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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 380
ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
30
प्र꣢ म꣣न्दि꣡ने꣢ पितु꣣म꣡द꣢र्च꣣ता व꣢चो꣣ यः꣢ कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भा नि꣣र꣡ह꣢न्नृ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣢वो꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिणं म꣣रु꣡त्व꣢न्तꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ हुवेमहि ॥३८०॥
स्वर सहित पद पाठप्रं꣢ । म꣣न्दि꣡ने꣢ । पि꣣तुम꣢त् । अ꣣र्चत । व꣡चः꣢꣯ । यः । कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भाः । कृ꣣ष्ण꣢ । ग꣣र्भाः । निर꣡ह꣢न् । निः꣣ । अ꣡ह꣢꣯न् । ऋ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣡वः꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णम् । व꣡ज्र꣢꣯दक्षिणम् । व꣡ज्र꣢꣯ । द꣣क्षिणम् । मरु꣡त्व꣢न्तम् । स꣣ख्या꣡य꣢ । स꣣ । ख्या꣡य꣢꣯ । हु꣣वेमहि ॥३८०॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना । अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तꣳ सख्याय हुवेमहि ॥३८०॥
स्वर रहित पद पाठ
प्रं । मन्दिने । पितुमत् । अर्चत । वचः । यः । कृष्णगर्भाः । कृष्ण । गर्भाः । निरहन् । निः । अहन् । ऋजिश्वना । अवस्यवः । वृषणम् । वज्रदक्षिणम् । वज्र । दक्षिणम् । मरुत्वन्तम् । सख्याय । स । ख्याय । हुवेमहि ॥३८०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 380
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 11
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 3;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 11
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 3;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य के गुण-कर्मों का वर्णन किया गया है।
पदार्थ
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे मनुष्यो ! तुम (मन्दिने) आनन्दयुक्त तथा आनन्दप्रदाता इन्द्र जगदीश्वर के लिए (पितुमत्) श्रद्धारूप रस से युक्त (वचः) स्तुतिवचन को (प्र अर्चत) प्रेरित करो, (यः) जो जगदीश्वर (ऋजिश्वना) सीधी जानेवाली किरणों से युक्त सूर्य के द्वारा (कृष्णगर्भाः) अन्धकारपूर्ण रात्रियों को (निरहन्) नष्ट करता है। आओ, (अवस्यवः) रक्षा की कामनावाले हम-तुम (वृषणम्) बादल से वर्षा करनेवाले अथवा सुखों के वर्षक, (वज्रदक्षिणम्) न्यायदण्ड जिसके प्रताप को बढ़ानेवाला है ऐसे, (मरुत्वन्तम्) प्रशस्त प्राणोंवाले इन्द्र जगदीश्वर को (सख्याय) मित्रता के लिए (हुवेमहि) पुकारें ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। हे सहपाठियो ! तुम (मन्दिने) आनन्ददाता तथा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य के लिए (पितुमत्) उत्कृष्ट अन्न सहित (वचः) आदरपूर्ण प्रियवचन (प्र अर्चत) उच्चारण करो, (यः) जो आचार्य (ऋजिश्वना) सरल शिक्षापद्धति से (कृष्णगर्भाः) काला अज्ञान जिनके गर्भ में है, ऐसी अविद्या-रात्रियों को (निरहन्) नष्ट करता है। (अवस्यवः)विद्या की तृप्ति को चाहनेवाले हम-तुम (वृषणम्) सद्गुणों की वर्षा करनेवाले, (वज्रदक्षिणम्) कुपथ से हटानेवाला है विद्यादान जिसका ऐसे, और (मरुत्वन्तम्) विद्यायज्ञ के ऋत्विज् प्रशस्त विद्वान् अध्यापक जिसके पास हैं, ऐसे आचार्य को (सख्याय) मैत्री के लिए (हुवेमहि) स्वीकार करें ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ॥११॥
भावार्थ
अहो, परमेश्वर हमारे प्रति कैसी मित्रता का निर्वाह करता है ! सर्वत्र व्याप्त हुई रात्रि के अन्धकार को निवारण करने और वर्षा करने में क्या हम जैसों का सामर्थ्य हो सकता है? वही हमारे उपकार के लिए इस प्रकार के विविध कर्मों को विना हमसे कोई शुल्क लिये कर रहा है। गुरु का भी हमारे प्रति कैसा महान् उपकार है, जो समस्त अविद्या-रात्रि को हटाकर ज्ञान की वर्षा से हमारी अन्तःकरण की भूमि को सरस करता है। इसलिए परमेश्वर और गुरु का हमें सर्वात्मना पूजन और सत्कार करना चाहिए ॥११॥ इस मन्त्र पर भरतस्वामी ने यह इतिहास लिखा है कि यह गर्भस्राविणी उपनिषद् है। कृष्ण नाम का एक असुर था, उस कृष्ण से गर्भवती हुई उसकी भार्याओं को इन्द्र ने गर्भ नष्ट करने के लिए मार डाला था। ऋजिश्वा नामक राजर्षि कृष्णासुर का शत्रु था, उसके हितार्थ ही इन्द्र ने कृष्णासुर का भी वध कर दिया और उसके पुत्र भी उत्पन्न न हों, इस हेतु से उसकी गर्भवती भार्याओं का भी वध कर दिया। सायण ने भी अपने भाष्य में ऐसा ही इतिहास लिखा है। किन्तु यह कल्पना का विलासमात्र है, इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। सत्यव्रत सामश्रमी ने सायण की व्याख्या को अरुचिकर मानते हुए टिप्पणी दी है कि—यहाँ विवरणकार का व्याख्यान अधिक उत्कृष्ट है, जिसने आधिदैविक अर्थ करते हुए लिखा है कि ‘कृष्णगर्भाः’ का तात्पर्य है काले मेघ में गर्भरूप से रहनेवाले जल, जिन्हें इन्द्र उनमें से निकालकर बरसा देता है। ‘निरहन्’ में हन् धातु अन्तर्णीतण्यर्थ है, जिसका अर्थ निकालना या नीचे गिरा देना है’’ ॥ इस दशति में इन्द्र की महिमा वर्णित होने, उसके स्तोत्र गाने के लिए प्रेरणा होने, द्यावापृथिवी के भी उसी के धर्म से धृत होने तथा इन्द्र नाम से राजा के भी कर्तव्य का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
पदार्थ
(मन्दिने) स्तुति करने योग्य परमात्मा के लिए “मन्दी मन्दतेः स्तुतिकर्मणः” [निरु॰ ४.२४] (पितुमत्-वचः) प्यायन—प्रसन्नता कारक वचन “पितुः प्यायतेर्वा” [निघं॰ ९.२४] (प्रार्चत) प्रार्चित करो—भेंट समर्पित करो (यः) जो परमात्मा (ऋजिश्वना) सरलगति शक्ति से (कृष्णगर्भाः) पाप जिनके गर्भ में—अन्दर है—पापगर्भित वृत्तियों वासनाओं को (निरहन्) निर्हत कर देता है (वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तम्) उस सुखवर्षक ओज के प्रेरक प्राणवान् सबमें प्राणप्रद परमात्मा को (सख्याय) मित्रभाव के लिए (अवस्यवः) हम रक्षा चाहने वाले (हुवेमहि) आमन्त्रित करें।
भावार्थ
परमात्मा हमारी पापगर्भित वृत्तियों को अपने सरल स्वभाव से नष्ट कर देता है यदि हम उस स्तुति करने योग्य के लिए प्रसन्नताकारक स्तुतिवचन अर्पित करें। उस ऐसे सुखवर्षक ओज के प्रसारक प्राणसञ्चारक परमात्मदेव को मित्रता के लिए हम अपनी रक्षा चाहने वाले उपासक नित्य निरन्तर हृदय में आमन्त्रित करते रहें॥११॥
टिप्पणी
[*31. “कुत्सः कर्ता स्तोमानान्” [निरु॰ ३.११]।]
विशेष
ऋषिः—कुत्सः (परमात्मा की स्तुति करने वाला*31)॥ छन्दः—जगती॥<br>
विषय
कैसा मित्र
पदार्थ
१. (मन्दिने) = सदा प्रसन्नता प्राप्त करानेवाले प्रभु के लिए (पितुमत् वच:) = रक्षणात्मक प्रार्थना-वचन (प्र अर्चत) = खूब उच्चारण करो, रक्षणात्मक प्रार्थना-वचनों से प्रभु की पूजा करो। वस्तुतः प्रभु से सांसारिक सुख भोगों की याचना करके हम प्रभु का भी आदर नहीं कर रहे होते। ‘प्रभु हमें काम-क्रोधादि आसुर वृत्तियों से सुरक्षित करें' यही सर्वोत्तम प्रार्थना है, यही प्रभु की सच्ची पूजा भी है। इन प्रार्थनाओं को क्रियारूप में अपने जीवन में लाकर हम अपने जीवनों को प्रसादमय बना पाते हैं। प्रभु (मन्दिन्) = हमें प्रसन्न करनेवाले तो हैं ही।
२. उस प्रभु के लिए हम रक्षणात्मक प्रार्थना वचन कहें (यः) = जो (कृष्णगर्भाः) = मनुष्यों के गर्भ में विद्यमान कालिमा को, काली-अशुभ पापमयी चित्तवृत्तियों को (ऋजिश्वना) = सरल मार्ग से (निरहन्) = नष्ट करते हैं। ('युयोधि अस्मत् जुहुराणमेन:') = हमसे कुटिल पाप को दूर कीजिए।
३. हमारी वृत्ति शुभाशुभ बहुत कुछ सङ्ग व साथ से बनती है। इसीलिए कहते हैं कि (अवस्यवः) = रक्षण चाहते हुए हम (सख्याय) = मित्रता के लिए (हुवेमहि) = पुकारते हैं। किसको ?
[क] (वृषणम्) = जो बरसनेवाला है, जो कृपण नहीं।
[ख] (वज्रदक्षिणम्) = जो शरीर में वज्र तुल्य है और मस्तिष्क में चतुर है। निर्बल शरीरवाला अधिक लोकहित नहीं कर सकता और मूर्ख व्यक्ति हमें संकटों से बचा नहीं सकता।
[ग] (मरुत्वन्तम्) = जो प्राणोंवाला है। जिसने प्राणों की साधना की है। प्राण साधना चित्त व इन्द्रियों के मलों को दूर कर उन्हें निर्मल बनाती है। निर्मल मनवाला मित्र ही सर्वोत्तम मित्र है। सब वसनाओं को कुचल डालने से ही यह इस मन्त्र का ऋषि ‘कुत्स’ ‘कुथ हिंसायाम्' है।
भावार्थ
प्रभु के प्रति मैं रक्षणात्मक प्रार्थना - वचन कहूँ । सरल मार्ग से चल कर हृदय की कालिमा को धो डालूँ। दानी, सबल, चतुर व साधु स्वभाव मित्रों के साथ विचरूँ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( प्रमन्दिने ) = उत्कृष्ट हर्ष, आनन्दयुक्त ईश्वर के लिये ( पितुमत् ) = सारवान् ( वचः ) = वाणियां ( अर्चत ) = उच्चारण करो। ( यः ) = जो अपने प्रभाव से ( कृष्णगर्भा: ) = पाप को अपने भीतर धरनेहारी दुष्प्रवृत्तियों को ( ऋजिश्विना ) = सरल ज्ञान से ( नि: अहन् ) = नाश करता है । ( अवस्यवः ) = रक्षण की इच्छा करने हारे ( वृषणं ) = सुख वर्षण करने हारे ( वज्रदक्षिणं ) = विघ्नविनाशकों में श्रेष्ठ ( मरुत्वन्तं ) = प्राणों के ओर प्रजाओं के आश्रय परमेश्वर को हम ( सख्याय ) = अपने मित्रभाव के लिये ( हुवेमहि ) = आह्वान करते हैं ।
टिप्पणी
३८० – 'हवामहे' इति ऋ० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - कुत्स:।
देवता - इन्द्रः।
छन्दः - जगती।
स्वरः - निषादः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमात्मन आचार्यस्य च गुणकर्माणि वर्णयति।
पदार्थः
प्रथमः—परमात्मपरः। हे जनाः ! यूयम् (मन्दिने) आनन्दिताय आनन्दप्रदाय च इन्द्राय जगदीश्वराय। मदि स्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु इति धातोस्ताच्छील्ये णिनिः। (पितुमत्) श्रद्धारूपेण रसेन युक्तम्। ‘तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः। ऋ० १।१८७।४’ इति श्रुतेः, तत्रैव ‘यत् ते सोम। ऋ० १।१८७।९’ इत्युक्तेश्च पितुर्वै रसमयः सोमः। (वचः) स्तुतिवचनम् (प्र अर्चत) प्रेरयत, (यः) यो जगदीश्वरः (ऋजिश्वना) ऋजयः सरलगामिनः श्वानः किरणा यस्य स ऋजिश्वा सूर्यः तेन (कृष्णगर्भाः) कृष्णं तमः (गर्भे) यासां ताः कृष्णगर्भाः रात्रीः (निरहन्) निर्हन्ति। आगच्छत, (अवस्यवः) रक्षणं कामयमानाः यूयं वयम् च। अवस् शब्दात् आत्मन इच्छार्थे क्यच्, ‘क्याच्छन्दसि। अ० ३।२।१७०’ इति उः प्रत्ययः। (वृषणम्) मेघाद् वृष्टिकर्तारं सुखवर्षकं वा, (वज्रदक्षिणम्) वज्रः न्यायदण्डः दक्षिणः प्रतापवृद्धिकरो यस्य तम्। दक्षतिः समर्द्धयतिकर्मा निरुक्ते १।६। (मरुत्वन्तम्) प्रशस्तप्राणम् इन्द्रं जगदीश्वरम् (सख्याय) सखिभावाय (हुवेमहि) आह्वयेम। ह्वेञ् धातोर्लिङि छान्दसं रूपम्। ‘हुवेम ह्वयेम’ इति निरुक्तम् ११।३१ ॥ अथ द्वितीयः—गुरुशिष्यपरः। हे सहाध्यायिनः ! यूयम् (मन्दिने) मोदप्रदाय इन्द्राय विद्यैश्वर्ययुक्ताय आचार्याय (पितुमत्) उत्कृष्टान्नसहितम्। पितुरित्यन्ननाम, पातेर्वा पिबतेर्वा प्यायतेर्वा। निरु० ९।२४। (वचः) आदरपूर्णं प्रियवचनम् (प्र अर्चत) उच्चारयत, (यः) आचार्यः (ऋजिश्वना२) ऋजुगतियुक्तेन अध्यापनमार्गेण, सरलशिक्षापद्धत्येत्यर्थः। ऋजि ऋजु यथा स्यात्तथा श्वयति गच्छतीति ऋजिश्वा सरलोऽध्यापनमार्गः तेन। (कृष्णगर्भाः) कृष्णम् अज्ञानं गर्भे यासां ताः अविद्यारात्रीः (निरहन्) हिनस्ति। (अवस्यवः) अवः विद्यातृप्तिम् इच्छवः यूयम् वयं च। अव रक्षणगतिकान्तिप्रीतितृप्त्यादिषु, अत्र तृप्त्यर्थे ग्राह्यः। (वृषणम्) सद्गुणवर्षकम्, (वज्रदक्षिणम्३) वज्रा कुपथाद् वर्जनकरी दक्षिणा विद्यादत्तिः यस्य तम्। वज्रः वर्जयतीति सतः। निरु० ३।११। (मरुत्वन्तम्४) प्रशस्ताः मरुतः विद्यायज्ञस्य ऋत्विजः विद्वांसोऽध्यापकाः यस्य तम् इन्द्रम् आचार्यम्। मरुत इति ऋत्विङ्नाम। निघं० ३।१८। (सख्याय) सखित्वाय (हुवेमहि) स्वीकुर्याम। हु दानादनयोः, आदाने चेत्येके ॥११॥५ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥११॥
भावार्थः
अहो, कीदृशं सख्यं परमेश्वरोऽस्मान् प्रति निर्वहति। सर्वत्र व्याप्ताया रात्रेन्धकारनिवारणे वृष्टिकरणे वा किमस्मादृशां सामर्थ्यम् ! स एवास्मदुपकाराय निश्शुल्कमेव तादृशानि विविधानि कर्माणि करोति। गुरोरप्यस्मान् प्रति कीदृशो महानुपकारो यो हि सकलामप्यविद्यानिशां निरस्य ज्ञानवृष्ट्यास्माकमन्तःकरणभूमिं सरसयति। अतः परमेश्वरो गुरुश्चास्माभिः सर्वात्मना पूजनीयः सत्करणीयश्च ॥११॥ अत्र भरतस्वामी इतिहासं प्रदर्शयन्नाह—“एषा गर्भस्राविणी उपनिषत्।....यः इन्द्रः कृष्णगर्भाः कृष्णेन असुरेण आहितगर्भाः कृष्णस्य भार्याः निरहन् निर्जघान, गर्भच्यावनाय। ऋजिश्वना राजर्षिणा हेतुना, तदर्थमित्यर्थः। ऋजिश्वनः शत्रुः कृष्णः। तं कृष्णं हत्वा तस्य सन्तानाभावाय गर्भानपि जघान” इति। सायणोऽपि६ तादृशमेवेतिहासं व्याजहार। तत्तु कल्पनाविलसितमेव, नात्र वस्तुतत्त्वं किञ्चिदित्यध्यवसेयम्। सत्यव्रतसामश्रमिणः सायणीयं व्याख्यानमरुचिकरं मन्यमाना आहुः—“विवरणकारस्य व्याख्यानमुत्कृष्टतरम्। तथाहि—कृष्णगर्भाः कृष्णो मेघः तस्य गर्भभूता आपः निरहन्। हन्तिर्गत्यर्थः अन्तर्णीतण्यर्थश्च द्रष्टव्यः। निर्गमितवान् पातितवानित्यर्थः।” इति ॥ अत्रेन्द्रमहिमवर्णनात्, तत्स्तोत्रं गातुं प्रेरणाद्, द्यावापृथिव्योरपि तद्धर्मधृतत्ववर्णनाद्, इन्द्रनाम्ना नृपतेरपि कर्तव्यवर्णनाच्चैतद्दशत्यर्थस्य पूर्वदशत्यर्थेन संगतिरस्तीति विजानीत ॥ इति चतुर्थे प्रपाठके द्वितीयार्धे चतुर्थी दशतिः ॥ इति चतुर्थेऽध्याये तृतीयः खण्डः ॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १।१०१।१, ‘हुवेमहि’ इत्यत्र ‘हवामहे’ इति पाठः। २. ऋजवः सरलाः श्वानो वृद्धयो यस्मिन्नध्ययने तेन—इति ऋ० १।१०१।१ भाष्ये द०। ३. वज्रा अविद्याच्छेदिका दक्षिणा यस्मात् तम्—इति तत्रैव द०। ४. प्रशस्ताः मरुतो विद्यावन्तः ऋत्विजोऽध्यापका विद्यन्ते यस्मिंस्तम्—इति तत्रैव द०। ५. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमेतम् ‘शालाध्यक्षः (अध्यापकः) कीदृशः स्यादिति’ विषये व्याख्यातवान्। ६. तथा हि—“यः इन्द्रः ऋजिश्वना एतत्संज्ञकेन राजर्षिणा सख्या सहितः सन् कृष्णगर्भाः कृष्णो नाम कश्चिदसुरः, तेन निषिक्तगर्भाः तदीया भार्याः निरहन् नितरामवधीत्। कृष्णमसुरञ्च तत्पुत्राणामनुत्पत्त्यर्थं गर्भिणीस्तस्य भार्या अपि अवधीदित्यर्थः”—इति सायणः।
इंग्लिश (2)
Meaning
Recite laudatory words for God* the Embodiment of joy, Who with His knowledge drives away the evil tendencies, the mother of sin. Let us, desiring help call Him for friendship, Showerer of happiness, the Foremost Remover of obstacles, the Mainstay of His subjects.
Meaning
All ye men and women of the earth, offer words of welcome and hospitality to joyous Indra, lord giver of the power of knowledge, who, in a simple natural manner, breaks open the secret treasures of the dark womb of nature and makes the streams of knowledge flow. We, seekers of protection and knowledge, invoke Indra, lord of light and power, rich and generous, expert in the use of the thunderbolt of knowledge against the demon of darkness, and commander of the tempestuous Maruts of social dynamics, and we pray for his love and friendship. (Rg. 1-101-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (मन्दिने) સ્તુતિ કરવા યોગ્ય પરમાત્માને માટે (पितुमत् वचः) પ્રસન્નતાકારક વચન (प्रार्चत) ભેટ સમર્પિત કરો. (यः) જે પરમાત્મા (ऋजिश्वना) સરળગતિ શક્તિથી (कृष्णगर्भा) પાપ જેના ગર્ભમાંઅંદર છે-પાપગર્ભિત વૃત્તિઓ વાસનાઓને (निरहन्) નષ્ટ કરી દે છે (वृषण वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तम्) તે સુખવર્ષક ઓજના પ્રેરક પ્રાણવાન સર્વમાં પ્રાણપ્રદ પરમાત્માને (सख्याय) મિત્રભાવ માટે (अवस्यवः) અમે રક્ષા ચાહનારા (हुवेमहि) આમંત્રિત કરીએ છીએ. (૧૧)
भावार्थ
ભાવાર્થ : પરમાત્મા અમારી પાપગર્ભિત વૃત્તિઓને પોતાના સરળ સ્વભાવથી નષ્ટ કરી દે છે, જો અમે તે સ્તુતિ કરવા યોગ્યને માટે પ્રસન્નતાકારક સ્તુતિવચન અર્પિત કરીએ. તે એવા સુખની વર્ષા કરનાર, ઓજના પ્રસારક, પ્રાણ સંચારક પરમાત્મ દેવને મિત્રતાને માટે અમે અમારી રક્ષા ચાહનાર ઉપાસક નિત્ય નિરંતર હૃદયમાં આમંત્રિત કરતા રહીએ. (૧૧)
उर्दू (1)
Mazmoon
پرجاؤں کی رکھشا کیلئے بھگوان کا آواہن
Lafzi Maana
آنند روپ بھگوان کے لئے امرت بانیاں اُچارن کرو، جو اپنے اثر سے ہمارے اندر کے خیالات بد کو اپنے ستیہ گیان سے زائل کر دیتا ہے، رکھشا اور سُکھ کی ورشا کرنے والے ہمارے مددگار اوّلین اور ہمارے پرانوں اور پرجاؤں کے واحد سہارے پرمیشور کا ہم سچے متّر کے طور پر آواہن کرتے ہیں، بُلاتے ہیں۔
Tashree
ہے ہمارا دوست سّچا اور سب پر مہرباں، اِس لئے تو یاد کرتے اُس کو سب کرو بیاں۔
मराठी (2)
भावार्थ
परमात्मा आमच्याबरोबर कसा मित्रतेचा निर्वाह करतो ते पहा! सर्वत्र व्याप्त असलेल्या रात्रीच्या अंधकाराचे निवारण करणे व वृष्टी करणे हे आमचे सामर्थ्य आहे काय? तोच कोणतेही शुल्क न घेता आमच्यावर उपकार करण्यासाठी विविध प्रकारचे कार्य करत आहे. गुरूही आमच्यावर किती उपकार करत असतो, जो संपूर्ण अविद्यारूपी रात्र हटवून, ज्ञानाचा वर्षाव करून आमच्या अंतकरणाच्या भूमीला सरस करतो. त्या परमेश्वराचा व गुरूचा आम्ही सर्व प्रकारे सत्कार करून पूजन केले पाहिजे ॥११॥
टिप्पणी
या मंत्रावर भरत स्वामीने हा इतिहास लिहिलेला आहे की हे गर्भस्राविणी उपनिषद् आहे. कृष्ण नावाचा एक असुर होता. त्या कृष्णाच्या र्गीावती स्त्रियांना इंद्राने गर्भ नष्ट करण्यासाठी मारले. ऋजिश्वा नावाचा राजर्षि कृष्णासुराचा शत्रू होता. त्याच्या हितासाठी इंद्राने कृष्णासुरांचाही वध केला व त्याला पुत्रही उत्पन्न होऊ नये, या हेतुने त्याच्या गर्भवती बायकांचाही वध केला. सायणनेही आपल्या भाष्यात असाच इतिहास लिहिलेला आहे; परंतु हा कल्पनाविलास आहे. यात मुळीच वास्तविकता नाही. सत्यव्रत सामश्रमीने सायणच्या व्याख्येला अरुचिकर मानून लिहिले आहे - येथे विवरणकाराचे व्याख्यान अधिक उत्कृष्ट आहे, ज्याने आधिदैविक अर्थ करत लिहिलेले आहे की ‘कृष्णगर्भा:’ चे तात्पर्य हे आहे काळ्या मेघात गर्भरूपाने राहणारे जल, ज्याना इंद्र त्यातून काढून वृष्टी करवितो. ‘निरहन’ मध्ये हन् धातु अन्तर्णीतव्यर्थ आहे, ज्याचा अर्थ काढणे किंवा खाली पाडणे असा आहे ॥ या दशतिमध्ये इंद्राची महिमा वर्णित असल्यामुळे, त्याचे स्तोत्र गाण्यासाठी प्रेरणा असल्यामुळे, द्यावा पृथ्वीचेही त्याच धर्माने धृत असल्यामुळे व इंद्र नावाने राजाच्या कर्तव्याचे वर्णन असल्यामुळे, या दशतिच्या विषयाची पूर्व दशतिच्या विषयाबरोबर संगती आहे
विषय
परमेश्वराच्या आणि आचार्याच्या गुण - कर्मांने वर्णन
शब्दार्थ
(प्रथम अर्थ) (परमात्मपर) हे मनुष्यानो, तुम्ही (मन्दिने) आनंदमय व आनंद प्रदाता इंद्र जगदीश्वराकडे (पितुमत्) अऩातील श्रद्धारूप रसाने भरलेली (वचः) स्तुतिवचने (प्र अर्चत) पाठवा (यः) तो जगदीश्वर (ऋजिश्वजा) सरळ जाणाऱ्या किरणे असलेला सूर्याच्या माध्यमातून (कृष्णगर्भाः) अंधाऱ्या रात्री (निरहन्) नष्ट करतो. तेव्हा लोकहो, या (अवस्यवः) रक्षणाची इच्छा करणारे आम्ही व तुम्ही (वृषणम्) मेघाद्वारे पाऊस पाडणाऱ्या अथवा सुखाची वृष्टी करणाऱ्या (वज्रदक्षिणम्) आणि ज्याचे न्याय व्यवस्था त्याचा प्रताप अधिकच वाढवते, अशा (मरुत्वसम्) प्रशस्त प्राणवान इंद्र परमेश्वराच्या (सख्याय) मैत्रीसाठी त्याला (हुवेमहि) हाक मारू या.।। द्वितीय अर्थ - (गुरू- शिष्यपर) हे सहाध्यायी मित्रहो, तुम्ही (मन्दिने) आनंददाता आणि विद्यारूप ऐश्वर्याने संपन्न आचार्यसाठी (पितुमत्) उत्कृष्ट अन्न (आणा) व (वचः) आदरयुक्त वचन (प्र अर्चत) उच्चारा. (यः) तो आचार्य (ऋविश्वना) सरल शिक्षण पद्धतीद्वारे (कृष्णगर्भाः) ज्यांच्या गर्भात काळे अज्ञान लपलेले आहे, अशा अविद्यारूप रात्रीद्वनां (निरहन्) विनष्ट करतो. (अवत्मवः) विद्येने तृप्ती इच्छिणारे आम्ही - तुम्ही (वृषणम्) सद्गुण - वर्षक आणि (वज्रदक्षिणम्) ज्याचे विद्यादान कुमार्गापासून परावृत्त करणारा आहे, अशा (मरुत्वन्तम्) विद्या यज्ञाचे, ऋत्विज प्रशस्त विद्वान अध्यापक ज्यांच्याकडे आहेत, अशा आचार्याच्या (सख्याय) मैत्रीसाठी (हुवेमहि) त्यांचा स्वीकार करू या.।। ११।।
भावार्थ
हे बांधवांनो, पहा, परमेश्वर आमच्याशी मैत्रीचा निर्वाह कसा करतो ? सर्वत्र व्यापलेल्या रात्रीच्या अंधकाराला दूर करण्याचे व आणि वृष्टी करणे असी कामे करण्याचे सामर्थ्य आत्मच्यासारख्यांजवळ आहे का ? तोच परमेश्वर आम्हांवर उपकार करण्यासाठी म्हणून वरील प्रकारची अनेक कार्ये करीत आहे आणि तेही काही शुल्क न आकारता. आमच्याप्रत गुरूदेखील कसा मोठा उपकार करीत आहे, हे पहा. जो समस्त अविद्या - रात्री दूर करून ज्ञानरूप यावसाद्वारे आमची हृदय- भूमी सरस करीत असतो. यामुळे आम्ही सर्वात्मना परमेश्वराचे व गुरूचे पूजन व सत्कार केला पाहिजे. ।। १।। या मंत्रावर भरत स्वामीने हा इतिहास लिहिला आहे - ही गर्भस्राविणी उपनिषद आहे. कृष्ण नावाचा एक असुर होता. कृष्णाकडून गर्भधारणा झालेल्या त्याच्या बायकांना इंद्राने ठार केले. यासाठी की त्यांच्या गर्भातील संतती संपावी. ऋजिश्वा नावाचा एक राजर्षी कृष्णासुराचा शत्रू होता. त्याच्या मदतीसाठी म्हणून इंद्राने कृष्णासुरालाही ठार केले आणि त्याच्यापासून त्याच्या बायकांच्या पोटी जन्मणारे पुक्षही जन्मा येऊ नये म्हणून इंद्राने गर्बवती बायकांचाही वध केला. सायणाचार्यानेही आपल्या भाष्यात असाच त्तिहास दाखविला आहे, पण हे सर्व केवळ कल्पना- प्रसूत असून या कथेत इंच मात्रही तथ्य नाही. श्री सत्यव्रत सामश्रमी यांनी सायणाच्या भाष्याविषयी अरुची दाखविताना असे लिहेल आहे, ‘‘येथे विवरणकाराची केलेली व्याख्या वा विवेचन अधिक चांगले आहे. कारण की त्याने मंत्राचा आधि दैनिक अर्ध करताना लिहिले आहे की ‘कृष्णगर्भाः’ म्हणजे कृष्ण मेघात असणारे पाणी, इंद्र ते पाणी मेघांतून काढून खाली फेकतो. ‘विरहन्’ या शब्दात हन् धातू अन्तर्णीतण्यर्थ आहे, ज्याचा अर्थ आहे - काढणे वा खाली फेकणे.’’ या दशतीमध्ये इंद्राचा महिमा, त्याचे स्तोत्रगान करण्यासाटी प्रेरणा, द्यावा - पृथिवी यांचे इंद्राच्याच भियमाने धृत असणे, तसेच इंद्र नावाने राजाच्या कर्तव्याचे वर्णन हे विषय आहेत. करिता या दशतीच्या विषयांचा पूर्व दशतीच्या विषयांशी संगती आहे, असे जाणावे.।। चतुर्थ प्रपाठकातील द्वितीय अर्धाची चतुर्थ दशती समाप्त. चतुर्थ अध्यायाचा तृतीय खंड समाप्त.
विशेष
या मंत्रात श्लेष अलंकार आहे.।।
तमिल (1)
Word Meaning
இந்திரனுக்கு ஹவிர் லட்சணமுடன்[1] பிதுருவுடன் மொழியை துதி செய்யவும்.
[2] ரிஜிஸ்வனியோடு [3] கிருஷ்ண கர்ப்பத்தை துரத்துபவனான ரட்சிப்பு விரும்பி விருப்பம் வர்ஷிக்கும் வலதில் வச்சிரமுடனான இந்திரனை [4]மருத்துக்களோடு அழைப்போம்.
FootNotes
[1] பிதுருவுடன் - பெரியாருடன்
[2] ரிஜிஸ்வனியோடு -சுலப ஞானத்தோடு
[3] கிருஷ்ண கர்ப்பத்தை - கெட்ட செயல்களின் ஆரம்ப எண்ணங்கள் [4]மருத்துக்களோடு - சுவாதீன ஆயுதமுடனான.
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