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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 363
    ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    48

    उ꣣क्थ꣡मिन्द्रा꣢꣯य꣣ श꣢ꣳस्यं꣣ व꣡र्ध꣢नं पुरुनि꣣ष्षि꣡धे꣢ । श꣣क्रो꣡ यथा꣢꣯ सु꣣ते꣡षु꣢ नो रा꣣र꣡ण꣢त्स꣣ख्ये꣡षु꣢ च ॥३६३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ꣣क्थ꣢म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । शँ꣡स्य꣢꣯म् । व꣡र्ध꣢꣯नम् । पु꣣रुनि꣣ष्षि꣡धे꣢ । पु꣣रु । निष्षि꣡धे꣢ । श꣣क्रः꣢ । य꣡था꣢꣯ । सु꣣ते꣡षु꣢ । नः꣣ । रार꣡ण꣢त् । स꣣ख्ये꣡षु꣢ । स꣣ । ख्ये꣡षु꣢꣯ । च꣣ ॥३६३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उक्थमिन्द्राय शꣳस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे । शक्रो यथा सुतेषु नो रारणत्सख्येषु च ॥३६३॥


    स्वर रहित पद पाठ

    उक्थम् । इन्द्राय । शँस्यम् । वर्धनम् । पुरुनिष्षिधे । पुरु । निष्षिधे । शक्रः । यथा । सुतेषु । नः । रारणत् । सख्येषु । स । ख्येषु । च ॥३६३॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 363
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 4
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में यह विषय है कि किस प्रयोजन से कैसा स्तोत्र इन्द्र के लिए उच्चारण करना चाहिए।

    पदार्थ

    हमें पुत्र, स्त्री, मित्र आदियों सहित (पुरुनिष्षिधे) बहुतों को पाप-पंक से अथवा संकट से उबारनेवाले (इन्द्राय) परम उपदेशक परमात्मा के लिए, ऐसा (उक्थम्) स्तोत्र (शंस्यम्) गान करना चाहिए, जो (वर्धनम्) हम स्तोताओं को बढ़ानेवाला हो, (यथा) जिससे (शक्रः) वह सर्वशक्तिमान् परमात्मा (नः) हम स्तोताओं के (सुतेषु) पुत्रों को (सख्येषु च) और सखाओं को (रारणत्) अतिशय पुनः-पुनः प्रेरणात्मक उपदेश देता रहे ॥४॥

    भावार्थ

    स्तुति किया हुआ परमेश्वर स्तोताजनों को और उनके स्तोता पुत्र, मित्र आदि को पुरुषार्थ आदि की शुभ प्रेरणा और सदुपदेश देकर उनकी उन्नति करता है ॥४॥

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    पदार्थ

    (पुरु निःषिधे) बहुत या अत्यन्त पाप दोष निवारक गुणसाधक (इन्द्राय) परमात्मा के लिए (वर्धनम्-उक्थं शंस्यम्) हमारी वृद्धि के साधनभूत वक्तव्य प्रशंसा योग्य स्तुतिवचन कहना चाहिए (यथा) जिससे कि (शक्रः) सर्वशक्तिमान् समर्थ परमात्मा (नः) हमारे (सुतेषु) निष्पन्न उपासनारसों में (च) और (सख्येषु) सखिभावों—मित्रभावों में (रारणत्) रमण करें—रुचि करें “रारण रमे” [निरु॰ ११.३९]।

    भावार्थ

    परमात्मा अत्यन्त दोषनिवारक एवं अत्यन्त गुणसाधक है उसकी कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिये स्ववृद्धिकर प्रशंसनीय स्तुतिवचन कहना चाहिये जिससे वह सर्वसमर्थ परमात्मा हमारे उपासनारसों को स्वीकार करने में और हमारे मित्रभावों प्रेमभावों में रमे—रुचि करे—हमें रुचि से अपनावे॥४॥

    विशेष

    ऋषिः—मधुच्छन्दाः (मीठी इच्छा वाला या मधुपरायण)॥<br>

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    विषय

    सख्य-भाव (पाँचवें आयतन की पूजा)

    पदार्थ

    (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिए (उक्थ्यम्) = स्तोत्र या स्तुतिवचन (शंस्यम्) = उच्चारण करना चाहिए। क्योंकि यह उक्थ सब प्रकार से (वर्धनम्) = हमारी वृद्धि करनेवाला है। प्रभु के ये स्तोत्र हमें विषय-वासनाओं से बचाकर हमारी शारीरिक शक्ति को ठीक रखते हैं, परस्पर बनधुत्व अनुभव कराने से हमारे मनों को राग-द्वेष के अभाव में हमारा मस्तिष्क ठीक कार्य करता है। इस प्रकार ये प्रभु के स्तोत्र सब प्रकार से हमारा वर्धन करते हैं।

    हमें उस प्रभु की स्तुति करनी चाहिए जो कि (पुरुनिःषधे) = पुरु-पालक और पूरक हैं तथा हमपर आक्रमण करनेवाली सभी असुर वृतियों का संहार करनेवाले हैं। (शक्रः) = [शक्नोति] करने का सब सामर्थ्य तो प्रभु में ही है। हमें चाहिए कि हम सदा स्तोत्रों के द्वारा उस प्रभु के सम्पर्क में रहें जिससे उस प्रभु का सामर्थ्य, नैर्मल्य व ज्ञान हममें भी प्रवाहित हो । जीव प्रभु की समीपता से ही शक्ति- सम्पन्न, निर्मल व ज्ञानी बनेगा।

    हमें चाहिए कि हम अपने जीवनों को ऐसा बनाएँ कि (यथा) = जिससे प्रभु (नः) = हमारे (सुतेषु) = शक्ति उत्पादन के कार्यों में तथा लोकहित के लिए किए जानेवाले किसी भी निर्माणात्मक कार्य में (च) = और (सख्येषु) = प्रभु के साथ मित्रत्व के स्थापन में (रारणत) = अत्यन्त प्रसन्न हों [रण्=to rejoice]। ('यः प्रीणयेत् सुचरितैः पितरं स पुत्र:') = जो सुचरितों से पिता को प्रसन्न करे वही तो पुत्र है। हम भी अपने को शक्ति-सम्पन्न बनाते हुए, निर्माणात्मक कार्यों में लगाते हुए तथा उस प्रभु को ही अनन्य मित्र समझते हुए उन्हें प्रसन्न करनेवाले बनें । 'प्रभु की मित्रता' से ऊँची मनुष्य की स्थिति नहीं हो सकती। इस स्थिति में हमारे मनों में किसी प्रकार की अशुभ इच्छाओं का आना सम्भव नहीं। तब तो हम ('मधुच्छन्दा') = मधुर इच्छाओंवाले होंगे। ('वैश्वामित्र:)= सभी के हित चाहनेवाले होंगे।

    भावार्थ

    मैं प्रभु के प्रति अपने सख्यभाव को दृढ़ करनेवाला बनूँ।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( पुरु निष्षिधे ) = इन्द्रियों या प्रजाओं में सब प्रकार की गति देनेहारे, व्यापक ( इन्द्राय ) = आत्मा की ( वर्धनं ) = महिमा दर्शाने वाला, ( उक्थं ) = वेदमन्त्र ( शंस्यं ) = उच्चारण करना चाहिये । ( यथा ) = जिससे ( शक्र: ) = वह सर्वशक्तिमान् ईश्वर ( सुतेषु ) = हमारे पुत्र पौत्रों या यज्ञों में और ( सख्येषु च ) = मित्रों और मित्रता के कार्यों में भी ( नः ) = हमें ( रारणत् ) = प्रसन्न रक्खे ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - मधुच्छन्दा:।

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - अनुष्टुभ् ।

    स्वरः - गान्धारः

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    इन्द्राय केन प्रयोजनेन कीदृशं स्तोत्रं शंसनीयमित्याह।

    पदार्थः

    अस्माभिः पुत्रकलत्रमित्रादिसहितैः (पुरुनिष्षिधे) पुरून् बहून् निष्षेधति निस्सारयति पापपङ्कात् सङ्कटाद् वा यस्तस्मै। पुरूपपदात् निस्पूर्वाद् गत्यर्थात् षिधु धातोः कर्तरि क्विप्। (इन्द्राय) परमोपदेशकाय परमात्मने, तादृशम् (उक्थम्) स्तोत्रम् (शंस्यम्) शंसनीयम्, यत् (वर्धनम्) स्तोतॄणामस्माकं वृद्धिकरं भवेत्, (यथा) येन (शक्रः) स सर्वशक्तिमान् परमात्मा (नः) स्तोतॄणाम् अस्माकम् (सुतेषु२) पुत्रकेषु (सख्येषु३ च) सखिषु च। सख्यं येषामस्तीति ते सख्याः ‘अर्शआदिभ्योऽच्। अ० ५।२।१२७’ इति मत्वर्थे अच् प्रत्ययः। (रारणत्४) अतिशयेन पुनः पुनः प्रेरणात्मकम् उपदेशं दद्यात्। शब्दार्थाद् रणधातोर्यङ्लुगन्ताल्लेटि रूपम् ॥४॥५

    भावार्थः

    स्तुतः परमेश्वरः स्तोतृभ्यो जनेभ्यः, स्तोतृभ्यस्तत्पुत्रमित्रादिभ्यश्च पुरुषार्थादेः सत्प्रेरणां सदुपदेशं च दत्त्वा तानुन्नयति ॥४॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० १।१०।५। २. सुतेषु अभिषुतेषु सोमेषु—इति वि०। पुत्रेषु—इति सा०। उत्पादितेषु स्वकीयसन्तानेषु—इति ऋ० १।१०।५ भाष्ये द०। ३. सखीनां कर्मसु भावेषु पुत्रस्त्रीभृत्यवर्गादिषु वा इति तत्रैव द०। ४. रारणत् अतिशयेन उपदिशति। यङ्लुगन्तस्य रणधातोर्लेट्प्रयोगः—इति तत्रैव द०। रमेरेतद् रूपम्। छान्दसेन मकारस्य णत्वम्। अत्यर्थं रमते—इति वि०। भृशं रमते। रमेर्वर्णव्यत्ययः, रणिर्वा रमेरर्थे वर्तते। यथा रारणत् तथा शस्यम्—इति भ०। यथा येन प्रकारेण रारणत् अतिशयेन शब्दं कुर्यात् तथा शंस्यम्। अस्मदीयेन शस्त्रेण परितुष्ट इन्द्रः नोऽस्माकं पुत्रान् अस्मत्सख्यानि च बहुधा प्रशंसत्वित्यर्थः—इति सा०। ५. दयानन्दर्षिरस्य मन्त्रस्य ऋग्भाष्ये इन्द्रशब्देन सर्वमित्रमैश्वर्येच्छुकं जीवात्मानं, शक्रशब्देन च सर्वशक्तिमन्तं जगदीश्वरं गृहीतवान्।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    We should recite Vedic verses to testify to the glory of the soul that pervades the body. May God, whereby keep us busy with scientific researches and acts of comradeship.

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    Meaning

    Just as a man rejoices with his children and friends and bestows lots of knowledge and wealth on them, so does Shakra, omnipotent Indra, lord of wealth and knowledge, rejoice to bestow admirable mantras of elevating light of Vedic lore on the generous soul for its advancement. (Rg. 1-10-5)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ


    પદાર્થ : (पुरु निःषिधे) બહુજ અથવા અત્યંત પાપદોષ નિવારક ગુણસાધક (इन्द्राय) પરમાત્માને માટે (वर्धनम् उक्थं शंस्यम्) અમારી બુદ્ધિના સાધનભૂત વક્તવ્ય પ્રશંસા યોગ્ય સ્તુતિ વચન કહેવા જોઈએ. (यथा) જેથી (शक्रः) સર્વ શક્તિમાન સમર્થ પરમાત્મા (नः) અમારા (सुतेषु) નિષ્પન્ન ઉપાસનારસોમાં (च) અને (सख्येषु) મિત્ર ભાવોમાં (रारणत्)રમણ કરે-રુચિ કરે. (૪)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્મા અત્યંત દોષ નિવારક અને ગુણ સાધક છે, તેથી કૃતજ્ઞતા પ્રકટ કરવા માટે સ્વવૃદ્ધિ કર, પ્રશંસનીય સ્તુતિ વચનો કહેવા જોઈએ, જેથી તે સર્વ સમર્થ પરમાત્મા અમારોઉપાસનારસોનો સ્વીકાર કરવામાં અને અમારા મિત્રભાવો-પ્રેમભાવોમાં રમે-રુચિ કરે-અમને રુચિપૂર્વક અપનાવે. (૪)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    بُرائیوں سے چھُوٹنے کیلئے وید منتروں کو گائیں!

    Lafzi Maana

    (پُوروُ نِشدھے اِندرائے وردھنم اُکتھم شنسیم) پاپوں سے چھُوٹنے کے لئے بھگوان کی مہما کے وید منتروں کو گانا چاہیئے، (یتھا شکرہ نہ سُوتیشُو) جس سے وہ عظیم طاقتور بھگوان ہمارے آل اولاد ہیں (چہ سکھیشُو رارنت) اور ہمارے دوستوں میں راہ راست پر چلنے کی ترغیب دے، لہٰذا ویدوں کے سُوکت (باب) ہماری ترقی کی راہیں ہیں!

    Tashree

    پاپ ناشک اِندر کی کبھی دوستی ٹوٹی نہیں، اولاد میں بھی اِیش کی پُوجا کبھی چھُوٹے نہیں۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    स्तुती केला गेलेला परमेश्वर प्रशंसकांना व त्यांच्या पुत्र, मित्र इत्यादींना पुरुषार्थ इत्यादीची शुभ प्रेरणा व सदुपदेश देऊन त्यांची उन्नती करतो. ॥४॥

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    विषय

    कोणत्या प्रयोजनामुळे इंद्राची कोणत्या स्तोत्राद्वारे स्तुती करावी ?

    शब्दार्थ

    पुत्र, पत्नी, मित्रादीसह (पुरुनिष्षिधे) अनेकांचा पाप- पंकापासून अथवा संकटापासून उद्धार करणाऱ्या (इंद्राव) त्या परम उपदेशक परमेस्वरासाठी अशा प्रकारच्या (उक्थम्) स्तोत्राचे (शस्यम्) गायन केले पाहिजे की जे आम्हा स्तोताजनांची (वर्धनम्) वृद्धी वा उत्कर्ष साधणारे असेल (तसेच ते गान असे मनापासून गेले असावे की (यथा) ज्यामुळे (शक्रः) तो सर्व शक्तिमान परमेश्वर (नः) आम्हा उपासकांच्या (सुतेषु) पुत्रांना (सक्येषुच) आणि मित्रांना (रारणत्) पुन्हा पुन्हा प्रेरणापूर्ण उपदेश देत राहील.।। ४।।

    भावार्थ

    त्याची स्तुती व प्रार्थना केल्यामुळे परमेश्वर स्तोताजनांना तसेच त्यांच्या पुत्र, मित्रादींना पुरुषार्थ करण्याची सत्प्रेरणा देऊन व त्यांना सदुपदेश (मानसिक सुविचार) देऊन त्यांचे उत्कर्ष घडवितो.।। ४।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    சக்திமானான அவன் சோமன்களில் நண்பர்களில் சந்தோஷமுடனாக வெகு சத்துருக்களை [1] நிஷேதஞ் செய்பவனான இந்திரனுக்கு விஷயங்களை வளர்ச்சியாக்கும் மந்திரத்தைச் சொல்லவேண்டும்.

    FootNotes

    [1] நிஷேதஞ் செய்பவனான -தாழ்மை செய்பவனான

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