह्मण में भी कहा है कि सूर्य आग्नेय है, चन्द्रमा सौम्य है, दिन आग्नेय है, रात्रि सौम्य है; शुक्लपक्ष आग्नेय है, कृष्णपक्ष सौम्य है (श० १।६।३।२४)। ये ही अग्नि-सोम इन्द्र के सहचररूप में प्रस्तुत मन्त्र में अभिप्रेत हैं, ऐसा समझना चाहिए। इन्द्र परमेश्वर इन्हीं के माध्यम से जगत् को उत्पन्न करता है और उसका सञ्चालन करता है। इनका सब कर्म यज्ञरूप है, यह भी मन्त्र में कहा गया है। अन्यत्र भी वेद अग्नि और सोम की महिमा वर्णित करते हुए कहता है—हे शुभकर्मोंवाले अग्नि और सोम, तुम दोनों ने आकाश में चमकीले पिण्डों को धारण किया है, तुम ही पर्वतों पर बर्फ जम जाने से रुकी हुई नदियों को बहाते हो। हे अग्नि और सोम, तुम दोनों ब्रह्म से वृद्धि पाकर यज्ञ के लिए विशाल लोक को उत्पन्न करते हो। (ऋ० १।९३।५,६)। जो लोग इन्द्र के सहचारी इन अग्नि और सोम का यह वेदप्रतिपादित महत्त्व जान लेते हैं, वे ही पण्डित हैं ॥ द्वितीय—शरीर के पक्ष में। विद्वान् लोग (यौ) जिन बुद्धि-मन अथवा प्राण-अपानरूप अग्नि-सोम को (स्वर्विदः) विवेक-प्रकाश तथा आनन्द प्राप्त करनेवाले (कश्यपस्य) ज्ञान के द्रष्टा जीवात्मारूप इन्द्र के (सयुजौ) सहयोगी (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिन बुद्धि-मन अथवा प्राण-अपान के (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) कर्म को (यज्ञम्) ज्ञान-यज्ञ अथवा शरीरसञ्चालन-यज्ञ कहते हैं, [तौ] उन बुद्धि-मन अथवा प्राण-अपान को (निचाय्य) भली-भाँति जानकर, प्रयुक्त करके और सबल बनाकर, हे मनुष्यो, तुम (धीराः) ज्ञानबोध से युक्त अथवा शरीर-धारण में समर्थ होवो। अभिप्राय यह है कि बुद्धि और मन का सम्यक् उपयोग करके ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से ज्ञान एकत्र करने में समर्थ होवो और प्राणायाम से प्राणापानों को वश करके शरीर-धारण में समर्थ होवो ॥ तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। राजनीतिज्ञ लोग (यौ) जिन सेनाध्यक्ष और राज्यमन्त्री रूप अग्नि और सोम को (स्वर्विदः) प्रजाओं को सुख पहुँचानेवाले, (कश्यपस्य) राजपुरुषों के कार्य और प्रजा के सुख-दुःख के द्रष्टा राजा के (सयुजौ) सहायक (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिन सेनाध्यक्ष तथा राजमन्त्री के (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) राज्यसञ्चालनरूप तथा शत्रुनिवारणरूप कर्म को (यज्ञम्) राष्ट्रयज्ञ का पूर्तिरूप (आहुः) कहते हैं, उनका (निचाय्य) सत्कार करके, हे प्रजाजनो, तुम (धीराः) धृत राष्ट्रवाले होवो ॥ चतुर्थ—आदित्य और अहोरात्र के पक्ष में।विद्वान् लोग (यौ) जिन दिन-रात्रिरूप अग्नि और सोम को (स्वर्विदः) प्रकाश प्राप्त करानेवाले (कश्यपस्य) पदार्थों का दर्शन करानेवाले अथवा गतिमय पृथिव्यादि लोकों के रक्षक आदित्य के (सयुजौ) सहयोगी (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिन दिन-रात्रि के (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) कर्म को (यज्ञम्) यज्ञात्मक अर्थात् परोपकारात्मक (आहुः) बताते हैं [तौ] उन दिन-रात्रि को (निचाय्य) जानकर, हे मनुष्यो ! तुम भी (धीराः) परोपकार-बुद्धि से युक्त होवो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥

    भावार्थ

    परमेश्वर के सहचर अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व को, जीवात्मा के सहचर मन और बुद्धि अथवा प्राण और अपान को, राजा के सहचर सेनाधीश और अमात्य को तथा सूर्य के सहचर दिन और रात्रि को भली-भाँति जानकर उनसे यथोचित लाभ सबको प्राप्त करने चाहिएँ ॥२॥

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    पदार्थ

    (कश्यपस्य) देखनेवाले—सर्वद्रष्टा सर्वज्ञ “कश्यपः पश्यको भवति यत् सर्वं परिपश्यतीति सौक्ष्म्यात्” [तै॰ आ॰ १.८.८] (स्वर्विदः) स्वः-मुक्त के लिए मोक्ष सुख रखने वाले या मोक्ष सुखानुभव कराने वाले परमात्मा के—उसकी प्राप्ति के लिए (यौ सयुजौ) जो दोनों परस्पर साथी साधन दो हरियाँ—ऋक् और साम—स्तुति और उपासना है (इति धीराः-आहुः) ऐसा धीर-ध्यानी जन कहते हैं (ययोः) जिन दोनों में या दोनों के अन्तर्गत—जिनके परिपालनार्थ (विश्वं व्रतं यज्ञम्) समस्त सङ्कल्प और यज्ञ—श्रेष्ठतम कर्म (निचाय्य) निचयन करके सेवन करें।

    भावार्थ

    परमात्मा सर्वसाक्षी तथा मोक्ष का स्वामी है उसकी दो हरियाँ—ऋक्, साम, स्तुति और उपासना को धीर मुमुक्षुजन प्रशंसित करते हैं इनके परिपालनार्थ सङ्कल्प और श्रेष्ठ कर्म करते हैं इन्हें अपने जीवन में धारण करें॥२॥

    विशेष

    ऋषिः—वामदेवः (वननीय उपासनीय देव वाला)॥<br>

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    विषय

    मुक्तात्मा व परमात्मा

    पदार्थ

    जो व्यक्ति कान्तदर्शी बनकर वस्तुओं के तत्त्व को देखता है यह 'पश्यक' होता हुआ ‘कश्यप' कहलाता है । यह कश्यप आपात रमणीय विषयों में फँसता नहीं। यह जीता हुआ भी विषयों में विचरता हुआ भी, उनमें आसक्त न होने से मुक्त होता है और जीवन्मुक्त कहलाता है। प्रभु तो सदा अपने जीवन्मुक्त कहलाता है। प्रभु तो सदा अपने देदीप्यमान रूप में ही विद्यमान हैं, अतः वे प्रभु 'स्वर्विद्' हैं। [स्वर् = to radiate] उस प्रभु से ही प्रकाश चारों ओर फैल रहा है ('तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । ' धीराः) = धीर, ज्ञानी पुरुष (कश्यपस्य) = मुक्तात्मा के और (स्वर्विद:) = इस सदा देदीप्यमान रूप में अवस्थित प्रभु के (ययो:) = इन दोनों के (विश्वम् अपि) = सब ही (व्रतम्) = नियमों को तथा (यज्ञम्) = लोकहित के लिए किये जाते हुए कर्मों को (निचाय्य) = सम्यक्त्या विवेचन करके (यौ) = इन दोनों को (आहुः) = कहते हैं कि (सयुजौ इति) = ये तो सयुज हैं- एक ही श्रेणी में स्थित हैं। प्रभु सर्वज्ञ हैं तो यह कश्यप भी (‘भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्') = सूर्यनाड़ी में संयम करके सब भुवनों के ज्ञान को प्राप्त करनेवाला बना है। प्रभु अन्तर्यामी हैं, यह भी दूसरों के हृदय की बातों को जान लेता है। प्रभु ईश हैं, यह भी सब भूतों का ईश्वर बना है- उनमें फँसता नहीं। जल के ऊपर भी आराम से चल सकता है। अणिमादि अष्टसिद्धियों को प्राप्त करके यह परमेश्वर जैसा ही तो बन गया है। प्रभु के सयुज होने से इसे सयुज्य मुक्ति प्राप्त हो गई है। हाँ, यह ठीक है कि यह ('जगद व्यापारवर्जम्') = नई दूनियाँ की सृष्टि नहीं कर सकता। इसका बाकी सब ऐश्वर्य परमात्मा के बराबर है।

    इस मुक्तात्मा का निजू जीवन व्रतमय होने से शुद्ध बना रहता है। इसका सामाजिक जीवन यज्ञमय लोकहित में प्रवृत्त होता है। परमात्मा तो पूर्ण व्रती, अतएव पूर्ण शुद्ध हैं और यज्ञरूप ही हैं। यह जीवनमुक्त परमात्मा का ही एक छोटा रूप होता है। परिमाण के अन्तर होते हुए भी यह गुणों में प्रभु - जैसा ही होता है। सुन्दर - ही - सुन्दर गुणोंवाला होने के कारण यह ‘वामदेव' है। इसकी सब इन्द्रियाँ प्रशस्त हैं, सो यह ‘गौतम' है।

    भावार्थ

    हम स्वर्विद प्रभु के साथी कश्यप बनें।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( स्वर्विदः ) = ज्योतिः स्वरूप सुख को साक्षात् करनेहारे ( धीराः ) = विद्वान् लोग ( यौ ) = जिन प्राण और अपान को ( कश्यपस्य ) = योगी, साधक, द्रष्टा आत्मा के ( सयुजौ ) = नित्य के सहयोगी, साथी ( आहु: ) = बतलाते हैं और ( ययो: ) = जिनके ( विश्वम् अपि ) = सभी ( व्रतं ) = कर्मों को ( यज्ञं निचाय्य आहुः ) = जीवन या प्राणापानमय यज्ञ के निमित्त ही निश्चय करते हैं ।

    सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात, प्राण, अपान, चित्त और अहंकार, मन, बुद्धि आदि साथी समझने चाहियें । अधिदैविक पक्ष में मित्रावरुण, सूर्य और मेघ लेने चाहियें ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

     

    ऋषिः - वामदेव:।

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - अनुष्टुभ् ।

    स्वरः - गान्धारः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेन्द्रस्य सहयोगिनोर्विषयमाह।

    पदार्थः

    प्रथमः—ब्रह्माण्डपरः। विद्वांसः (यौ) अग्नीषोमौ, अग्नितत्त्वं सोमतत्त्वं च (स्वर्विदः) यः स्वः प्रकाशम् आनन्दं वा वेदयते लम्भयति स स्वर्वित् तस्य (कश्यपस्य) पश्यकस्य सर्वद्रष्टुः इन्द्रस्य परमैश्वर्यशालिनो जगदीश्वरस्य। ‘कश्यपः पश्यको भवति, यत्सर्वं परिपश्यति’ तै० आ० १।८।८। अत्र आद्यन्तविपर्ययः। (सयुजौ) सहयोगिनौ (आहुः) कथयन्ति, (ययोः) ययोश्च अग्नीषोमयोः (विश्वम् अपि) सर्वमपि (व्रतम्) कर्म (यज्ञम्) यज्ञत्वेन आहुः वर्णयन्ति, तौ अग्नीषोमौ, अग्नितत्त्वं सोमतत्त्वं च (निचाय्य) सम्यग् विज्ञाय। चायृ पूजानिशामनयोः, भ्वादिः। हे जनाः यूयम् (धीराः) धीमन्तः पण्डिताः भवतेति शेषः ॥ यत्तदोर्नित्यसम्बन्धाद् अस्मिन् मन्त्रे ‘यौ’ इत्यनेन सह वाक्यपूर्त्त्यै ‘तौ’ इत्यध्याह्रियते ॥ इन्द्रदेवताकत्वादृचः कश्यप इति इन्द्रनाम। वेदे तस्येन्द्रस्य प्रधानसहचरौ अग्नीषोमौ, अग्निना सोमेन च सह बहुत्र तद्वर्णनात्। यथा, इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम्। (ऋ० १।२१।६), इन्द्रा॑ग्नी वृत्रहणा जु॒षेथा॑म् (ऋ० ७।९३।१), इत्यग्निना सह। इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒स्माँ अ॑विष्टम् (ऋ० २।३०।६), इन्द्रा॑सोमा॒ तप॑तं॒ रक्ष॑ उ॒ब्जत॒म् (अथ० ८।४।१) इति च सोमेन सह। एकस्मिन् मन्त्रे इन्द्राग्निसोमास्त्रयोऽपि सहचरिता उपलभ्यन्ते “य॒शा इन्द्रो य॒शा अ॒ग्निर्य॒शाः सोमो॑ अजायत (अथ० ६।५८।२)” इति। निरुक्तेऽपि इन्द्रस्य संस्तविकेषु देवेषु सर्वतः पूर्वम् अग्नीषोमावेव वर्णितौ—“अथास्य संस्तविका देवाः, अग्निः, सोमः, वरुणः, पूषा, बृहस्पतिः, ब्रह्मणस्पतिः, पर्वतः, कुत्सः, विष्णुः, वायुः” इति (निरु० ७।१०) ॥ अग्नीषोमात्मकमिदं जगत्। अग्नीषोमौ प्रश्नोपनिषदि रयि-प्राणरूपेण वर्णितौ। “अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य (भगवन्तं पिप्पलादम्) पप्रच्छ—भगवन् ! कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति। तस्मै स होवाच—प्रजाकामो वै प्रजापतिः, स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति। (प्रश्न० १।३, ४)। तत्रैव प्राणो रयिश्च आदित्य-चन्द्रात्मना, उत्तरायणदक्षिणायनात्मना, शुक्ल-कृष्णपक्षात्मना, अहोरात्रात्मना चापि वर्णितौ (प्रश्न० १।५-१३)। शतपथेऽप्युक्तम्—सूर्य एवाग्नेयः, चन्द्रमाः सौम्यः। अहरेवाग्नेयं रात्रिः सौम्या, य एवापूर्यतेऽर्धमासः स आग्नेयो, योऽपक्षीयते स सौम्यः। (श० १।६।३।२४) इति। एतावेव अग्नीषोमौ इन्द्रस्य सहचरत्वेनास्मिन् मन्त्रेऽभिप्रेतावित्युन्नेयम्। इन्द्रः परमेश्वरः एतयोर्माध्यमेन जगदुत्पादयति सञ्चालयति च। किञ्च एतयोर्विश्वमपि कर्म यज्ञरूपम् इत्यपि मन्त्रे प्रोक्तम्। अन्यत्रापि वेद एतयोर्महिमानं वर्णयन्नाह—“यु॒वमे॒तानि॑ दि॒वि रो॑च॒नान्य॒ग्निश्च॑ सोम॒ सुक्र॑तू अधत्तम्। यु॒वं सिन्धूँ॑र॒भिश॑स्तेरव॒द्यादग्नी॑षोमा॒वमु॑ञ्चतं गृभी॒तान् ॥ अग्नी॑षोमा॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नोरुं य॒ज्ञाय॑ चक्रथुरु लो॒कम्।” ऋ० १।९३।५, ६ ॥ ये तावद् इन्द्रसहयुजोः अग्नीषोमयोर्वेदप्रतिपादितमेतन्महत्त्वं विदन्ति त एव पण्डिता इति मन्तव्यम् ॥ अथ द्वितीयः—शरीरपरः। विद्वांसः (यौ) अग्नीषोमौ बुद्धिमनसी, प्राणापानौ वा। प्राणापानौ अग्नीषोमौ। ऐ० ब्रा० १।८। (स्वर्विदः) यः स्वः विवेकप्रकाशम् आनन्दं वा विन्दते तस्य (कश्यपश्य) द्रष्टुः, ज्ञानस्य ग्रहीतुः इन्द्रस्य जीवात्मनः (सयुजौ)) सहयोगिनौ (आहुः) कथयन्ति, (ययोः) ययोश्च बुद्धिमनसोः प्राणापानयोर्वा (विश्वम् अपि) सर्वमपि (व्रतम्) कर्म (यज्ञम्) ज्ञानयज्ञं देहसञ्चालनयज्ञं वा आहुः कथयन्ति, ते बुद्धिमनसी, तौ प्राणापानौ वा (निचाय्य) सम्यग् बुद्ध्वा, प्रयुज्य सबलीकृत्य च हे जनाः ! यूयम् (धीराः) धीः ज्ञानबोधो येषामस्ति ते धीराः, यद्वा दधति शरीरं ये ते धीराः, तादृशा भवतेति शेषः। धी शब्दान्मतुबर्थे रन् प्रत्ययः, यद्वा धा धातोः ‘सु-सू-धाञ्-गृधिभ्यः क्रन्। उ० २।२५’ इति क्रन् प्रत्ययः। बुद्धिमनसोः सम्यगुपयोगं विधाय ज्ञानेन्द्रियाणां साहाय्येन ज्ञानं सञ्चेतुं क्षमाः, प्राणायामेन च प्राणापानौ वशीकृत्य देहधारणक्षमाः भवतेति भावः ॥ अथ तृतीयः—राष्ट्रपरः। राजनीतिज्ञाः विद्वांसः (यौ) अग्नीषोमौ अमात्यसेनाधीशौ। अग्निः सेनाधीशः सोमोऽमात्य इति विज्ञेयम्। (स्वर्विदः) स्वः सुखं प्रजाभ्यो वेदयते लम्भयति यः तस्य (कश्यपश्य) राजपुरुषाणां कार्यस्य, प्रजायाः सुखदुःखादिकस्य च द्रष्टुः इन्द्रस्य राज्ञः (सयुजौ) सहायकौ (आहुः) कथयन्ति, (ययोः) ययोश्च अमात्यसेनाधीशयोः (विश्वम् अपि) सर्वमपि (व्रतम्) राज्यसञ्चालनशत्रुनिवारणादिरूपं कर्म (यज्ञम्) राष्ट्रयज्ञपूर्तिरूपम् आहुः कथयन्ति, तौ (निचाय्य) सम्यक् सत्कृत्य, हे प्रजाजनाः यूयम् (धीराः) धृतराष्ट्राः भवत ॥ अग्नीषोमयोः राज्याधिकारिणोः राजानम् इन्द्रं प्रति सहयोगम् अथर्ववेदः इत्थं वर्णयति—“इ॒दं तद् यु॒ज उत्त॑र॒मिन्द्रं॑ शुम्भा॒म्यष्ट॑ये ॥ अ॒स्मै क्ष॒त्रम॑ग्नीषोमाव॒स्मै धा॑रयतं र॒यिम्। इ॒मं रा॒ष्ट्रस्या॑भीव॒र्गे कृ॑णु॒तं युज उत्त॑रम्। (अथ० ६।५४।१, २)” इति ॥ अथ चतुर्थः—आदित्याहोरात्रपरः। विद्वांसः (यौ) अग्नीषोमौ अहोरात्रौ। अहोरात्रे वा अग्नीषोमौ। कौ० ब्रा० १०।३। (स्वर्विदः) प्रकाशलम्भकस्य (कश्यपस्य) पश्यकस्य पदार्थानां दर्शयितुः यद्वा कशे गतौ साधुः कश्यः गतिमयः पृथिव्यादिलोकः तं पाति रक्षतीति कश्यपः आदित्यात्मा इन्द्रः तस्य। कश गतिशासनयोः भ्वादिः। (सयुजौ) सहयुजौ (आहुः) कथयन्ति। अहोरात्रयोः आदित्याश्रितत्वात्। (ययोः) ययोश्च अहोरात्रयोः (विश्वम् अपि) सर्वम् एव (व्रतम्) कर्म (यज्ञम्) यज्ञात्मकम्, परोपकारात्मकम् आहुः कथयन्ति द्रष्टारो जनाः, तौ अहोरात्रौ (निचाय्य) सम्यक् विज्ञाय, हे जनाः ! यूयम् (धीराः) अहोरात्रवत् परोपकारधीसम्पन्नाः भवत ॥२॥१ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥२॥

    भावार्थः

    परमेश्वरस्य सहचरे अग्निसोमतत्त्वे, जीवात्मनः सहचरे बुद्धिमनसी प्राणापानौ वा, नृपस्य सहचरौ अमात्यसेनाधीशौ, आदित्यस्य सहचरौ अहोरात्रौ च सम्यग् विज्ञाय ताभ्यां यथायोग्यं लाभाः सर्वैः प्राप्तव्याः ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. भरतस्वामिव्याख्याने तु कश्यपः प्रजापतिरादित्यो वा। तस्य सयुजौ मित्रावरुणौ, ‘अहर्वै मित्रो रात्रिर्वरुणः’ इति, सर्वस्य कालस्य तयोरेवान्तर्भावात्। इन्द्राग्नी वा, तयोरेव सर्वनिर्वाहकत्वात्। अश्विनौ वातयोरादित्यपुत्रत्वप्रसिद्धेः। सायणेन कश्यपः सर्वज्ञः इन्द्रः, तत्सयुजौ च तस्य अश्वौ इति पूर्वं व्याख्याय, तदनु भरतस्वामिनमनुसृत्य कश्यपः प्रजापतिः, तस्य सयुजौ च मित्रावरुणौ इन्द्राग्नी वेत्युक्तम्। वस्तुतस्तु इन्द्र एवास्या ऋचो देवतेत्यस्माभिस्तदनुकूलमेव व्याख्यातम्। इन्द्रस्य बहुषु वाच्यार्थेषु आदित्योऽपि भवतीति आदित्यपरमपि व्याख्यातुमलम्।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Yogis, the seers of illuminated joy, consider Pran and Apan as the eternal companions of the soul. They define all their movements as a kind of Yajna (sacrifice).

    Translator Comment

    $ Western scholars consider this verse to be obscure. The significance of the verse is clear like day light. Benfy and Stevenson call यो as Indra's pair of courageous horses. This is incorrect. The word means Prana and Apana, the in-going and outgoing breaths.

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    Meaning

    Veteran self-established sages who know the light of divinity and divine creation, having realized the truth in their mind and vision, say that there are two forces of Kashyapa, divine Intelligence, both simultaneous, whose sole law and purpose is to maintain the cosmic yajna of creative evolution through the operations of nature: these forces are like twins and complementary: centrifugal and centripetal versions of the divine cosmic energy.

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    गुजराती (1)

    पदार्थ


    પદાર્થ : (कश्यपस्य) જોનાર-સર્વ દ્રષ્ટા-સર્વજ્ઞ (स्वर्विदः) સ્વઃ=મુક્તને માટે મોક્ષ સુખ રાખનાર અર્થાત્ મોક્ષસુખનો અનુભવ કરાવનાર પરમાત્માની—તેની પ્રાપ્તિને માટે (यौ सयुजौ) જે બન્ને પરસ્પર સાથી સાધન બે હરિયો = ૠક અને સામ-સ્તુતિ અને ઉપાસના છે (इति धीराः आहुः) તેમ ધી૨-ધ્યાનીજન કહે છે. (ययोः) જે બન્નેમાં અથવા બન્નેની અન્તર્ગત-જેના પરિપાલન માટે (विश्वं व्रतं यज्ञम्) સમસ્ત સંકલ્પ અને યજ્ઞ-શ્રેષ્ઠતમ કર્મ (निचाय्य) નિચયન કરીને સેવન કરીએ. (૨)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્મા સર્વનો સાક્ષી તથા મોક્ષનો સ્વામી છે, તેની બે હરિયો-ઋક્ અને સામ, સ્તુતિ અને ઉપાસનાને ધીર-મુમુક્ષુજન પ્રશંસિત કરે છે. તેના પરિપાલન માટે સંકલ્પ અને શ્રેષ્ઠ કર્મ કરે છે. તેને પોતાના જીવનમાં ધારણ કરીએ. (૨)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    بَرت اور یگیہ

    Lafzi Maana

    (سؤرودہ دھیراہ) سؤرگ جیسے آنند کو پائے ہوئے وِدوان اِیش بھگت (نچائے یؤاِتی آہُو) یہ نشچے کر کے جن دو اوّلین صفات کے متعلق یہ کہتے ہیں، کہ یہ دو اوصافِ حمیدہ (کیشپسیہ سہ یئو بئو) عالمِ کل پرماتما کے ہمیشہ ساتھ رہتے ہیں اور (ییوہ وِشوم اپی) اِن دو پرہی ساری دُنیا ٹھہری ہوئی ہے وہ ہیں (برتم یگیم) برت اور یگیہ یعنی مصمم ارادہ اور رفاعِ عام کا جذبہ!

    Tashree

    اِرادے پکے اور جذبہ ہے جن میں خلقِ خدمت کا، یہ دُنیا جس کو کہتے ہیں اِنہی نے ہی سجائی ہے۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    परमेश्वराचे सहयोगी अग्नितत्त्व व सोमतत्त्व, जीवात्म्याचे सहचर मन व बुद्धी किंवा प्राण व अपान, राजाचे सहचर सेनाधीश व अमात्य व सूर्याचे सहचर दिवस व रात्र यांना चांगल्या प्रकारे जाणून सर्वांनी त्यांच्याकडून यथायोग्य लाभ घ्यावा. ॥२॥

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    विषय

    इंद्राच्या सहयोगी पदार्थांविषयी

    शब्दार्थ

    (प्रथम अर्थ) - (ब्रह्माणुपर) विद्वज्जन ज्या अति तत्त्व आणि सौम्य तत्वाला (स्वर्विदः) प्रकाश आणि आनंद देणारे मानतात व (कस्यपस्य) सर्वद्रष्टा इंद्र जगदीश्वराचा (सयुजौ इति) सहयोगी (आहुः) म्हणतात आणि ज्यांच्या (अग्नी व सौम्य तत्त्वाच्या) (यज्ञरूप म्हणतात, (तौ) त्या अग्नितत्त्व व सौम्य तत्त्वाला (निचाय्य) जाणून घेऊन, हे मनुष्यानो, तुम्ही (धीरा) पंडित व्हा.।।। या मंत्राची देवता इंद्र असल्यामुळे येथे ङ्गकश्यपफ इंद्रालाच म्हटले आहे. वेदांमध्ये इंद्राचे प्रधान सहचारी म्हणून अग्नी व सोम यांचा उल्लेक सापडतो. कारण अनेक ठिकाणी इंद्रासोबत या दोघांचे वर्णन सापडते. जसे ‘ंइंद्राग्नी शर्म यच्छतम्’ (ऋ १/२१/६) ‘इंद्राग्नी वृत्रहणा जुषेथाम्’ (७/९३/१) या मंत्रात अग्नी इंद्राचा सहचारी आहे आणि ‘इंद्रासोमा युवमस्माँ अविष्टम्’ (२/३०/६) ‘इंद्रासोमा तपत रक्ष उब्जतम्’ (अ। ८/४/१) या मंत्रात इंद्राचा सहचारी सोम आहे. एका मंत्रात तर इंद्र, अग्नी व सोम तिन्ही एकत्र दिसतात. जसे ‘यशा इन्द्रो यशा अग्निर्यशाः सोमो अजायत’ (अश ६/५८/३) निरुक्त वा वेदांगामध्ये इंद्राचे सहकारी म्हणून सर्वप्रथम अग्नी व सोम यांचीच गणना केली आहे. (वि ७/१०) हे जग अग्नी व सोम (आग्नेय तत्त्व व सौम्य तत्त्व) याद्वारे निर्मित आहे. श्नोपनिषदामध्ये याच दोन तत्त्वांना रयि व प्राण म्हटले आहे. तिथे असे लिहिले आहे की कबन्धी कात्यायन याने भगवान पिप्पलादकडे जाऊन असा प्रश्न केला की भगवन्, या प्रजा कोठून उत्पन्न झाल्या आहेत ? तेव्हा पिप्लाद यांनी उत्तर दिले की प्रजापतीने प्रजेची उत्पत्ती कण्याच्या हेतूने तप केले आणि तपाद्वारे त्यांनी रयि व प्राण यांची जोडी उत्पन्न केली. त्याचा उद्देश होता की हे दोघे मिळून अनेक प्रजा उत्पन्न करतील. तिथेच प्राणाचे व रदीचे सूर्य- चंद्र, उत्तरायण - दक्षिणायन, शुक्ल पक्ष - कृष्ण पक्ष, दिवस-रात्र या रूपात वर्णन केले आहे. शतपथ ब्राह्मणात म्हटले आहे की सूर्य आग्नेय आहे, चंद्र सौम्य आहे, दिवस आग्नेय आहे, रात्र सौम्य आहे, शुक्ल पक्ष आग्नेय आहे, कृष्ण पक्ष सौम्य आहे (श. १/६/३/२४) या मंत्रात हेच अग्नी - सोम इंद्राच्या सहचर रूपाने वर्णित आहेत, असे समजले पाहिजे. इंद्र परमेश्वर यांच्याच माध्यमातून जगाची उत्पत्ती करतो आणि त्याचे संचालन करतो. याच मंत्रात असेही म्हटले आहे की यांचे (अग्नी - सोम) सर्व कर्म यज्ञरूप आहेत. वेदांमध्ये अन्यत्र एका स्थळी अग्नी व सोम यांचा महिमा सांगितला आहे - ‘हे शुभ कर्म करणारे अग्नी व सोम, तुम्ही दोघांनीच आकाशात दीप्तिमान पिंडांना धारण केले आहे. पर्वतांवर थिजलेल्या जमलेल्या हिमामुळे ज्या नद्या वाळतात, त्यांना हिम वितळणेद्वारे तुम्ही वाहत्या करता. हे अग्नी व सोम, तुम्ही ब्रह्मपासून बृद्धी घेऊन यज्ञाकरिता हा विशाल लोक उत्पन्न करता. (ऋ २/९३/ ५) जे लोक इंद्राचे सहचारी असलेल्या या अग्नी व सोम यांचे हे वेद प्रतिपादित महत्त्व जाणून घेतात वा जाणतात, तेच पंडित असतात.।। द्वितीय अर्थ - (शरीरपर अर्थ) विद्वज्जन (यौ) ज्या बुद्धी, मन अथवा प्राण - अपानरूप अग्नी व सोम यांना (स्वर्विदः) विवेकाचा प्रकाश आणि आनंदाचा अनुभव देणाऱ्या (कश्यपस्य) ज्ञान- द्रष्टा जीवात्मारूप इंद्राचे (सयुजौ) सहकारी (आहुः) म्हणतात आणि (ययोः) बुद्धी - मनाच्या वा प्राण - अपानाच्या (विश्वम् अपि) सर्वच (व्रतम) कर्मांना विद्वज्जन (यज्ञम्) ज्ञान - यज्ञ वा शरीर संचालन यज्ञ म्हणतात (तौ) त्या बुद्धी - मन व प्राण -अपान यांना (विचाय्य) चांगल्या प्रकारे जाणून घेऊन वा त्यांचा प३योग करून हे मनुष्यांनो, तुम्ही (धीराः) ज्ञान- बोध धारण करा अथवा शरीर धारणात समर्थ व्हा. तात्पर्य हे की तुम्ही बुद्धी व मनाचा सम्यक् उपयोग करून, ज्ञानेन्द्रियांच्या साह्याने ज्ञान - संच व संचय करण्यात समर्थ व्हा आणि प्राणायामाद्वारे प्राण - अपान यांना वश करून शरीर धारण कार्यात समर्थ व्हा.।। तृतीय अर्थ - (राष्ट्रपर अर्थ) - राजनीतीचे जाणकार (यौ) ज्या सेनाध्यक्ष आणि राज्यमंत्री रूप अग्नि- सोम यांना (स्वर्विदः) प्रजेला सुख समाधान देणारे आणि (कश्यपस्य) राजपुरुषांचे कार्ये व प्रजेचे सुख - दुःख ओळखणारे (समुजौ) दोन सहाय्यक (आहुः) म्हणतात आणि (ययोः) ज्या सेनाध्यक्ष व राज मंत्रीच्या (विश्वम् अपि) समस्त (वृतम्) शत्रुनिवारण व राज्य संचालनरूप कार्यांना (यज्ञम्) राष्ट्र यज्ञाची पूर्ती करणारे (आहुः) म्हणतात. त्यामुळे त्या दोघांचा (निचाय्य) सत्कार करून हे प्रजाजनहो, तुम्ही (धीराः) राष्ट्रधारक व्हा.।। चतुर्थ अर्थ - (आदित्य व अहोरात्र पर अर्थ) - विद्वज्जन (यौ) ज्या दिवस व रात्रभरूप अग्नी - सोम यांना (स्वर्विदः) सुखाची प्राप्ती करविणाऱ्या तसेच (कश्यपस्य) सर्व पदार्थ पाहण्यास साधन असलेल्या आणि गतिमान पृथ्वी आदी लोकांचा रक्षक असलेल्या आदित्याचा (समुजौ) सहकारी (आहुः) म्हणतात, तसेच (ययोः) ज्या दिवस- रात्रीच्या (विश्वम् अपि) साऱ्याच (व्रतम्) कमा४ंना (यज्ञम्) विद्वज्जन यज्ञात्मक वा परोपकारात्मक (आहुः) म्हणतात (तौ) त्या दिवस - रात्रींना (निचाय्य) पूर्णपणे जाणून घेत, हे मनुष्यानो, तुम्हीही (धीराः) परोपकार वृत्ती धारण करा.।। २।।

    भावार्थ

    परमेश्वराचे सहचर (सृष्टि निर्मितीत सहायक) असलेल्या अग्नी-तत्त्वाला व सोम तत्त्वाला तसेच जीवात्म्याचे सहचर असलेल्या बुद्धीला अथवा प्राण- अपान यांना, राजाचे सहचर सेनाधीश व राजमंत्री यांना आणि सूर्याचे सहचर दिवस - रात्र यांना यथोचित रूपाने जाणून घेऊन मनुष्यांनी त्यापासून आवस्यक लाभ प्राप्त केले पाहिजेत.।। २।।

    विशेष

    या मंत्रात श्लेष अलंकार आहे. (यातील शब्द श्लेषामुळेच या मंत्राचे चार अर्थ झाले आहेत.।। २।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    சர்வம் அறியும் தீரர்கள் எந்த குதிரைகளை [1] கசியபனின் வருணர்களாக, நண்பர்களாகச் சொல்லுகிறார்களோ அவர்களுடைய சர்வமான செயலை யக்ஞத்தின் நிமித்தமெனக் கூறுகிறார்கள்.

    FootNotes

    [1] கசியபனின் - சாதகன்

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