Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 422
ऋषिः - विमद ऐन्द्रः
देवता - सोमः
छन्दः - पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
47
भ꣣द्रं꣢ नो꣣ अ꣡पि꣢ वातय꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣡ क्रतु꣢꣯म् । अ꣡था꣢ ते स꣣ख्ये꣡ अन्ध꣢꣯सो꣣ वि꣢ वो꣣ म꣢दे꣣ र꣢णा꣣ गा꣢वो꣣ न꣡ यव꣢꣯से꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२२॥
स्वर सहित पद पाठभ꣣द्र꣢म् । नः꣣ । अ꣡पि꣢꣯ । वा꣣तय । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । क्र꣡तु꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । ते꣣ । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । वि । वः꣣ । म꣡दे꣢꣯ । र꣡ण꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । न । य꣡व꣢꣯से । वि꣡व꣢꣯क्षसे ॥४२२॥
स्वर रहित मन्त्र
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम् । अथा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणा गावो न यवसे विवक्षसे ॥४२२॥
स्वर रहित पद पाठ
भद्रम् । नः । अपि । वातय । मनः । दक्षम् । उत । क्रतुम् । अथ । ते । सख्ये । स । ख्ये । अन्धसः । वि । वः । मदे । रण । गावः । न । यवसे । विवक्षसे ॥४२२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 422
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 4; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 8;
Acknowledgment
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 4; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 8;
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र का सोम देवता है। उससे याचना की गयी है।
पदार्थ
हे सोम ! हे रसागार परमात्मन् ! आप (नः) हमारे लिए (भद्रम्) श्रेष्ठ (मनः) मनोबल, (दक्षम्) शारीरिक बल, (उत) और (क्रतुम्) प्रज्ञान तथा कर्म (अपि वातय) प्राप्त कराओ। (अथ) और (ते) आपके अपने (अन्धसः) शान्तिरस के (सख्ये) सखित्व में, तथा (वः) आपके अपने (मदे) आनन्द में, हमें (वि रण) विशेष रूप से रमाओ, (गावः न) जैसे गौएँ (यवसे) घास में रमती हैं। हे सोम परमात्मन् ! आप (विवक्षसे) महान् हो ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थ
परमेश्वर की उपासना से मनुष्य आत्मा, मन, बुद्धि आदि के बल को और आनन्द को प्राप्त कर सकते हैं ॥४॥
पदार्थ
सोम परमात्मन्! (नः) हमारे (मनः) मन को (दक्षम्) आत्मबल को “दक्षो बलम्” [निघं॰ २.९] (उत) ‘अपि’—और (क्रतुम्) प्रज्ञा को “क्रतुः प्रज्ञानाम” [निघं॰ ३.९] (भद्रम्-अपि वातय) भद्र—भद्ररूप में अवश्य चला “अपि निश्चये” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (अथ) हाँ (ते-अन्धसः सख्ये) तुझ आध्यानीय—समन्त ध्यातव्य सोम परमात्मा के सखिभाव—मित्रभाव में तथा (मदे) हर्ष में (विवः) विकसित होऊँ—हर्षाऊँ (रण-गावः-न यवसे) जैसे घास के लिये गौव्वें रमण करतीं—प्रसन्न होती हैं ऐसे (विवक्षसे) महत्त्व को प्राप्त होता है।
भावार्थ
हे शान्तरूप परमात्मन्! तू महत्त्व को पा रहा है, अतः तू हमारे मनोबल—आत्मबल को और प्रज्ञा को निश्चित भद्र—कल्याणरूप कर दें तुझ ध्यान में आने योग्य के मित्रभाव में और हर्ष में हम विकसित हों, गौव्वें जैसे घास के लिए हर्षित होती हैं॥४॥
टिप्पणी
[*32. “सोमो वै देवानां जनिता” [जै॰ ३.१७४]।]
विशेष
ऋषिः—विमदः (परमात्मा में विशेष हर्ष को प्राप्त उपासक)॥ देवता—सोमः (शान्त आनन्दस्वरूप परमात्मा*32)॥<br>
विषय
भलमानस न कि भोंदू
पदार्थ
हे प्रभो! (नः) = हमारे (मनः) = मन को (भद्रम् अपि वातय) = भद्रता की ओर प्रेरित कीजिए हमारे मन कभी अभद्रता की ओर न झुकें, कभी अशुभ का चिन्तन न करें। भद्रता के साथ (दक्षम्) = हमारे मन को दक्षता की ओर प्रेरित कीजिए | कठिन से कठिन समस्या को हम सुगमता से सुलझानेवाले हों। हमारा मन सदा resourceful हो - उपाय का चिन्तन कर सके। हम संकट में घबड़ा न जाएँ। भद्र बनें पर भोंदू न हों। इस भद्रता और दक्षता के साथ (उत क्रतुम्) = हमारे मनों में कर्म संकल्प भी प्राप्त कराइए। हमारा मन कभी आलस्य, तन्द्रा व निद्रा की ओर झुकाव न रक्खे।
इस प्रकार, भद्रता, दक्षता तथा क्रतुमयता की साधना के (अथा) = बाद (ते सख्ये) = हे प्रभो ! हम तेरी मित्रता में (रणा) = आनन्द का अनुभव करें। वस्तुतः प्रभु की उपासना इन तीन बातों के बिना सम्भव भी तो नहीं।
जिस समय जीव प्रभु से यह प्रार्थना करता है उस समय बीच में उल्लंघन करते हुए प्रभु कहते हैं कि (वः) = अपने (अन्धसः) = सोम के (वि-मदे) = उत्कृष्ट हर्ष में तू (रणा) = आनन्द का अनुभव कर। सोम की रक्षा ही मेरी उपासना है। जीव प्रभु की इस प्रेरणा को सुनता हुआ कहता है कि मैं आपकी उपासना में उसी प्रकार आनन्द का अनुभव करूँ। । न=जैसेकि (विवक्षसे यवसे) = बढ़ी हुई चरी में (गाव:त्रः) = गौवें आनन्द का अनुभव करती हैं। उस समय उनकी पीरट पर पड़ा हुआ एक-आध डण्डा उन्हें दुःखी नहीं करता । इसी प्रकार एक भक्त प्रभु के प्रेम में निमग्न हुआ-हुआ कष्टों को कष्ट ही नहीं समझता ।
इसी ऊँची स्थिति को प्राप्त हुआ हुआ भी यह 'विमद' + मदशून्य, गर्वरहित बना रहता है। यही तो इसके जीवन का सौन्दर्य है। ऊँची स्थिति में पहुँचना योग है, परन्तु वहाँ पहुँचकर गर्वित हो जाना योगभ्रष्ट हो जाना है। यह व्यक्ति योगभ्रष्ट नहीं होता।
भावार्थ
मेरा जीवन भद्रता, दक्षता, क्रतुमयता, प्रभु मित्रता, सोमरक्षा व गर्वशून्यता से अलंकृत हो।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = हे परमेश्वर ! ( विवक्षसे ) = आप महान् हो । आप ( नः ) = हमारे ( मनः ) = मन और ( दक्षम् ) = आत्मा या बल को ( उत ) = और ( क्रतुम् ) = कर्म को ( भद्रं ) = कल्याण के प्रति ( अपि वातय ) = प्रेरित करो। ( अथा ) = और ( ते ) = तुझ ( अन्धसः ) = अन्धकार को दूर करने और प्राण धारण करानेहारे प्रभु के ( मदे ) = हर्षकारी ( सख्ये ) = प्रेम में हमें ( यवसे ) = घास के प्रेम में ( रणा गावो न ) = आनन्द प्रसन्न गौवों के समान ( विवः ) = स्वीकार करो, अपनाओ ।
टिप्पणी
४२२–‘रणन् गावो’ इतिपाठः, ऋ० । ऋग्वेदे (१० । २० । ५) इत्यत्र ‘भद्रा' दि ‘मनो'न्तः पाठ एव केवलम् ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - विमद ऐन्द्रः प्रजापत्यो वा वसुकृद् वासुक्रो वा ।
देवता - सोमः।
छन्दः - पङ्क्तिः।
स्वरः - पञ्चमः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ सोमो देवता। स प्रार्थ्यते।
पदार्थः
हे सोम रसागार परमात्मन् ! त्वम् (नः) अस्मभ्यम् (भद्रम्) श्रेष्ठम् (मनः) मनोबलम्, (दक्षम्) शारीरं बलम्, (उत) अपि च (क्रतुम्) प्रज्ञानं कर्म च (अपि वातय२) अपि गमय, प्रापय। (अथ) अपि च त्वम् (ते) तव (अन्धसः) शान्तरूपस्य रसस्य (सख्ये) सखित्वे अपि च (वः) तव (मदे आनन्दे (वि रण३) विशेषेण रमय। अत्र पादादित्वान्निघाताभावः। (गावः न) यथा धेनवः (यवसे) घासे रमन्ते तद्वत्। हे सोम परमात्मन् ! त्वम् (विवक्षसे) महान् असि ॥४॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥४॥
भावार्थः
परमेश्वरोपासनया जनैरात्ममनोबुद्ध्यादिबलमानन्दश्च प्राप्तुं शक्यते ॥४॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १०।२५।१ ऋषिः विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद् वा वासुक्रः। ‘अथा’, ‘रणा’ इत्यत्र क्रमेण ‘अधा’, ‘रणन्’ इति पाठः। केवलं पूर्वार्द्धः ऋ० १०।२०।१ इत्यत्रापि दृश्यते। २. वात सुखसेवनयोः गतौ च चुरादिः। अपि पूर्वोऽन्यत्रापि प्रयुज्यते, यथा ‘सहस्रं ते स्वपिवात भेषजा’ ऋ० ७।४६।३ इत्यत्र। ३. शब्दार्थे पठितो रण धातुः रमणार्थेऽपि भवति, तथा च ‘रणाय रमणीयाय संग्रामाय’ इति (निरु० ४।८) ‘रण रमय’—इति वि०। ‘रणा रमन्तां स्तोतारः’—इति भ०। ‘रणाः प्रीतियुक्ता गावो न’—इति सायणीयं व्याख्यानं तु पदकारविरुद्धम्, पदपाठे ‘रण’ इति पाठात्। दीर्घत्वं तु ‘द्व्यचोऽतस्तिङः’ इति नियमाद् भवति।
इंग्लिश (2)
Meaning
O God, Thou art great. Grant us a delightful mind, grant us energy and mental power. Let us joy in the pleasant love of God, the Dispeller of darkness, just as kine do in pasturage!
Meaning
O Soma, lord of peace and bliss, inspire our mind, skill and wisdom, and our yajnic actions to move in the direction of goodness and piety, so that, living in your love and friendship, we may enjoy food and lifes delicacies like cows enjoying their favourite grass and thus partake of your divine joy in life here itself. O Soma, you are great and glorious indeed. (Rg. 10-25-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : સોમ પરમાત્મન્ ! (नः) અમારા (मनः) મનને (दक्षम्) આત્મબળને (उत) અને (क्रतुम्) પ્રશાને (भद्रम् अपि वातय) ભદ્ર રૂપમાં નિશ્ચિત ચલાવ (अथ) હાં (ते अन्धसः सख्ये) આધ્યાનીય-સમગ્ર ધ્યાતવ્ય સોમ પરમાત્માના મિત્રભાવમાં તથા (मदे) હર્ષમાં (विवः) વિકાસ પામું-આનંદ પામું. (रणः गावः न यवसे) જેમ ઘાસને માટે ગાયો રમણ કરતી-પ્રસન્ન થાય છે, તેમ (विवक्षसे) મહત્ત્વને પ્રાપ્ત થાય છે. (૪)
भावार्थ
ભાવાર્થ : હે શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! તું મહત્ત્વને પ્રાપ્ત કરી રહ્યો છે, તેથી તું અમારા મનોબળઆત્મબળને તથા પ્રજ્ઞાને નિશ્ચિત ભદ્ર-કલ્યાણરૂપ કરી દે. તારા ધ્યાનમાં આવવા યોગ્યના મિત્રભાવમાં અને હર્ષ-આનંદમાં અમે વિકાસ પામીએ, જેમ ગાયો ચારા-ઘાસને માટે આનંદનો અનુભવ કરે છે. (૪)
उर्दू (1)
Mazmoon
اُوشا کال برہم مہورت کی برکات
Lafzi Maana
اُوشا کا پوِتّر مہورت صبح صادق ہمارا بل بُدھی من اور سنکلپ پاکیزہ کرتا ہے، اور ہمیں کلیان مارگ کی طرف بڑھاتا ہے، یہ برہم مہورت ہے، اُوشا کا برہم ویلا (وقت) ہمارے اگیان کو دُور کرتا اور روحانی دولت کو دیتا ہے، جیسے گئوئیں ہرے ہرے گھاس میں رمن کرتی ہیں۔ ویسے ہم تیرے سہہ واس میں جاگ کر آنند کو پراپت کریں!
Tashree
جاگ کر اُوشا سمے میں بُدھی بل من شُدھ کریں، اور شُدھ سنکلپ سے ایشور میں اپنا چِت دھریں۔
मराठी (2)
भावार्थ
परमेश्वराच्या उपासनेने माणसे आत्मा, मन, बुद्धी इत्यादींचे बल व आनंद प्राप्त करू शकतात ॥४॥
विषय
सोम देवता। त्याची प्रार्थना
शब्दार्थ
हे सोम, हे रसागार परमेश्वरा, (नः) आम्हा उपासकांना (भद्रं) श्रेष्ठ (मनः) मनोबल व (दक्षम्) शारीरिक बळ (उत) आणि (क्रतुम्) प्रकृष्टज्ञान व कर्म (अपि वातम) देखील प्राप्त व्हावे, असे कर. (अथ) आणखी असे की (ते) तुझ्या (अन्धसः) शांतिरसाच्या (सख्ये) सान्निध्यात आणि (वः) तुझ्या (मदे) आनंदात आम्हाला (वि रण) विशेत्वाने मग्न होऊ दे. (गावः न) गायी जशा (यवसे) गवत खाण्यात तल्लीन होतात, (तसे आम्हाला तुझ्या आनंदात रममाण होऊ दे.) हे परमेश्वरा, तू (विवक्षसे) खरोखर महान आहेस.।। ४।।
भावार्थ
परमेश्वराच्या उपासनेद्वारे माणूस आत्मा, मन, बुद्धी आदींच्या शक्तीचा व परमानंदाचा अनुभव घेऊ शकतो.।। ४।।
विशेष
या मंत्रात उपमा अलंकार आहे.।। ४।।
तमिल (1)
Word Meaning
எங்களுக்கு மங்களமான மனத்தை அனுப்பவும். சுபமான சங்கற்ப லட்சணத்தை அனுப்பவும். மங்களமான ஆன்மபலத்தை அனுப்பவும். மங்களமான அறிவையும் அனுப்பவும். அப்பால் உன் நட்பிலே ரசத்தில் (புற்களில் பசுக்களைப்போல்) மனிதர்கள் சந்தோஷமுடனாகட்டும்.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal