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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 399
    ऋषिः - सौभरि: काण्व: देवता - इन्द्रः छन्दः - ककुप् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    28

    अ꣣भ्रातृव्यो꣢ अ꣣ना꣡ त्वमना꣢꣯पिरिन्द्र ज꣣नु꣡षा꣢ स꣣ना꣡द꣢सि । यु꣣धे꣡दा꣢पि꣣त्व꣡मि꣢च्छसे ॥३९९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣣भ्रातृव्यः꣢ । अ꣣ । भ्रातृव्यः꣢ । अ꣣ना꣢ । त्वम् । अ꣡ना꣢꣯पिः । अन् । आ꣣पिः । इन्द्र । जनु꣡षा꣢ । स꣣ना꣡त् । अ꣣सि । युधा꣢ । इत् । आ꣣पित्व꣢म् । इ꣣च्छसे ॥३९९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि । युधेदापित्वमिच्छसे ॥३९९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अभ्रातृव्यः । अ । भ्रातृव्यः । अना । त्वम् । अनापिः । अन् । आपिः । इन्द्र । जनुषा । सनात् । असि । युधा । इत् । आपित्वम् । इच्छसे ॥३९९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 399
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 1
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 6;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में इन्द्र के शत्रु-रहित होने आदि का वर्णन है।

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) जगत् के उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कर्ता परमात्मन् ! तुम (सनात्) सनातन काल से (जनुषा) स्वभावतः (अभ्रातृव्यः) शत्रु-रहित, (अना) नेता-रहित और (अनापिः) अबन्धु (असि) हो। (युधा इत्) युद्ध से ही (आपित्वम्)बन्धुत्व को (इच्छसे) चाहते हो, अर्थात् जो आन्तरिक तथा बाह्य देवासुरसंग्रामों में विजयी होता है, उसी के तुम बन्धु होते हो ॥१॥ इस मन्त्र में अना, मना, सना में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। ‘त्वम, त्वमि’ में छेकानुप्रास है ॥१॥

    भावार्थ

    जिससे शत्रुता ठानने का कोई साहस नहीं करता और जिसका नेतृत्व करनेवाला कोई नहीं है, वह महान् जगदीश्वर पुरुषार्थियों का ही बन्धु बनता है, अकर्मण्यों का नहीं ॥१॥

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    पदार्थ

    (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (त्वम्) तू (अभ्रातृव्यः) शत्रु-रहित (अना) नेता से रहित (अनापिः) माता-पिता आदि सम्बन्धी से रहित (जनुषा-सनात्-असि) जन्म से—जन्मदृष्टि से तू नित्य है अर्थात् जन्मधारण से भी रहित—नित्य है (युधा-इत्-आपित्वम्-इच्छसे) अपनी ओर गति करने वाले के साथ ही—उपासक के साथ ही “युध्यति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] बन्धुत्व को चाहता है।

    भावार्थ

    परमात्मा का कोई शत्रु नहीं, वह किसीसे शत्रुता नहीं रखता, उसका नेता नहीं स्वयंकार्यविधाता है न उसका कोई सम्बन्धी है, जन्म से— जन्म का साथी हो ऐसा कहा जावे तो वह नित्य है शाश्वत है जन्म नहीं लेता हाँ, उसकी ओर गति करने वाले उपासक के साथ सम्बन्ध चाहता है उसे अपनाता है॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—सौभरिः (परमात्मा को अपने अन्दर अच्छा भरने वाला)॥ छन्दः—ककुप्॥<br>

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    विषय

    [ जीव स्वभावतः पवित्र है ] तीन प्रकार का युद्ध

    पदार्थ

    प्रभु जीव से कहते हैं कि (इन्द्र) = हे जीवात्मन्! (त्वम्) = तू (जनुषा) = जन्म से (सनात्) = अनादिकाल से (अभ्रातृव्य) = शत्रु से रहित (अस:) है (अना) = [नृ= नेता] नेता से रहित है और (अनापि असिः) = [आपि=a friend] मित्र से रहित है। संसार में वैयक्तिक संघर्षों में ईर्ष्या-द्वेष यहाँ तक बढ़ जाता है कि भाई-भाई नहीं रह जाता, वह भ्रातृव्य - शत्रु बन जाता है । इन युद्धों में पड़कर मनुष्य का जीवन अशान्त हो जाता है। उसकी शक्ति अपने उत्थान में न लगकर दूसरों को गिराने में लगती है। इन वैयक्तिक युद्धों के द्वारा वह कितने ही भ्रातृव्यों को पैदा कर लेता है।

    इसी प्रकार कई बार राष्ट्रों के परस्पर हित टकराते से प्रतीत होते हैं - या एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को स्वार्थवश दबाना चाहता है तो उस समय राष्ट्रीय हित की भावना [देशभक्ति= Patriotism] राष्ट्रों को परस्पर लड़ा देती है। अपने प्राणों को हथेली पर लेकर देशभक्त लोग एक दूसरे को कुचल डालने के लिए, और अपने राष्ट्र के गौरव की स्थापना में तुल जाते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें अपना एक नेता चुनना पड़ता है। यह जैसा - जैसा कहता है वैसा-वैसा ही ये अनुयायिवर्ग करता है। ये सब इन युद्धों के कारण ‘ना'–नेतावाला हो जाते हैं।

    इन दोनों युद्धों के अतिरिक्त एक युद्ध और भी है, और यवह युद्ध हृदयस्थली पर चलनेवाला दैवी व आसुरी वृत्तियों का संघर्ष है। इसे ही देवासुर संग्राम भी कहते हैं। इस

    देवासुर संग्राम में हमें काम बड़ा प्रमाथि व कुचल देनेवाला दिखता है = क्रोध अजय्य-सा प्रतीत होता है। बार-बार असमर्थ होकर हम उस अचिन्य शक्ति की ओर झुकते हैं और उससे कहते हैं कि “त्वया स्विद युजावयम्" - तुझ से मिलकर ही हम इन्हें जीत सकेंगे। सचमुच इस आध्यात्मिक (युधा इत्) = युद्ध के द्वारा ही, प्रभु कहते हैं कि हे जीव! (इच्छसे) = चाहता है।

    वैयक्तिक ईर्ष्या द्वेष की लड़ाईयों के द्वारा भ्रातृव्यों को, राष्ट्र व युद्धों के द्वारा नेताओं को और इस आध्यात्मिक युद्ध के द्वारा मनुष्य प्रभु की मित्रता को चाहता है। हम तो आध्यात्मिक संग्राम के द्वारा प्रभु की मित्रता को प्राप्त करने का प्रयत्न करें। जिसने भी अपने जीवन में इन्हीं संग्रामों को महत्त्व दिया उसी ने वस्तुतः अपने कर्त्तव्य का उत्तम पालन किया। यइस संसार नाटक में अपने कर्त्तव्य भाग का उत्तम प्रकार से भरण करने से वह 'सोभरि' कहलाया। ऐसा वह कण-कण करके कर पाया सो वह 'काण्व' हुआ।

    भावार्थ

    आध्यात्मिक संग्राम के द्वारा हम प्रभु के मित्र बनें।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = हे इन्द्र ! ( त्वं ) = तू ( जनुषा ) = अपने प्रकट होने के काल से ही ( अभ्रातृव्यः ) = शत्रुरहित, अजातशत्रु ( अना ) = विना नेता के, विनायक, ( अनापि: ) = बन्धु बान्धवों से रहित, अद्वितीय, ( सनाद् ) = पुराण पुरुष ( असि ) = है । तो भी ( युधा इत् ) = योग द्वारा ही ( आपित्वम् ) = तुम बन्धुता को ( इच्छसे ) = चाहते हो, स्वीकार करते हो ।

    टिप्पणी

    ३९९  —बुध्वतिर्गतिकर्मा ।  नि० २ ।  १४ । 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - सौभरि: ।

    देवता - इन्द्रः।

    छन्दः - ककुप्।

    स्वरः - ऋषभः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेन्द्रनाम्ना परमेश्वरस्य शत्रुरहितत्वादिकं प्रतिपाद्यते।

    पदार्थः

    हे (इन्द्र) जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयकर्तः परमात्मन् ! त्वम् (सनात्) सनातनकालात् (जनुषा) जन्मना, स्वभावतः इत्यर्थः (अभ्रातृव्यः) निःसपत्नः। ‘व्यन् सपत्ने। अ० ४।१।१४५’ इति भ्रातृशब्दात् सपत्नार्थे व्यन्। ततो नञ्बहुव्रीहौ ‘नञ्सुभ्याम्। अ० ६।२।१७२’ इत्युत्तरपदस्यान्तोदात्तत्वम्। (अना२) अनेतृकः। न विद्यते ना नेता कश्चिद् यस्य सः अना। नृ शब्देन नञ्बहुव्रीहौ ‘नद्यृतश्च। अ० ५।१।१५३’ इति कपि प्राप्ते ‘ऋतश्छन्दसि। अ० ५।१।१५८’ इति प्रतिषेधः। स्वरः पूर्ववत्। (अनापिः) अबन्धुश्च (असि) वर्तसे। अनापिः इति तत्पुरुषो, न बहुव्रीहिः। न आपिः अनापिः। तेनाव्ययपूर्वपदप्रकृतिस्वरः। बहुव्रीहौ तु पूर्ववदन्तोदात्तत्वं प्राप्येत। (युधा इत्) युद्धेनैव (आपित्वम्) बन्धुत्वम् (इच्छसे) कामयसे। आभ्यन्तरे बाह्ये च देवासुरसंग्रामे यो विजेता भवति तस्यैव त्वं बन्धुर्भवसि, न तु पुरुषार्थहीनस्य जनस्येति भावः। इषु इच्छायाम् छन्दस्यात्मनेपदेऽपि प्रयुज्यते३ ॥१॥ अत्र अना, मना, सना इत्यत्र वृत्त्यनुप्रासोऽलङ्कारः। ‘त्वम, त्वमि’ इत्यत्र छेकानुप्रासः ॥१॥

    भावार्थः

    अशत्रुरनेतृको महान् जगदीश्वरः पुरुषार्थिनामेव बन्धुर्जायते न निष्कर्मणाम् ॥१॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।२१।१३, अथ० २०।११४।१, साम० १३८९। २. अना। अनः प्राणः, तस्मात् तृतीयैकवचनस्य ‘सुपां सुलुक्०। ७।१।३९’ इति पूर्वसवर्णः। अना अनेन प्राणेन हेतुना—इति वि०। नेता यस्य नास्ति सोऽना, स्वयं सर्वस्य नेता—इति भ०। अनेतृकः—इति सा०। ३. अन्यत्रापि यथा—‘अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्’ ऋ० १०।१०।१० इति।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, from times immemorial. Thou art ever Rivalless, Leaderless, Companionless: Thou seekest friendship through Yoga alone!

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    Meaning

    Indra, lord of absolute might by nature, since birth of the universe, indeed for eternity, you are without a rival, need no leader, no friend and no comrade, but in the dynamics of human life you do want that the human should be your companion in and for his struggle for self-evolution and social progress. (Rg. 8-21-13)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ


    પદાર્થ : (इन्द्र) હે ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મન્ ! (त्वम्) તું (अभ्रातृव्यः) શત્રુરહિત (अना) નેતાથી રહિત (अनाषिः) માતા-પિતા આદિ સંબંધીથી રહિત (जनुषा सनात् असि) જન્મથી-જન્મદ્રષ્ટિથી તું નિત્ય છે અર્થાત્ જન્મધારણથી પણ રહિત-નિત્ય છે (युधा इत् आपत्वम् इच्छसे) પોતાની તરફ ગતિ કરનારની સાથે જ ઉપાસકની સાથે જ બંધુત્વને ચાહે છે. (૧)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્માનો કોઈ શત્રુ નથી, તે કોઈથી પણ શત્રુતા રાખતો નથી, તેનો કોઈ નેતા નથી કારણ કે તે સ્વયં વિધાતા છે, જન્મથી-જન્મનો સાથી તેમ કહેવામાં આવે તો તે નિત્ય છે, શાશ્વત છે, જન્મ લેતો નથી, પરન્તુ હાં, તેની તરફ ગતિ કરનાર ઉપાસકની સાથે સંબંધ ઇચ્છે છે-ચાહે છે, તેને અપનાવે છે. (૧)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    ایشور کن کے ساتھ بھائی چارہ چاہتا ہے!

    Lafzi Maana

    ہے اِندر بھگوان! آپ قدرتی طور پر اجات شترو ہیں، کوئی آپ کا شترو نہیں ہے، آپ کا بھائی بندھو بھی کوئی نہیں، نہ کوئی آپ کا نیتا ہے، انسانی شکل بھی آپ کی نہیں۔ آپ نراکار ہیں، اور سناتن یعنی قدیم ترین ہیں، ہاں! جب کوئی دھرماتما نیک انسان کذب و باطل یعنی بُرائیوں کے ساتھ جنگ آزما ہو جاتا ہے، تب آپ اُس کے ساتھ بھائی چارہ چاہتے ہوئے اُس کی سہایتا کو آ جاتے ہیں۔

    Tashree

    آپ تو ہی آپ ہیں کوئی بیگانہ ہے نہ اپنا، یُدھ میں بدیوں سے گھر جاتا جو، وہ ہو جاتا اپنا۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    ज्याच्याबरोबर शत्रुत्व करण्याचे कुणामध्येही साहस नसते व ज्याचे नेतृत्व करणारा कुणी नाही, तो महान परमेश्वर पुरुषार्थी लोकांचाच बंधु बनतो, अकर्मण्य लोकांचा नव्हे ॥१॥

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    विषय

    इंद्र नावाने परमेश्वराच्या शत्रुरहितत्वाविषयी कथन

    शब्दार्थ

    (इन्द्र) जगाची उत्पत्ती, स्थिती आणि प्रलय या क्रियांचा कर्ता तू हे परमेश्वरा, (सनात्) सनातन काळापासून (जनुषा) स्वभावतः) (अभ्रातृव्यः) शत्रुरहित आहेस. (तुझा कोणी शत्रू नाही.) (अना तुझा कोणी नेता नाही (तूच सर्वांचा नेता आहेस.) (अनापिः) तुझा कोणी भाऊ (सहायक व समान सा) नाही. तू अबन्धु (असि) आहेस. (युधा इत्) तू युद्धाद्वारेच (आपित्वम्) बंधुत्व (इच्छसे) जोडण्याची इच्छा बाळगत आहेस म्हणजे जो माणूस आंतरिक व बाह्य देवासुर संग्रामामध्ये विजयी होतो, तू त्याचा बंधू वा सहाय्यक होतोस.।। १।।

    भावार्थ

    कोणीही ज्याचे शत्रुत्व विकत घेण्याचे धाडस करू शकत नाही आणि ज्याला कोणाच्या नेतृत्वाची गरज नाही, असा तो जगदीश्वर पुरुषार्थी, प्रयत्नवादी लोकांचा बंधू वा सहाय्यक होत असतो. अकर्मण्यजनाना तो कधी मदत करीत नाही. ।। १।।

    विशेष

    या मंत्रात ‘अना, मना, सना’मध्ये वृत्त्यनुप्रास अलंकार आहे. ‘त्वम्’ त्वमि’मध्ये छेकानुप्रास आहे.।। १।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    (இந்திரனே)! நீ சன்மத்திலிருந்தே (சகோதரனில்லாதவன்). போட்டியில்லாதவன். பந்துத்வமில்லாமல் சதாகால மிருக்கிறாய். போரினாலேயே நீ பாந்தவத்தை விரும்புகிறாய்.

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