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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 675
ऋषिः - सप्तर्षयः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
28
पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ धा꣡र꣢या꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो अर्षसि । आ꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ योनि꣢꣯मृ꣣त꣡स्य꣢ सीद꣣स्यु꣡त्सो꣢ दे꣣वो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥
स्वर सहित पद पाठपु꣣नानः꣢ । सो꣡म । धा꣡र꣢꣯या । अ꣣पः꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣣र्षसि । आ । र꣣त्नधाः꣢ । र꣣त्न । धाः꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सी꣣दसि । उ꣡त्सः꣢꣯ । उत् । सः꣣ । देवः꣢ । हि꣣रण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥
स्वर रहित मन्त्र
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि । आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः ॥६७५॥
स्वर रहित पद पाठ
पुनानः । सोम । धारया । अपः । वसानः । अर्षसि । आ । रत्नधाः । रत्न । धाः । योनिम् । ऋतस्य । सीदसि । उत्सः । उत् । सः । देवः । हिरण्ययः ॥६७५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 675
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५११ क्रमाङ्क पर परमात्मा के पक्ष में व्याख्यात की गयी थी। यहाँ गुरु का वर्णन है।
पदार्थ
हे (सोम) ज्ञानरस के खजाने गुरुवर ! आप (धारया) ज्ञान की धारा से (पुनानः) शिष्यों को पवित्र करते हुए (अर्षसि) शिष्यों के मध्य जाते हो। (रत्नधाः) रमणीय गुणों को धारण करनेवाले आप (ऋतस्य योनिम्) सत्य के भण्डार परमात्मा को (आसीदसि) उपासते हो। आप (उत्सः) विद्या के स्रोत, (देवः) प्रकाशक और (हिरण्ययः) तेजस्वी हो ॥१॥
भावार्थ
वही गुरु होने योग्य है, जो सब विद्याओं में पारंगत, अध्यापनकला में प्रवीण, चारित्र्यवान्, सच्चरित्र बनानेवाला, शिष्यों का पितृतुल्य, तेजस्वी, गुणवान्, गुणप्रशंसक, परब्रह्म का द्रष्टा और परब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ हो ॥१॥
पदार्थ
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (पुनानः) मुझको शोधता हुआ—पवित्र करता हुआ, तथा (धारया) ध्यान धारणा से (अपः-वसानः) मेरे प्राणों को “आपो वै प्राणाः” [श॰ ३.८.२.४] आच्छादित—आवृत करता हुआ—रक्षित करता हुआ (अर्षसि) प्राप्त होता है (रत्नधा) रमणीय भोगों का धारण करने वाला (ऋतस्य योनिम्-आसीदसि) अध्यात्मयज्ञ में “यज्ञो वा ऋतस्य योनिः” [श॰ १.३.४.१६] आविराजता है (हिरण्ययः-उत्सः-देवः) तू ही सुनहरा अमृतकूप, देव अमृतधाम मोक्षधाम है “असौ वै द्युलोक उत्सो देवः” [जै॰ १.१२१] “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ॰ १०.९०.३]।
भावार्थ
हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू मुझ उपासक को पवित्र करता हुआ तथा मेरे प्राणों को ध्यानधारणा से सुरक्षित करता हुआ प्राप्त होता है। तू रमणीय भोगों को धारण करने वाला मेरे अध्यात्मयज्ञ में विराजमान होता है तू ही मोक्षधाम या सुनहरी अमृत कूप है॥१॥
विशेष
ऋषिः—अमहीयुः (पृथिवी को नहीं मोक्ष को चाहने वाला)॥ देवता—सोमः (शान्तस्वरूप परमात्मा)॥<br>
विषय
सप्त-गुणयुक्त सोम के द्रष्टा
पदार्थ
इस मन्त्र का ऋषि ‘सप्तर्षयः' है । सात गुणों से युक्त सोम का इस मन्त्र में वर्णन है । सम्भवतः सात गुणयुक्त सोम का द्रष्टा होने के कारण ही ऋषि का नाम 'सप्तर्षयः' हो गया है। सोम के सात गुण निम्न हैं – १. (सोम) = हे वीर्य-शक्ते! तू (धारया) = अपनी धारणशक्ति से (पुनानः) = पवित्र करती हुई (अर्षसि) = शरीर में गति करती है । यह वीर्यशक्ति शरीर के अस्वस्थ करनेवाले तत्त्वों को शरीर से दूर करके उसे पवित्र रखती है, अतः शरीर स्वस्थ बना रहता है । २. हे सोम! तू (अपः) = कर्मों का (वसानः) = धारण करता हुआ अर्षसि प्राप्त होता है । वीर्य का दूसरा गुण यह है कि यह मनुष्य को क्रियाशील–पुरुषार्थी बनाता है । 'वि+ईर' धातु से बना यह शब्द विशेषगति की सूचना देता है। वीर्यवान् पुरुष सदा क्रियाशील व आलस्य से दूर होता है । निर्वीर्यता ही मनुष्य को अलस बनाती है। ३. (आ) = समन्तात् (रत्नधा) = रमणीयता को धारण करनेवाला यह सोम है। सोम से सारा शरीर रमणीय हो उठता है, कान्ति सम्पन्न बन जाता है। क्या शरीर, क्या मन, क्या बुद्धि, सभी श्रीसम्पन्न हो जाते हैं। ४. (योनिम् ऋतस्य सीदसि) = अन्त में यह सोम ऋत के उत्पत्ति-स्थान उस प्रभु में जाकर स्थित होता है । इस सोम के धारण से मनुष्य प्रभु की उपासना के योग्य बनता है । ।
५. (उत्सः) = यह सोम एक चश्मा है। इस सोम को शरीर में धारण करने पर एक स्वाभाविक आनन्द का प्रवाह बहता है जो शारीरिक स्वास्थ्य व मनःप्रसाद का सूचक है । ६. (देवः) = यह सोम मनुष्य को दिव्य प्रवृत्तिवाला बनाता है। इसे राग-द्वेष से ऊपर उठाता है । ७. (हिरण्ययः) = यह हिरण्यवाला है। [हिरण्यं वै ज्योतिः] यह मस्तिष्क को ज्योतिर्मय बनाता है । यही तो वस्तुतः ज्ञानाग्नि का ईंधन है । यह शरीर को स्वस्थ, मन को निर्मल और बुद्धि को दीप्त बनाता है।
भावार्थ
सोम को धारण कर हम अपने शरीर को सप्त गुणयुक्त बनाएँ ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = (१) इसकी व्याख्या देखो अविकल संख्या [५११] पृ० २५२ ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - अमहीयुराङ्गिरसः । देवता - सोमः। छन्दः - बृहती। स्वरः - मध्यमः।
संस्कृत (1)
विषयः
प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ५११ क्रमाङ्के परमात्मपक्षे व्याख्याता। अत्र गुरुर्वर्ण्यते।
पदार्थः
हे (सोम) ज्ञानरसनिधे गुरो ! त्वम् (धारया) ज्ञानधारया (पुनानः) शिष्यान् पवित्रीकुर्वन्, (अपः) कर्त्तव्यानि कर्माणि (वसानः) धारयन् (अर्षसि) शिष्याणां मध्ये गच्छसि। (रत्नधाः) रमणीयानां गुणानां धारयिता त्वम् (ऋतस्य योनिम्) सत्यस्य गृहभूतं परमात्मानम् (आसीदसि) उपास्से। त्वम् (उत्सः) विद्यायाः स्रोतः, (देवः) प्रकाशकः, (हिरण्ययः) ज्योतिर्मयश्च विद्यसे ॥१॥
भावार्थः
स एव गुरुर्भवितुं योग्यो यः सकलविद्यापारंगतोऽध्यापनकलाप्रवीण- श्चारित्र्यवान् सच्चरित्रस्य ग्राहयिता शिष्याणां पितृतुल्यस्तेजस्वी गुणवान् गुणप्रशंसकः कृतपरब्रह्मसाक्षात्कारो ब्रह्मानुभूतिं कारयितुं समर्थश्च भवेत् ॥१॥
टिप्पणीः
४. प्रकर्षेण ग्रन्थनं यत्र स प्रगाथः। प्रकर्षो नाम आम्नाताद् ऋक्पाठादाधिक्यम्। इति मी० द० अ० ९, ३, ६ अधि० १ वर्णके माधवव्याख्यानम्। एष च प्रगाथः पादाभ्यासपुरःसरमृगन्तर- सम्पादनेनोपजायते—इति सामश्रमी। १. ऋ० ९।१०७।४ ‘देवो’ इत्यत्र ‘देव’ इति पाठः। साम० ५११।
इंग्लिश (2)
Meaning
O soul, residing in our actions, and purifying all, thou manifestest thyself. Thou art the treasure of all charms. The root of truth is thy abode. By nature thou art lustrous and the fountain of divine happiness !
Translator Comment
See the verse 511, which is the same as 675 , but with a different interpretation, hence free from the charge of repetition
Meaning
O Soma, pure and purifying our thought, will and actions, abiding in the heart, you move and flow on in our consciousness. Bearing treasures of jewels, pray come and sit on the seat of yajna vedi and our sense of truth and eternal law. Indeed, O lord refulgent, you are the fountain head of lifes golden treasures. (Rg. 9-107-4)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (सोम) હે શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! તું (पुनानः) મને શુદ્ધ-પવિત્ર કરતાં તથા (धारया) ધ્યાન ધારણાથી (अपः वसानः) મારા પ્રાણોને આચ્છાદિત-આવૃત્ત કરતાં-રક્ષિત કરતાં (अर्षसि) પ્રાપ્ત થાય છે (रत्नधा) ૨મણીય ભોગોને ધારણ કરનાર (ऋतस्य योनिम् आसीदसि) અધ્યાત્મયજ્ઞમાં આવીને વિરાજમાન થાય છે. (हिरण्ययः उत्सः देवः) તું જ સોનેરી અમૃતકૂપદેવ અમૃતધામ મોક્ષધામ છે.
भावार्थ
ભાવાર્થ : હે શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! તું મને ઉપાસકને પવિત્ર કરતાં તથા મારા પ્રાણોને ધારણાધ્યાનથી સુરક્ષિત કરતાં પ્રાપ્ત થાય છે. તું રમણીય ભોગોને ધારણ કરનાર મારા અધ્યાત્મયજ્ઞમાં વિરાજમાન થાય છે, તું જ મોક્ષધામ અર્થાત્ સોનેરી અમૃતકૂપ છે. (૧)
मराठी (2)
भावार्थ
जो सर्व विद्या पारंगत अध्यापन कलेत प्रवीण, चरित्रवान, सच्चरित्र बनविणारा, शिष्यांशी पितृतुल्य व्यवहार, तेजस्वी, गुणवान, गुणप्रशंसक, परब्रह्माचा द्रष्टा व परब्रह्माचा साक्षात्कार करविण्यात समर्थ असेल तोच गुरू होण्यायोग्य असतो ॥१॥
विषय
या ऋचेची व्याख्या पूर्वाचिक भागात क्र. ५११ वर केली आहे. तिथे व्याख्या परमात्मपर आहे. आता गुरूपक्षी अर्थ सांगितला जात आहे.
शब्दार्थ
(सोम) ज्ञानरूप रसाचा सागर असलेले हे गुरूवर तुम्ही (धारया) ज्ञानरूप धारेने (पुनान:) शिष्यवर्गाला पवित्र करीत (वर्षभि) शिष्यांवर वृष्टी करता वा त्यांच्यामध्ये राहता (रतूधा:) गुरुवर आपण रमणीय गुण धारण करणारे आहात आणि (ऋतस्य) दोनिम्) सत्याचे जे भंडार त्या परमेश्वराजवळ (आसीदसि) बसता (त्याची उपसना करता) आपण (उत्स:) विद्येचा स्त्रोत असून (देव:) प्रकाशक आणि (हिरण्यया) तेजस्वी आहात (आमच्या बुद्धीत ज्ञानाचा प्रकाश पाडणारे आहात) ।।१।।
भावार्थ
गुरुपदाला पात्र तीच व्यक्ती असू शकते जी सर्व विद्या पारंगत असेल, अध्यापनकलेत प्रवीण आणि चारित्र्यसंपन्न असेल. तसेच जी चरित्र धारण करविणारी असेल. गुरु शिष्यांवर पितृवत प्रेम करणारा तेजस्वी गुणवान, गुण प्रशंसक, परब्रह्म द्रष्टा असावा आणि त्याच्या ठिकाणी इतरांनाही परब्रह्माचा साक्षात्कार करविणारा असावा, असा गुणसंपन्न भक्तीच गुरू होण्यास योग्य आहे. ।।१।।
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